Life of Muslim girls hailing from the hill pundit krishan chand pant at khora gaziabad

पहाड़ी पंडित संवार रहा मुस्लिम लड़कियों का जीवन

समाज में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो सामाजिक ताने बाने को तोड़ने की ताक में रहते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग होते हैं जो बिना किसी लालच या लोभ के सामाजिक समरसता के लिए काम करते हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं गाजियाबाद के खोड़ा इलाके  में रहने वाले कृष्ण चंद्र पंत । ये उन लड़कियों की राह आसान बना रहे हैं, जो पढ़ना चाहती हैं। समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहती हैं। कृष्ण चंद्र पंत  पिछले 11 सालों से ‘रास्ता’  नाम से एक स्कूल चला रहे हैं। खास बात ये है कि इस स्कूल में पढ़ने वाली 60 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियां मुस्लिम समाज से हैं। यहां से पढ़ चुकी कई ऐसी मुस्लिम लड़कियां  हैं जिनको कभी घर से बाहर कदम रखने की इजाजत तक नहीं होती थीं, लेकिन आज वो अपने पैरों पर खड़े होकर घर चला रही हैं। यूपी सरकार  से मान्यता प्राप्त इस स्कूल में फिलहाल 9 सौ से ज्यादा लड़कियां यहां पढ़ रही हैं।

rasta school children in class room

देश में साक्षरता का सबसे कम अनुपात मुस्लिम समुदाय  का है। 2011 की जनगणना के अनुसार केवल 58 प्रतिशत मुस्लिम ही साक्षर हैं। उसमें भी मुस्लिम लड़कियों की साक्षरता दर और भी कम है। ऐसी ही बातों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली से सटे खोड़ा में करीब 11 साल पहले कृष्ण चंद्र पंत  ने इन लड़कियों को आधुनिक और स्कूली शिक्षा देने की शुरूआत की। करीब 20 सालों तक कृष्ण चंद्र पंत ने दिल्ली में कई एनजीओ के साथ काम किया। इस दौरान वो ‘प्लान एनजीओ’ के प्रोजेक्ट के साथ एक ट्रैनर के रुप में जुड़ गये। इसमें वो जमीनी स्तर पर किस तरह शिक्षा के लिए काम किया जाय इसकी वो लोगों को ट्रेनिंग देते थे। इस दौरान उनके दोस्त विनोद खन्ना जो कि एक रिटायर्ड आईएफएस थे, ने उनको चुनौती दी कि अगर उनमें हिम्मत है तो वो मुस्लिम लड़कियों को स्कूल में पढ़ाकर दिखाएं। कृष्ण चंद्र पंत बताते हैं कि

मैंने उनसे कहा कि मैं तो एक शिक्षक हूं और मेरा काम पढ़ाना है। तब मैंने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए 2007 में खोड़ा में एक स्कूल  की शुरूआत की। इसके लिए मैंने मदरसे में जाकर वहां पर लोगों से बात की। साथ ही उनके माता पिता से भी उन लड़कियों को अपने स्कूल में भेजने के लिए कहा।

रास्ता स्कूल  को उन्होने अपनी संस्था ‘रास्ता सोसाइटी’  के अन्तर्गत शुरू किया था जिसे उन्होने 1994 में रजिस्टर्ड करवाया था। मुस्लिम बहुल इलाका होने के कारण यहां पर 60 प्रतिशत से भी ज्यादा जनसंख्या मुस्लिमों की है। इसलिए कृष्ण चंद्र पंत  ने यहां पर स्कूल खोलने का फैसला किया। शुरूआत में उनका ये फैसला गलत साबित हो रहा था, क्योंकि कोई भी परिवार अपनी लड़की को स्कूल भेजने के लिए तैयार नहीं हुआ। बावजूद कृष्ण चंद्र पंत ने ठान लिया था कि वो अपने कदम पीछे नहीं खीचेंगे। इसलिए उन्होने तय किया कि वो खुद घर घर जाकर बच्चों के माता पिता से मिलेंगे, साथ ही समाज के ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ेंगे जो लोगों को समझाएं कि वो अपनी लड़कियों को पढ़ाई के लिए स्कूल भेजें। उनकी इस कोशिश का असर दिखने लगा और इस तरह करीब 50 लड़कियों के साथ उन्होने स्कूल की शुरूआत की। जल्द ही ये संख्या बढ़कर 300 हो गई, जबकि आज यहां पर 9सौ लड़कियां शिक्षा हासिल कर रही हैं। इनमें से 60 प्रतिशत से भी ज्यादा लड़कियां मुस्लिम समुदाय  से हैं। शुरूआत में इन लड़कियों को शिक्षा के साथ-साथ किताबें और ड्रैस भी मुफ्त दी जाती थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार  से 8वीं तक मान्यता मिलने के बाद इस स्कूल को स्वावलंबी बनाने के लिए उन्होने यहां पर 300 रुपये फीस रखी है।

