सपा-बसपा से ‘ठुकराई’ गई कांग्रेस अब छोटे दलों के सहारे

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बीएसपी के बीच चुनावी गठबंधन के एलान के साथ ही यह साफ़ हो गया है कि कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा नहीं होगी। सपा-बसपा की साझा प्रेस कॉन्फ़्रेंस की शुरुआत ही मायावती ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की नींद उड़ाने वाली बताकर की थी। कॉन्फ़्रेंस ख़त्म होते-होते इससे कांग्रेस की भी नींद उड़ गई। मायावती ने जिस तरह बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस पर तीखे हमले किए, उससे चुनाव के बाद की परिस्थितियों में इस गठबंधन के कांग्रेस को समर्थन देने में भी आनाकानी करने की संभावनाएँ बढ़ गई हैं।

‘प्लान बी’ पर काम कर रही कांग्रेस

सपा-बसपा के गठबंधन के एलान के बाद अब कांग्रेस अपने ‘प्लान बी’ को अमली जामा पहनाने में जुट गई है। कांग्रेस इस गठबंधन में जगह पाने से छूट गई छोटी पार्टियों को साथ लेकर एक नए गठबंधन के साथ चुनावी समर में कूदने की तैयारी कर रही है।

साझा प्रेस कॉन्फ़्रेंस के फ़ौरन बाद कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने ‘सत्य हिंदी’ से फ़ोन पर बात करते हुए कहा कि कांग्रेस, रालोद और अन्य छोटी पार्टियों को साथ लेकर एक मजबूत गठबंधन बनाएगी और 2009 की तरह उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी।

सपा-बसपा के गठबंधन में दोनों पार्टियाँ 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। मायावती ने कहा कि हमने 2 सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ी हैं और दो अन्य सहयोगी दलों के लिए छोड़ने की बात कही गई है। अन्य सहयोगी दलों में पीस पार्टी और निषाद पार्टी के लिए एक-एक सीट हो सकती है। हालाँकि ये दोनों पार्टियाँ अपने लिए कम से कम दो-दो सीटें माँग रही हैं।

कांग्रेस के सूत्रों का दावा है कि अखिलेश और मायावती के ज़्यादा सीटों पर लड़ने की वजह से छोटी पार्टियाँ उसके साथ आ सकती हैं। कांग्रेस के साथ आने पर उन्हें पूरा सम्मान और ज़्यादा सीटें मिलेंगी। इसलिए कांग्रेस का गठबंधन ज़्यादा मजबूत होगा।

शिवपाल भी आ सकते हैं साथ

कांग्रेस के सूत्र दावा कर रहे हैं कांग्रेस के गठबंधन में रालोद के अलावा समाजवादी पार्टी से अलग होकर बनी शिवपाल यादव की प्रजातांत्रिक समाजवादी पार्टी, पीस पार्टी और निषाद पार्टी समेत कई कुछ और छोटी पार्टियाँ भी हो सकती हैं। सूत्रों के मुताबिक़, शिवपाल यादव के साथ गठबंधन की बात चल रही है। कांग्रेस शिवपाल यादव के ज़रिए अखिलेश के गढ़ में उन्हें मात देने की फ़िराक में हैं।

सूत्रों का कहना है कि शिवपाल यादव इटावा, मैनपुरी, एटा और अलीगढ़ जैसे मुलायम सिंह यादव के मज़बूत गढ़ में सेंध लगाकर अखिलेश यादव को नुक़सान पहुँचा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक़, कांग्रेस शिवपाल को 10-15 सीटें दे सकती है लेकिन शिवपाल 20-25 सीटों से कम पर गठबंधन को तैयार नहीं हैं। शिवपाल को साथ लेकर कांग्रेस उन सीटों पर बड़ा खेल कर सकती है जहाँ सपा-बसपा गठबंधन की तरफ़ से बसपा का उम्मीदवार होगा। ऐसी सीटों पर अखिलेश से नाराज़ समाजवादियों का वोट बसपा के बजाय शिवपाल की पार्टी को मिल सकता है।

मंत्री न बनाए जाने से थी नाराज़गी

पिछले कुछ दिनों से लग रहा था कि यूपी में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी का महागठबंधन वजूद में नहीं आ सकेगा। ख़ासकर राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा और समाजवादी पार्टी के समर्थन के बावजूद कांग्रेस ने इन दोनों के विधायकों को अपनी सरकारों में शामिल नहीं किया। इस पर मायावती और अखिलेश दोनों ने ही सख़्त ऐतराज जता कर साफ़ कर दिया था कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव को लेकर बनने वाले गठबंधन में वह कांग्रेस को अपने साथ नहीं रखेंगे। कांग्रेस को भी इस बात का एहसास था, लिहाजा कांग्रेस ने एक समानांतर रणनीति बनानी शुरू की और वह गठबंधन में जगह पाने से छूट गई छोटी पार्टियों को साधने में जुट गई।

यूं तो कांग्रेस अकेले भी चुनाव लड़ सकती है लेकिन उसके लिए गठबंधन ज़रूरी है। गठबंधन बनाकर वह संदेश देना चाहती है कि वह अकेले और अलग-थलग नहीं है। छोटी पार्टियों के गठबंधन के साथ चुनावी समर में उतरने पर उसे मज़बूत सीटोंं पर मुसलिम वोट भी मिल सकता है। अभी की स्थिति में मुसलिम वोटों का बड़ा हिस्सा सपा-बसपा गठबंधन को ही जाएगा।

रालोद को थी जगह मिलने की उम्मीद

सूत्रों के मुताबिक़, राष्ट्रीय लोक दल को गठबंधन में शामिल किए जाने की उम्मीद थी। जयंत चौधरी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में शामिल होने का न्यौता मिलने के इंतज़ार में लखनऊ में ही मौजूद थे। उन्हें प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नहीं बुलाए जाने से साफ़ हो गया था कि अखिलेश और मायावती उन्हें गठबंधन में नहीं रखना चाहते। इसके बावजूद भी यह उम्मीद की जा रही थी कि शायद मायावती और अखिलेश इस बात का संकेत दें कि रालोद उनके साथ गठबंधन में शामिल है।

कैराना में दिया था समर्थन

सपा-बसपा, दोनों ने ही रालोद की उम्मीद पर पूरी तरह पानी फेर दिया। यह उम्मीद इसलिए की जा रही थी कि कैराना लोकसभा सीट पर हुए उप-चुनाव में समाजवादी पार्टी और बसपा दोनों ने ही रालोद को अपना समर्थन दिया था। समाजवादी पार्टी ने तो अपने ही उम्मीदवार को राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़वा कर उसे जिताया था। अखिलेश यादव ख़ुद वहाँ प्रचार करने गए थे। इसके बावजूद इस गठबंधन में राष्ट्रीय लोक दल को शामिल नहीं किए जाने से कई सवाल उठे हैं। अहम सवाल यह है कि अखिलेश और मायावती किसी तीसरे को इस गठबंधन में जगह क्यों नहीं देना चाहते?

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