पर्यावरण के लिए कितना ख़तरनाक है सीमेंट का इस्तेमाल

सीमेंट अस्तित्व में मौजूद सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली मानव निर्मित धातुओं में से एक है. यह इस ग्रह पर पानी के बाद सबसे अधिक खपत वाला संसाधन है. सीमेंट कंक्रीट का मुख्य घटक है. इसके जरिए कई निर्माणों को मू्र्त रूप दिया गया है. लेकिन, ये कार्बन उत्सर्जन के प्रमुख कारकों में से एक है. थिंक टैंक चैटम हाउस के मुताबिक दुनिया में होने वाले सपूर्ण कार्बन उत्सर्जन का 8% सीमेंट से उत्सर्जित होता है.

अगर सीमेंट उद्योग एक देश होता, तो यह चीन और अमरीका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक होता. इसका कार्बन उत्सर्जन में विमानन ईंधन (2.5%) से ज़्यादा योगदान और यह वैश्विक कृषि व्यापार (12%) से भी पीछे भी नहीं है. बड़े सीमेंट उद्योगपति पॉलैंड में संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन- सीओपी24 में शामिल होने पहुंचे थे. यहां जलवायु परिवर्तन के लिए हुए पेरिस समझौते की जरूरतों को पूरा करने के तरीकों पर चर्चा की जानी थी. सीमेंट से पर्यावरण को होने वाला नुकसान वर्तमान समय में वैश्विक चिंता का विषय बन गया है. तो सीमेंट के लिए हमारा प्यार किस तरह से पर्यावरण के लिए खतरा पैदा कर रहा है? हम इसके समाधान के लिए क्या कर सकते हैं?

सीमेंट का समर्थन और विरोध

वैसे तो अधिकत टॉवर, कार पार्किंग, पुल और बांध में सबसे प्रमुख सामग्री के तौर पर कंक्रीट का उपयोग होता है लेकिन कंक्रीट से घृणा करने वालों ने इसे दुनिया का सबसे खराब वास्तुशिल्प बताया है. यूके में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के विकास में कंक्रीट ने काफी मदद की और बर्मिंघम, कोवेंट्री, हल एवं पोर्ट्समिथ आदि शहरों के निर्माण में कंक्रीट की बड़ी भूमिका रही है. लेकिन, कंक्रीट से ही दुनिया की सबसे अधिक आकर्षक इमारतें भी बनी हैं.

बर्मिंघम अपनी कंक्रीट संरचनाओं के लिए जाना जाता है. सिडनी ओपेरा हाउस, दिल्ली का कमल मंदिर, दुबई का बुर्ज ख़लीफ़ा और साथ ही रोम का पैनतिअन. इनके लिए बिना सहारे के बने दुनिया के सबसे बड़े गुबंद होने का दावा किया जाता है. इनकी मजबूती के पीछे सिर्फ इनमें इस्तेमाल हुई सामग्री है. रेत, बजरी, सीमेंट और पानी का मिश्रण यानि कंक्रीट को आर्किटेक्ट, डेवलपर्स और बि​ल्डर काफी पसंद करते हैं. उनके मुताबिक ये निर्माण के लिए एक अच्छा मटीरियल है.

एनर्जी, एंवायरंमेंट एंड रिसोर्सेज में ​डिप्टी रिसर्च डायरेक्टर फ्लेक्सी प्रेसटन कहते हैं, ”यह कीफायती है, इसे कहीं भी बनाया जा सकता है और इसमें ढांचा देने लायक हर तरह के गुण हैं, जिनकी एक इमारत के निर्माण में जरूरत होती है.” इस्पात के मजबूत होने के बावजूद भी इसके इस्तेमाल से जुड़ी स्थायित्व संबंधी समस्याओं के बावजूद यह अब भी दुनिया भर में जानी-मानी सामग्री है. भले ही इस्पात का इस्तेमाल कंक्रीट को अंदर से क्रैक कर सकता है. फ्लेक्सी प्रेसटन कहते हैं, ”कंक्रीट के बिना इमारत बनाना संभव तो है लेकिन ये चुनौतिपूर्ण है.” रोम का पैनतिअन बिना सहारे का सबसे बड़ा गुंबद माना जाता है.