rasta school children with his teacher

पिछले 11 सालों में यहां पढ़ने वाली कई लड़कियां 12वीं तक की पढ़ाई पूरी कर चुकी हैं और कुछ तो सिलाई और पार्लर का काम सीख कर खुद अपना और अपने परिवार का खर्च चला रही हैं। कृष्ण चंद्र पंत ने बताया कि

ऐसी ही एक लड़की सरताज है। जिसके माता-पिता उसकी पढ़ाई छुड़ाकर उसकी शादी करना चाहते थे। तब उस लड़की ने एक दिन स्टेज पर आकर दूसरे बच्चों के सामने कहा कि वो शादी नहीं करना चाहती और पढ़ना चाहती है। आज वो ही लड़की अपने 12 भाई बहनों की परवरिश खुद का बुटिक खोलकर कर रही है।

रास्ता स्कूल  को केवल 8वीं तक मान्यता मिली हुई है। यही वजह है कि जो लड़कियां आगे पढ़ना चाहती हैं ये उनकी 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं ओपन स्कूल के जरिए दिलाते हैं। आज भले ही यहां रहने वाले लोग खुशी खुशी अपनी लड़कियों को स्कूल भेजते हों, लेकिन शुरूआत में कृष्ण चंद्र पंत  को खोड़ा में चल रहे मदरसों और मौलवियों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। मौलवी उनसे कहते थे कि एक पंडित, मुस्लिम समाज की लड़कियों को खराब कर रहा है। उस समय सबसे बड़ी दिक्कत लड़कियों का नियमित तौर पर स्कूल ना आना होता था। तब जो भी लड़की स्कूल छोड़ती कृष्ण चंद्र पंत लड़की के पड़ोसी और रिश्तेदारों के जरिए उस लड़की के परिवार वालों को समझाते कि वो अपनी लड़की को स्कूल भेजें और शिक्षा ही वो जरिया है जिसकी मदद से उनकी गरीबी दूर हो सकती है। धीरे-धीरे स्थानीय लोगों को उनकी ये बात समझ में आने लगी। जिस परिवार से ये लड़कियां आती थीं वहां पर पर्दा प्रथा थी। तब लड़कियां स्कूल तो आ जाती थी लेकिन किसी भी बाहरी गतिविधी जैसे खेल कूद या दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लेती थी। तब कृष्ण चंद्र पंत ने शुरूआत में स्कूल में ही खेलों का आयोजन कर लड़कियों के माता-पिता को स्कूल में बुलाना शुरू किया। आज यही लड़कियां ना केवल खेलकूद में बल्कि कई सांस्कृतिक गतिविधियों  में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं और स्टेज पर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं।

‘रास्ता’ नाम का ये संगठन  गुड़गांव में कंस्ट्रक्शन साइट में काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के लिए भी 5 डे केयर सेंटर चला रहा है। यहां पर 1 महीने से लेकर 12 साल तक की उम्र के बच्चों का लिया जाता है। ये सेंटर सुबह 8 बजे से 5 बजे तक चलता है। इन बच्चों को यहां पर भोजन के साथ साथ उनकी देखभाल और पढ़ाई करायी जाती है। इन सेंटरों में बच्चों की संख्या घटती बढ़ती रहती है इस समय यहां पर करीब 250 बच्चे हैं। साथ ही नोएडा सेक्टर 73 और 74 में भी वो कूड़ा बीनने वाले और दूसरे गरीब बच्चों के लिए भी एक सेंटर चला रहे हैं जहां पर करीब 450 बच्चे शिक्षा ले रहे हैं।

 

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