कांशीराम के झूठ ने बनाया था मायावती को मुख्यमंत्री

उत्तरप्रदेश, देश के सबसे बड़े और सबसे उपजाऊ राज्यों में से एक. जनसंख्या में अव्वल पर विकास के कई पैमानों पर, देश में एकदम फिसड्डी. अब भी बहुत हद तक जातिवाद और क्षेत्रवाद के जहर से जूझता. राजनीति में परिवारवाद से बेहाल. पर इसी उत्तरप्रदेश की एक नेता है जो कांग्रेस की राजनीतिक शिथिलता और पतन के दौर में यहां की राजनीति में नए तरह की सनसनी बनकर आई और आज भी उसका कोई भरोसा नहीं रहता कि कब सारे राजनीतिक विश्लेषण को धता बताकर अचानक से यूपी के राजनीतिक मैदान की सबसे सफल योद्धा बनकर उभर जाए. सही अंदाजा है आपका, बात मायावती की हो रही है.

माना जाता है कि मायावती चुनाव हारें या जीतें, उनके वोटर्स को कोई भी उनसे नहीं छीन सकता. उनके लोग कभी मायावती से कभी धोखा नहीं करते. आखिर करोड़ों की नोटों की माला पहनने वाली, लाखों का हीरे-मोतियों का हार पहनने वाली, जीते जी अपनी मूर्तियां लगवाने वाली, टिकट के बदले पैसा लेने और आय से अधिक संपत्ति के तमाम मामलों में घिरी इस नेता के अंदर कौन सा ऐसा जादू है जिसके जरिए ये यूपी में तमाम राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को थोड़ा सा ध्यान चुनावों से हटते ही पटखनी देने का माद्दा आज भी रखती है.

वैसे मायावती की जीवन यात्रा पर पत्रकार अजय बोस ने किताब लिखी है. ‘बहनजी’ नाम की इस किताब का हाल ही में रिवाइज्ड संस्करण पेंग्विन बुक्स से छपकर आया है. किताब के विमोचन पर मायावती के पुराने सहयोगी और बसपा से राज्यसभा सांसद रह चुके शाहिद सिद्दीकी ने कुछ दिलचस्प खुलासे किये. शाहिद सिद्दीकी ने बताया कि मायावती के जीवन में कांशीराम ने असल में किंगमेकर की भूमिका निभाई. उत्तर प्रदेश में पहली जीत के बाद अखबारों में यह बात जानबूझकर फैलाई गई थी कि कांशीराम बीमार है ताकि मायावती को मुख्यमंत्री के तौर पर चुना जा सके. जबकि असलियत यह थी की कांशीराम बीमार नहीं थे. सिद्दीकी ने बताया कि उस वक्त वे हॉस्पिटल में ही थे. सिद्दीकी का मानना है कि शायद कांशीराम भविष्य में खुद को प्रधानमंत्री के तौर पर प्रस्तुत करना चाहते थे. इसलिए मुख्यमंत्री के तौर पर सिमटने के हालत से बचने के लिए मायावती को उतरप्रदेश का ताज सौंप दिया.

अपनी यादों को कुरेदते हुए शाहिद सिद्दकी ने मायावती से जुड़े एक और दिलचस्प दिलचस्प वाकये का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि मायावती अपने उभार के दिनों में साहसी और मिलनसार होने की जगह पर अपने आसपास के लोगों से डरने लगीं थीं. उन्हें सत्ता का सबसे तुच्छ डर सताने लगा था की कहीं कोई उनपर हमला न कर दे. मुझे अब भी याद है कि मायावती की चुनावी रैलियों से पहले मायावती खुद के लिए ट्रकों में बाथरूम और सोफे सेट से जुड़े सारे सामान लादकर चुनावी रैलियों में पहुंचवा देती थीं. इन सारे सामनों का केवल मायावती इस्तेमाल करती थी. सोफे पर हाथ रखने के बाद और किसे से हाथ मिलाने के बाद तौलियों का इस्तेमाल करना मुझे अब भी याद है. दलितों की नेता द्वारा की जा रही यह हरकत मेरे लिए बहुत दुखदायी थी. ब्राह्मणवाद से लड़ाई के बीच हमारी नेता इतना नीचे गिर चुकी थीं कि उन्हें पता भी नहीं था की वह खुद ब्राह्मणवादी हो गयीं हैं.