सीमेंट उद्योग का विकास

यह सीमेंट की ही अनूठी खासियतें हैं जिन्होंने 1950 के दशक से वैश्विक सीमेंट उत्पादन को बढ़ावा देने में मदद की है. एशिया और चीन में 1990 के बाद से इस क्षेत्र में भारी वृद्धि हुई है. 1950 के बाद से उत्पादन में 30 गुना और 1990 के बाद से चार गुना बढ़ोतरी हुई है. 20वीं सदी में चीन ने 2011 से 2013 के बीच सीमेंट का अमरीका से भी ज़्यादा इस्तेमाल किया है.

लेकिन, चीन में अब इसकी खपत में वृद्धि रुक गई है. दक्षिण पूर्व एशिया और उप-सहारा अफ़्रीका इसके नए उभरते बाजार हैं. यहां बढ़ते शहरीकरण और आर्थिक विकास के चलते तेजी से निर्माण कार्य हो रहे हैं. चैटम हाउस शोधकर्ताओं का कहना है कि अगले 40 सालों में दुनिया की इमारतों का फ्लोर एरिया (जमीन का क्षेत्रफल) दुगना होने का अनुमान है. इसके लिए साल 2030 तक सीमेंट के उत्पादन में एक चौथाई वृद्धि की जरूरत होगी.

हममें से कई मानते हैं कि कंक्रीट हाल ही में हमारे शहरों और निर्माण का हिस्सा बना है लेकिन हकीकत में हम सैकड़ों शताब्दियों से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.

कंक्रीट का इतिहास

माना जाता है कि सबसे पहले कंक्रीट का इस्तेमाल 8,000 साल पहले हुआ था. सीरिया और जॉर्डन के व्यापारी फर्श, इमारतें और जमीन के नीचे जलाशय बनाने में कंक्रीट का इस्तेमाल करते थे. बाद में रोमन कंक्रीट के महारथी के तौर पर जाने जाने लगे. उन्होंने 113-125 ई. सन् में पैनतिअन का निर्माण किया, जो बिना किसी सहारे के खड़ा 43 मीटर डायामीटर वाला दुनिया का सबसे बड़ा कंक्रीट का गुंबद है.

लेकिन, आधुनिक समय में इस्तेमाल होने वाला कंक्रीट जिस प्रक्रिया से बनाया जाता है उसका काफी हद तक श्रेय 19वीं सदी में लीड्स के जोसफ एसफिन की पेटेंट कराई गई प्रक्रिया को जाता है. उनकी चूना पत्थर और चिकनी मिट्टी को ओवन में गर्म करने और फिर ‘कृत्रिम पत्थर’ बनाने के लिए उसे पिसकर पाउडर बनाने की नई तकनीक को अब पोर्टलैंड सीमेंट के तौर जाना जाता है. यह अब भी लगभग सभी आधुनिक कंक्रीट में मुख्य घटक है.

लेकिन, इस सर्वव्यापी इस्तेमाल के बाजवूद पिछले कुछ दशकों में कंक्रीट के पर्यावरणीय प्रभाव का परीक्षण बढ़ गया है. पोर्टलैंड सीमेंट के उत्पादन में सिर्फ धूल पैदा करने वाला उत्खनन शामिल नहीं होता बल्कि इसमें बहुत बड़ी भट्टियों की भी जरूरत होती है, जिनमें बड़ी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है. सीमेंट बनाने की वास्तविक रासायनिक प्रक्रिया से उच्च स्तर तक सीओ2 उत्सर्जित होती है. चीन के अन्य शहरों की तरह शंघाई में भी तेजी से विकास हुआ है.

‘क्या है समाधान’

इस क्षेत्र में काफी प्र​गति हुई है. चैटम हाउस के मुताबिक पिछले कुछ दशकों में नए संयंत्रों की ऊर्जा कुशलता में सुधार और जीवाश्म ईंधन की बजाय अपशिष्ट सामग्री जलाने से प्रति टन उत्पादन में औसत सीओ2 उत्सर्जन 18% घट गया है. नई स्थापित ग्लोबल सीमेंट एंड कंक्रीट एसोसिएशन (जीसीसीए) भी सीओपी24 में शामिल हुई. यह एसोसिएशन दुनिया की सीमेंट उत्पादन क्षमता के 35% का प्रतिनिधित्व करती है.

