नेताओं की रैलियों में आने वाली भीड़ के मायने

(मोहन भुलानी)

चुनाव के समय नेताओं की रैलियों में आने वाली भीड़ असल में बेहतर कल की उम्मीद लिए आती है। वह विभिन्न दलों द्वारा कई बार ठगे जाने के बाद भी लोकतंत्र में अपने अटूट विश्वास के कारण ईमानदार लोकतांत्रिक सरकार के गठन को इच्छुक रहती है। लिहाजा, चुनाव के समय वोटरों को लुभाने के लिए प्रत्याशी जितनी मेहनत करते हैं, उसका अगर आधा भी विजयी होने के बाद अपने क्षेत्र के विकास के लिए करें, तो कई बुनियादी समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकता है।

मगर नेता और व्यवसायी में फर्क होता है। खरीदकर या चापलूसी से टिकट प्राप्त करके तमाम दांव-पेच खेलकर सदन में पहुंचने वाला उम्मीदवार व्यवसायी और अवसरवादी हो सकता है, नेता नहीं। आज ऐसे उम्मीदवारों को ही नकारने का वक्त है, जो राजनीति किसी सेवा के लिए नहीं, बल्कि मेवा पाने के लिए कर रहे हैं। जिस दिन लोग भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि सही-गलत का फैसला करके वोट डालने लगेंगे, उस दिन से ऐसे उम्मीदवार खुद गायब हो जाएंगे।

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