पर इतना सब होने के बाद भी आज भी वो कौन लोग हैं जो मायावती को अपना मसीहा मानते हैं? और चाहे लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा के, उनका वोट बसपा के ही पक्ष में जाता है? क्यों मायावती भाषण देते वक्त अक्सर पढ़कर ही बोलती हैं? कैसा रहा है मायावती का बचपन? और क्या उन्हें बनाता है सबसे खास? इसे समझने के लिये आइये जानते हैं मायावती के बचपन के बारे में- ‘मायावती के दादा ने कहा, मेरा वंश तो मेरी पोतियां ही चलाएंगीं’

ये एक दिलचस्प बात है कि बचपन से ही मायावती के आदर्श और हीरो उनके पिता प्रभुदास नहीं बल्कि दादा मंगलसेन रहे है. पिता प्रभुदास के साथ तो मायावती के संबंधों में अक्सर तनाव ही रहा है. मायावती के दादा मंगलसेन, अंग्रेजी सेना में सिपाही रह चुके थे और उन्होंने पहले विश्व युद्ध के दौरान इटली में लड़ाई में भाग लिया था. मायावती भी अपने दादा को बहुत प्रिय थीं और उन्हें दादा से बहुत लाड मिलता था. मायावती अपने दादा की बुद्धिमानी, ऊंचे विचारों और निष्पक्षता की बहुत तारीफ करती हैं. मायावती ने अपनी आत्मकथा (बसपा द्वारा 2006 में प्रकाशित ‘कुमारी मायावती- माई लाइफ ऑफ स्ट्रगल ऐंड द पाथ ऑफ बहुजन मूवमेंट’) में लिखा है कि उनके दादा मंगलसेन सत्यनिष्ठ और प्रगतिशील थे. सारा गांव उनके विचारों की सराहना करता था और उनकी सलाह लेने के लिए उनके पास आता था. अक्सर वे ही गांव के विवादों को सुलझाया करते थे.

बड़े प्रशंसा के भाव से मायावती याद करती हैं कि अपनी पत्नी की मौत के बाद उनके दादा ने दूसरी शादी करने से इंकार कर दिया था. वो भी ऐसी हालत में जब उनके बेटे प्रभुदास की उम्र छह बरस की ही थी. मित्रों और रिश्तेदारों की दोबारा शादी करने की सलाह की परवाह न करते हुए उन्होंने अकेले ही अपने बेटे को पाला. इसकी तुलना में मायावती के मन में अपने पिता के प्रति खुल्लमखुल्ला अवहेलना की भावना रहती है क्योंकि दूसरी पत्नी लाने के सिलसिले में उनके पिता प्रभुदास रिश्तेदारों की सलाह मानने को तैयार थे. वो भी इसलिए क्योंकि मायावती की मां रामरती देवी ने एक के बाद एक तीन बेटियों को जन्म दिया था. इसपर रिश्तेदारों ने प्रभुदास कहा था कि अपने पिता का अकेला बेटा होने की वजह से वंश का नाम चलाने के लिए बेटे को जन्म देना उनका (प्रभुदास का) कर्तव्य है. इससे उनकी मां रामरती देवी को कई तरह से परेशान भी किया गया. कई वर्ष बाद भी मायावती को अपनी मां का ये दुख और बेइज्जती याद थी. जो उनके पिता की पुत्र पाने की व्यग्रता की वजह से उनकी मां ने महसूस की थी. तभी शायद वे अपने पिता को तमाम मौकों पर जलील करने की हद तक सुना दिया करती थीं. कांशीराम के मामले में भी ऐसा वाकया है. खैर उसका जिक्र आगे कभी.

पर मायावती लिखती हैं कि वे मंगलसेन (दादा) ही थे जिन्होंने जबरदस्ती करके अपने बेटे (प्रभुदास) को दोबारा शादी करने से रोका. इसके साथ-साथ उनके दादाजी ने पिता प्रभुदास और उनके साथियों को बुलाकर यह भी कहा था कि ‘मेरे वंश को तो मेरी पोतियां ही चलाएंगीं. हम अपनी पोतियों को ही अच्छी तरह पढ़ाएंगें, लिखाएंगे और उन्हें होनहार भी बनाएंगें.’ इसके बाद से ही मायावती की मां को तानों से राहत मिल सकी. हालांकि कुछ ही वक्त बाद उन्होंने एक के बाद एक छ: लड़कों को जन्म दिया.

पर मायावती के जेहन से ये सारी बातें कभी नहीं मिटीं. तभी शायद, जब सपा-बसपा के गठबंधन की सरकार 1993 में बनी. मुलायम सिंह मुख्यमंत्री हुए और मायावती को सरकार में उनके प्रभाव के कारण ‘महामुख्यमंत्री’ कहा जाने लगा तब एक रोज मायावती के पिता लखनऊ आकर उनसे मिले और बादलपुर (पहले गाजियाबाद जिले में और अब गौतमबुद्ध नगर में पड़ने वाला मायावती का पुश्तैनी गांव) के लिए खास योजनाओं की घोषणा करने का आग्रह किया. तो उत्तर देते हुए मायावती ने ताना दिया था, “आपका वंश तो आपके बेटे चलाने वाले हैं. उन्हें अपने गांव बादलपुर ले जाओ और उन्हीं से गांव की तरक्की करवा लो, सड़कें बनवा लो, बस चलवा लो, अस्पताल बनवा लो.” यानी मायावती की राजनीति चाहे जैसी भी हो पर उन्होंने अपने दादा की कही बात को सही साबित कर दिखाया.

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