इसके चीफ एग्जिक्यूटिव बेंजामिन स्पॉर्टन कहते हैं कि तथ्य यह है कि संगठन के मौजूद होने का मतलब “जलवायु परिवर्तन पर काम करने के साथ-साथ स्थायित्व के लिए उद्योग की प्रतिबद्धता का प्रदर्शन है.” इस संबंध में जीसीसीए स्थायित्व ​दिशानिर्देश जारी करने वाला है जिनका इसके सदस्यों को अनिवार्य रूप से पालन करना होगा. बेंजामिन स्पॉर्टन कहते हैं, ”नेतृत्व प्रदान करने और ध्यान केंद्रित करने के ​लिए वैश्चिक खिलाड़ियों को साथ लाकर, साथ ही एक विस्तृत कार्य योजना देकर, हम सीमेंट और कंक्रीट के लिए एक टिकाऊ भविष्य सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं.”

लेकिन, इस वादे के बावजूद चैटम हाउस का कहना है कि उद्योग वर्तमान उपायों की सीमाओं तक पहुंच चुका है. यदि यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन पर 2015 के पेरिस समझौते में की गईं प्रतिबद्धताओं को पूरा करना चाहता है, तो इसकी उम्मीद अब सिर्फ सीमेंट बनाने की प्रक्रिया को ठीक करने में ही बची हुई है. उसे जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करने के साथ-साथ प्रक्रिया में सुधार पर भी ध्यान देना चाहिए.

क्लिंकर- एक बड़ा प्रदूषक

क्लिंकर(सीमेंट के ढेले) सीमेंट का मुख्य घटक है. सीमेंट बनाने में सबसे ज़्यादा सीओ-2 का उत्सर्जन “क्लिंकर” बनाने की प्रक्रिया से होता है.

1. कच्चा माल, खासतौर पर चूना पत्थर और चिकनी मिट्ठी, इनका उत्खनन किया जाता है और फिर पिसा जाता है.

2. पिसे हुए कच्चे माल को अन्य लौह अयस्क या राख जैसी सामग्री के साथ मिलाया जाता है.

3. इन्हें बहुत बड़ी गोलाकार भट्टियों में डालकर 1450 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है.

4. इस तरह गर्म होकर सामग्री कैल्शियम ऑक्साइड और सीओ2 में टूट जाती है.

5. इससे छोटे-छोटे ढेलों के आकार में क्लिंकर बनता है.

6. क्लिंकर ठंडा, पिसा हुआ और जिपसम व चूना पत्थर के साथ मिश्रित होता है.

7. सीमेंट को कंक्रीट कंपनियों के पास भेजा जाता है.

साल 2016 में, वैश्विक सीमेंट उत्पादन में 2.2 अरब टन सीओ-2 का उत्सर्जन होता है, जो वैश्चिक स्तर पर उत्सर्जित होने वाली सीओ-2 का 8% है.  थर्मल दहन के साथ इस क्षेत्र के कुल उत्सर्जन का 90% क्लिंकर के उत्पादन से होता है. इसके चलते फ्लेक्सी प्रेसटन और उनके सहकर्मी मानते हैं कि सीमेंट उद्योग को सीओ-2 उत्सर्जन में कमी के लिए जल्द ही रणनीति बनानी चाहिए. आगे बढ़ने के लिए जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को कम करने के अलावा दूसरा रास्ता अपनाना होगा. प्रेसटन का कहना है, ”इस अंतराल को कम करने के लिए हमने एक लंबा रास्ता तय किया है.” वह कहते हैं कि उद्योग को इसके लिए नए तरह के सीमेंट के लिए प्रयास करने की ज़रूरत है. यहां तक कि ‘लो-कार्बन सीमेंट’ और ‘नोवल सीमेंट’ कंक्रीट की ज़रूरत को कम कर सकते हैं.

नया सीमेंट

बायोमेसन की सह-संस्थापक और सीईओ जिंजर क्रीग डोज़ियर नए सीमेंट के विकल्प को बढ़ावा दे रही हैं. यह उत्तरी कैरोलिना में एक नया स्टार्टअप है, जो बायो कंक्रटी ईंटों के विकास में खरबों बैक्टीरिया का इस्तेमाल करता है. इस तकनीक में मोल्ड्स में रेत डाली जाती है और उसमें माइक्रोऑर्गेनिज़्म्स इंजेक्ट किए जाते हैं. यह मूंगा बनाने जैसी प्रक्रिया को शुरू कर देता है.

