रोड़ नहीं तो वोट नहीं- गांवों में चुनाव बहिष्कार का ऐलान

पिथौरागढ़: एक तरफ़ चुनाव आयोग मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित कर रहा है,  दूसरी तरफ़ पिथौरागढ़ के आधा दर्जन से ज़्यादा गांवों में लोकसभा चुनाव आने के साथ ही बहिष्कार का नारा बुंलद होने लगा है. ऐसा नही है कि ये लोग व्यवस्था विरोधी हैं लेकिन जब सैकड़ों फरियादें अनसुनी रह जाएं तो विकास की बाट जोह रहे लोगों के पास शायद यही एक रास्ता बच जाता है.

चीन और नेपाल सीमा से सटे पिथौरागढ़ के कई इलाके आज भी ऐसे हैं, जहां ज़रूरी सुविधाएं आज़ादी के सत्तर सालों में भी नही पहुंच पाई हैं. यहां के लोग दशकों से शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क की मांग करते-करते थक गए हैं. बावजूद इसके हुक्मरानों की नींद नहीं टूटी. ऐसे में मजबूर हो कर विकास की चाह रखने वाले ग्रामीणों ने चुनाव बहिष्कार को अपना हथियार बना डाला है.

धारचूला, मुनस्यारी और बेरीनाग तहसील के आधे दर्जन से अधिक गांवों के लोग हर बार चुनाव बहिष्कार को मजबूर होते हैं लेकिन हमारी व्यवस्था कभी भी उनकी मांगों को पूरा नही कर पाती. पालात भुवनेश्वर से सटे करीब 4 गांवों ने पिछले लोकसभा चुनावों में भी ‘रोड नहीं, तो वोट नहीं’ का नारा बुलंद किया था. विधानसभा चुनावों में भी इन्होनें बहिष्कार का ऐलान किया था. लेकिन तब प्रशासन इन्हें मनाने में सफल रहा.

विधानसभा चुनाव गुज़रे दो साल हो गए हैं लेकिन इनका संघर्ष अब भी जारी है. कुछ ऐसा ही गांधीनगर, साईपोलू, क्वीरी-जीमीया, राथीं, नामिक, कनार और मेतली गांव के लोगों के साथ भी हुआ है. चुनाव बहिष्कार को आमादा अधिकांश गांवों की पहली मांग सड़क की है. सड़क नही होने से इन इलाकों में कई बार अस्पताल पहुंचने से पहले ही लोग काल के गाल में समा जाते हैं.

चामाचौड़ पाताल भुवनेश्वर संघर्ष समिति के अध्यक्ष दिवाकर रावत कहते हैं कि यह बहुत शर्म की बात है कि बार-बार शासन-प्रशासन की ओर से झूठे वादे किए जाते हैं. वह कहते हैं इस बार क्षेत्र में कोई भी वोट नहीं देगा और ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ के अपने संकल्प पर लोग कायम रहेंगे. लोकतंत्र के इस महापर्व में जहां पूरा देश अपनी हिस्सेदारी का बेसब्री से इंतजार कर रहा है वहीं दूसरी ओर बॉर्डर पर बसे ग्रामीणों का दर्द इस बात को साफ बयां कर रहा है कि आज़ाद देश में विकास की केन्द्रीयकृत अवधारणा ने कई दिक्कतें खड़ी की हैं. उम्मीद करनी चाहिए कि हमारे हुक्मरान इस पीड़ा को महसूस करेंगे ताकि इन ग्रामीणों को यकीन हो सके कि इस देश को उनकी भी परवाह है.

 

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