इस पहाड़ी युवा ने बनाई लाखों कमाई करने वाली कम्पनी

फर्श से अर्श तक पहुँचने की कई कहानियां हमने अबतक पढ़ी। हमने देखा कि दृढ़ संकल्प, कठिन मेहनत और कभी न हार मानने वाला ज़ज्बा इन तीन दमदार हथियार से परिस्थितियां बदली जा सकती है। हमारी आज की कहानी के नायक का सफर भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से ओतप्रोत है।

कभी वेटर की नौकरी करने वाले उत्तराखंड के रंजीत सिंह आज एक सफल मोमोज शॉप की श्रृंखला के मालिक हैं। लेकिन सफलता के इस पायदान तक पहुँचने में उन्हें कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले। रंजीत भले ही आज लाखों की कमाई कर रहे हैं लेकिन एक दौर था, जब खाने को तो दूर, दुधमुंही बच्ची के लिए दूध तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। दो वक्त की रोटी के लिए उन्हें वेटर से लेकर कोठी में हेल्पर तक की नौकरी करनी पड़ी थी। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया और अपनी कामयाबी से मिसाल कायम की।

आज रंजीत की नवाबों की नगरी लखनऊ में नैनीताल मोमोज नाम से तीन बड़ी रेस्तरां है जहाँ 50 तरह के मोमोज परोसे जाते हैं। इतना ही नहीं यह 30 से ज्यादा लोगों की आजीविका का जरिया भी है।

पैसे और नौकरी की चाह में महज 17 साल की उम्र में रंजीत ने राजधानी लखनऊ की ओर रुख किया। काफी ढूंढने के बाद भी उन्हें ढंग की कोई नौकरी नहीं मिली। अंत में उन्होंने एक कोठी में हेल्पर की नौकरी करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों तक यहाँ काम करने के बाद वे महानगर में यात्री निवास में नौकरी करने गए, यहाँ उन्हें वेटर का काम मिला। काम में उन्हें कुछ पैसे मिलते थे, जिसे वे अपने घर भिजवाया करते थे।

लेकिन इसी दौरान एक दिन ऐसी घटना हुई जिससे वे पूरी तरह टूट गये। दरअसल, यात्री निवास के ही एक वेटर का हाथ जल गया था, जिसके बाद से उसे नौकरी नहीं मिली। रंजीत को लगा ऐसा मेरे साथ भी हो सकता है, इसी डर के साथ उन्होंने इस काम को छोड़ होटल इंडस्ट्री में कदम रखा और खाना बनाना सीखने लगे।

कुछ दिनों में काम सीखने के बाद वे लखनऊ के चिड़ियाघर के सामने पूरी-सब्जी का ठेला लगाने लगे लेकिन यहाँ भी बात नहीं बनीं। सुबह से शाम हो गई और उनकी एक भी पूरी नहीं बिकी। वे निराश हुए लेकिन हार नहीं मानीं।

News Trust of India  से ख़ास बातचीत में उन्होंने बताया कि पूरी-सब्जी बेचने का आइडिया नहीं चलने के बाद उन्होंने होटल में टिप से जुटाए बचे पैसों से चाऊमीन के पैकेट खरीदे और राणा प्रताप मार्ग पर चाऊमीन का ठेला लगाया। सुबह से शाम में उन्हें 40 रुपए की कमाई हुई। कम ही सही लेकिन इस आमदनी से उनकी हिम्मत जागी और फिर ऐसे डिशेस की तलाश शुरू कर दी जिसकी ज्यादा माँग हो।

उन्होंने पाया कि मोमोज का बिजनेस कम है और फिर साल 2008 में शुरू कर दी मोमोज की बिक्री। लेकिन दुर्भाग्य से यहाँ भी उन्हें नाकामी हाथ लगी और एक साल तक मोमो नहीं बिके। फिर उन्होंने मोमो को अलग अंदाज में पेश किया, बिक्री होने लगी और उनकी हिम्मत भी बढ़ने लगी। धीरे-धीरे कारोबार बढ़ा तो उन्होंने पत्रकारपुरम पर छोटी शॉप खरीदी, मार्केट के अलग-अलग फंडे अपनाये।

जायकेदार मोमोज की एक विशाल श्रृंखला पेश करते हुए उन्होंने अपने दायरे को बढ़ाया। बढ़ती माँग को देखते हुए उन्होंने और भी दो दुकाने खोली। उन्होंने स्टीम्ड मोमोज के अलावा तंदूरी मोमोज, ड्रैगन फायर मोमोज, चीज मोमोज, चॉकलेट मोमोज जैसे 50 प्रकार के मोमोज ग्राहकों के सामने पेश किया।

आज नैनीताल मोमोज लखनऊ की एक प्रसिद्ध मोमो शॉप बन चुकी है और रंजीत निरंतर अपने कारोबार को नए पायदान पर बिठा रहे हैं। रंजीत की सालाना कमाई लाखों में पहुंच चुकी है.

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