क्रीग डोज़ियर कहती हैं, ”मुझे समुद्री सीमेंट और संरचनाओं के प्रति एक लंबे समय से आकर्षण रहा है.” वह खुद एक आर्किटेक्ट हैं और वह 10 साल पहले तब हैरान हो गईं जब उन्हें काफ़ी ढूंढ़ने पर पता चला कि ईंटों और चिनाई के लिए कोई पर्यावरण हितैषी विकल्प नहीं है. इस खोज से उन्हें अपना समाधान बनाने के लिए प्रेरित किया. कई सालों की खोज के बाद वह इस तरीके तक पहुंची जिसमें जीवाश्म ईंधन और गर्म करने की जरूरत नहीं होती.

क्रीग डोज़ियर मानती हैं कि कार्बन अभिग्रहण और भंडारण को बदलने की बजाय हमें उन तकनीकों में अधिक निवेश करना चाहिए जो सक्रिय रूप से वायुमंडल से कार्बन को हटा दें.

ये भी हैं मुश्किलें

जहां वै​कल्पिक सीमेंट एक उम्मीद की किरण जगाता है वहीं, आज की ज़रूरतों को बदलती तकनीक के साथ पूरा करने पाने की क्षमता मुश्किलें बढ़ा देती हैं. डिजिटलकरण, मशीन के उपयोग और स्थायित्व को लेकर बढ़ती जागरूकता ने सीमेंट उद्योग के काम करने के तरीके पर असर डाला है. लोगों की ज़रूरतें बढ़ रही हैं और उसे देखते हुए नई आकार और प्रकार की इमारतों के बारे में सोचा जा रहा है. ऐसे में चुनौती ये है कि क्या नई पर्यावरण हितैषी तकनीक इन ज़रूरतों को पूरा कर पाएगी.

इसके अलावा सीमेंट उत्पादन करने वालीं छोटी कंपनियां भी इस क्षेत्र में हावी हैं. ये कंपनियां नए प्रयोग और बदलाव को ज़्यादा महत्व नहीं देतीं. वहीं, आर्किटेक्ट्स, कॉन्ट्रैक्टर और क्लाइंट्स भी पर्यावरण को लेकर सजग नहीं दिखते. फ्लेक्सी प्रेसटन कहते हैं, ”यह बहुत धीरे चलने वाली प्रक्रिया है. इस क्षेत्र ने इन बाधाओं से टक्कर लेनी शुरू कर दी है.” लेकिन, बहुत कम लो-कार्बन सीमेंट का व्यावसायीकरण हो पाया है. लोगों तक इसकी पहुंच बहुत कम है और निर्माण कार्य से जुड़े बड़े उद्योगों में भी इसका इस्तेमाल नहीं हो रहा है. ऐसे में इसकी पहुंच बढ़ाने के ​लिए सरकार की मदद की ज़रूरत है.

बिना सरकारी दबाव और फंड के लो-कार्बन सीमेंट की अगली पीढ़ी को प्रयोगशाल से बाहर लाना और समय पर बाज़ार में पहुंचना संभव नहीं हो पाएगा. ग्लोबल वार्मिंग पर अग्रणी अंतरराष्ट्रीय निकाय ‘इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज’ ने पिछले महीने कहा था कि वैश्विक औसत तापमान वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस नहीं बल्कि 1.55 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने की आवश्यकता है. 2 डिग्री सेल्सियस की बात पैरिस समझौते में कही गई है. इसका मतलब है कि साल 2030 तक 2010 के स्तर से सीओ2 उत्सर्जन में 45% की गिरावट की ज़रूरत है.

बड़े स्तर की परियोजनाओं में कंक्रीट का इस्तेमाल होता है. अन्य नई कंपनियों की तरह क्रीग डोज़ियर भी इस व्यापक निर्माण उद्योग के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए एक साथ अपने उत्पादों के विकास व मार्केटिंग और विनिर्माण प्रक्रियाओं को बढ़ाने में मुश्किलों का सामना करती हैं. हालांकि, उनका मानना है कि उनके पास उम्मीद बनाए रखने के कारण हैं. वह कहती हैं, ”निर्माण उद्योग उस बिंदु पर पहुंच गया है जहां वैकल्पिक सामग्री को बड़े स्तर पर अपनाया जा रहा है. यह बाज़ार की मांग, अन्य नवीन तकनीकों और जलवायु परिवर्तन के प्रति चिंता के कारण हो रहा है.” वहीं, फ्लेक्सी प्रेसटन कहते हैं कि यह ज़रूरी है कि सरकार और उद्योग अब तेजी से कार्य करें क्योंकि इस समय वैश्विक विकास में वृद्धि होने की उम्मीद है और साथ ही हमें सीओ-2 उत्सर्जन में गिरावट की भी ज़रूरत है.

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