नफ़रत कभी नहीं जीत सकती

(भूपेश पंत, प्रधान संपादक, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया )

बचपन में जब मैं छोटा था तो वो बच्चा अक्सर हमारे साथ खेलने आता था। उम्र में कुछ बड़ा रहा होगा क्योंकि डीलडौल में तगड़ा था। उसका बचपना इसी वजह से दबंगई में तबदील हो चुका था। हर बात पर धमकाने लगता। खुद को सही और दूसरों को गलत बताता। हम बच्चों को एक दूसरे के खिलाफ़ भड़काने की भी कोशिश करता। जो कुछेक उसकी दबंगई के प्रभाव में आ जाते वो हमसे कुछ दिन की कुट्टी कर लेते लेकिन सल्ला होने में भी ज़्यादा देर नहीं लगती। अपना प्रभाव न पड़ते देख वो लानत मलामत करता और फिर देख लेने की धमकी देकर चला जाता। आये दिन वही किस्सा होता। हम लोग उस बच्चे से उकता तो गये थे लेकिन बच्चों का दिल था, सोच लेते उसको बुरा लगेगा। बच्चे को शायद लगा कि हम लोग कमज़ोर हैं इसीलिए कुछ बोल नहीं पा रहे हैं।

खुद को विजेता महसूस करके उसका मनोबल और बढ़ गया। बात अब हाथापाई और गंदी गंदी गालियों तक पहुंच चुकी थी। एक दिन हम बच्चों ने फैसला किया कि आज उसे बता देंगे कि हम डरते नहीं। बस लिहाज कर रहे हैं। बच्चे के आने के बाद हम सबने फैसला किया कि आज सभी बच्चे पर्ची में लिख कर एक खेल खेलेंगे। जिसका नाम पर्ची पर नहीं होगा वो एक महीने तक इतिहास और राजनीति शास्त्र की पढ़ाई करेगा और वापस आकर पूछे गये सवालों के जवाब देगा। तब तक वो मैदान का मुँह नहीं देखेगा। पर्चियों में नाम न आने से बच्चा भड़क गया कि वो न तो पढ़ेगा और ना ही कोई सवालों के जवाब देगा। अगले दिन से वो दिखाई भी नहीं दिया। आज वो अचानक दिखायी दे गया है राष्ट्रवाद के मैदान में। जाने भी दो यार, भाई था अपना, है और रहेगा भी। बाकी जो चुनाव -चुनाव फिर से खेलना है तो बताओ…

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