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ओशो वसीयत विवाद मामले में हाईकोर्ट की पुलिस को फटकार

पुणे/मुंबई. बॉम्बे हाईकोर्ट ने अध्यात्मिक गुरु ओशो की वसीयत से जुड़े विवाद को लेकर पुणे क्राईम ब्रांच को फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस से जांच रिपोर्ट मंगाई थी, किसी कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट नहीं। इस जांच रिपोर्ट से वे संतुष्ट नहीं हैं।अदालत ने कहा कि अगली सुनवाई के दौरान पुलिस ठीक तरह से मामले की प्रगति रिपोर्ट पेश करे। हाईकोर्ट में ओशो के फर्जी दस्तखत के जरिए वसीयत बनाए जाने के दावे को लेकर ओशो के एक शिष्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई चल रही है।

याचिका में किया फर्जी दस्तखत का दावा

याचिका में दावा किया गया कि ओशो फाउंडेशन के ट्रस्टियों ने फर्जी दस्तखत के जरिए उनकी वसीयत तैयार की है। लिहाजा उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाए। गुरुवार को न्यायमूर्ति आरएम सावंत और न्यायमूर्ति रेवती ढेरे की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान सरकारी वकील ने जांच रिपोर्ट पेश की। इसे देखने के बाद खंडपीठ ने असंतोष व्यक्त किया। इसी दौरान एक अन्य आवेदनकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने दावा किया कि उन्होंने दिल्ली की एक फोरेंसिक लैब में ओशो के दस्तखत की जांच कराई है।

हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से करवाएं दस्तावेज की जांच-कोर्ट

दिल्ली की लैब ने दस्तखत को फर्जी बताया था। इस पर खंडपीठ ने कहा कि विज्ञान ने काफी प्रगति की है। लिहाजा पुणे क्राईम ब्रांच हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से दस्तखत की पड़ताल कराए। मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट ने रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

पुलिस ने कोर्ट में दी यह दलील

सरकारी वकील संगीता शिंदे ने कहा कि जांच अधिकारी ने मामले को लेकर कई लोगों के बयान दर्ज किए हैं। इसके अलावा एक संदिग्ध कैंसर के मरीज ने अपना जवाब कोरियर के माध्यम से भेजा है। जांच प्रगति पर है। इससे पहले पुणे की स्थानीय पुलिस ने कहा था कि ओशो की दस्तखत की फोटोकॉपी दी गई है। जिसके आधार पर कोई नतीजा नहीं निकाला जा सकता। दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने मामले की सुनवाई 8 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दी।

क्या है पूरा मामला?
– ओशो के शिष्य योगेश ठक्कर (स्वामी प्रेम गीत) ने पुणे के कोरेगांव पुलिस स्टेशन में वर्ष 2013 में ओशो आश्रम के छह प्रशासको के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने कहा था कि जिस वसीयत को वर्ष 2013 में यूरोपियन कोर्ट के समक्ष पेश किया गया है वह वास्तव में ओशो द्वारा नहीं की गई। बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान ठक्कर के वकील ने बताया कि ओशो की मौत के 23 वर्ष बाद इस वसीयत को यूरोपियन कोर्ट में पेश किया गया, जबकि उनकी मौत भारत में हुई थी। जिन लोगों के खिलाफ ठक्कर ने शिकायत दर्ज करवाई है उनके पास ओशो की पेंटिंग, ऑडियो, वीडियो और किताबों के अधिकार प्राप्त हैं। यह तमाम चीजें कई भाषाओं में प्रकाशित की जाती हैं, इनसे करोड़ों की कमाई की जाती है। इनमें नौ हजार घंटे के प्रवचन, 1870 घंटे के भाषण और करीब 850 पेंटिंग शामिल हैं। उनके वक्तव्यों पर आधारित 650 किताबें 65 भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

डाॅक्टर को नहीं करने दी ओशो की मौत की जांच
– ठक्कर का दावा है कि ओशो के करीबी अनुयायियों ने डाॅक्टर को डेथ सर्टिफिकेट जारी करने से पहले उनके शव की जांच भी नहीं करने दी थी। ओशो का डेथ सर्टिफिकेट डॉ. गोकुल गोकनी ने जारी किया था। वह 1973 से ओशो के अनुयायी हैं। एक एफिडेविट में उन्हाेंने माना कि मौत से पहले उन्हें ओशो को देखने नहीं दिया गया था। उन्हें बस मौत के बाद सर्टिफिकेट देने को कहा गया। जब उन्होंने मौत की वजह पूछी तो वहां मौजूद दो अनुयायियों ने हार्ट अटैक बताया।

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