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कीड़ाजड़ी दोहन से हिमालयी पारिस्थितिकी को खतरा

देहरादून : चीन और तिब्बत सीमा से सटे उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों के बुग्यालों में कीड़ा जड़ी (यारसा गुंबा) के अनियंत्रित दोहन से वहां की पारिस्थितिकी पर असर पड़ रहा है। कहीं ईधन के लिए भोजपत्रों के वृक्षों को क्षति पहुंचाई जा रही तो कहीं बुग्यालों में आवाजाही से अन्य उपयोगी वनस्पतियों के लिए खतरा पैदा हो गया है। इस सबके मद्देनजर वन विभाग की रिसर्च विंग ने उच्च हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी का अध्ययन कराने का निश्चय किया है। वहीं, प्रदेश सरकार भी कीड़ा जड़ी के नियंत्रित दोहन के लिए नीति बनाने की कसरत में जुटी है।

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित बुग्यालों (हरी घास के मैदान) पर हर साल ही अपै्रल से लेकर जून तक का वक्फा बेहद भारी गुजरता है। असल में इस अवधि में बर्फबारी थमने के बाद बुग्यालों से बेशकीमती कीड़ाजड़ी निकालने के लिए मारामारी मची रहती है। बड़ी संख्या में लोगों की यही आवाजाही बुग्यालों की पारिस्थितिकी की सेहत को नासाज कर रही है। असल में कीड़ाजड़ी के लिए लोग बुग्यालों में डेरा डालते हैं तो वहां भोजन बनाने के लिए ईधन को भोजपत्र के पेड़ों के साथ ही दूसरी वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाते हैं। यही नहीं, बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के कारण उनके पैरों तले कुचलने से बुग्यालों की कई वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं। और तो और जलस्रोतों से पानी लेने के साथ ही वहां कचरा भी छोड़ दिया जाता है।

परिणामस्वरूप उच्च हिमालयी क्षेत्र की जैव विविधता को खतरा पैदा हो गया है। कीड़ा जड़ी के दोहन को मानवीय दखल से वहां की पारिस्थितिकी को कितना नुकसान पहुंच रहा है, अब इसकी असल तस्वीर सामने आएगी। इस कड़ी वन विभाग की रिसर्च विंग ने अध्ययन करने का निश्चय किया है। विभाग की अनुसंधान सलाहकार समिति इसकी मंजूरी भी दे चुकी है। वन संरक्षक अनुसंधान वृत्त संजीव चतुर्वेदी के अनुसार कीड़ा जड़ी के अनियंत्रित दोहन से उत्पन्न खतरों के अध्ययन को कार्ययोजना तैयार की जा रही है और जल्द ही इसे प्रारंभ किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे डाटा बेस सामने आने पर कीड़ाजड़ी के नियंत्रित दोहन को कदम उठाने के साथ ही बुग्यालों की सेहत सुधारने को कदम उठाए जा सकेंगे।

जलवायु परिवर्तन से लेना-देना नहीं वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी बताते हैं कि अभी ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है, जिससे यह कहा जाए कि जलवायु परिवर्तन के कारण कीड़ाजड़ी पर कोई असर पड़ा हो। अलबत्ता, उच्च हिमालयी क्षेत्र में इसे पाने की आस में मानवीय दखल से दिक्कतें जरूर बढ़ी हैं।

 

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