पब्लिक के दम से द्वारका में लौटी प्रकृति

लोगों की कोशिश से दम तोड़ रहे एक पारंपरिक जोहड़ (तालाब) में फिर जीवन का संचार हुआ है। ‘नया जोहड़’ नाम से पहचान पाने वाली इस वॉटर बॉडी में अब 50 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी घूमते हुए देखे जा सकते हैं। यह वॉटर बॉडी द्वारका के सेक्टर-23 में मौजूद है। कुछ साल पहले तक यह तालाब लगभग खत्म होता दिखने लगा था। तब तालाब में गंदे नालों का पानी जमा होता था लेकिन आज यह साफ पानी से लबालब है। तालाब में मौजूद पानी की गुणवत्ता में भी पहले के मुकाबले सुधार है। यह दावा करते हुए वॉटर कंजर्वेटिस्ट दीवान सिंह ने बताया कि अगर लोकल अथॉरिटीज जिम्मेदारी से अपना काम करें तो द्वारका की बाकी वॉटर बॉडीज को भी रिवाइव किया जा सकता है।

सिंह ने बताया कि वह 2012 से इस काम में लगे हैं। तब यहां के 50 गांवों में करीब 183 वॉटर बॉडीज का पता चला था। इनमें 93 वॉटर बॉडीज पूरी तरह सूख चुकी हैं। 63 में गंदा पानी भरा है और करीब 25 जलाशय ऐसे हैं, जिनमें ट्यूबवेल की मदद से पानी भरा जाता है। 2013 में दिल्ली के तत्कालीन एलजी ने वॉटर बॉडीज को फिर से जीवित करने के लिए द्वारका वॉटर बॉडीज कमिटी का गठन किया था लेकिन सरकारी एजेंसियों की रुकावट की वजह से कमिटी काम पूरा नहीं कर सकी।

इसके बाद स्थानीय लोगों ने इसे पूरा करने का बीड़ा उठाया। सबसे पहले द्वारका सेक्टर-23 में स्थित पोचनपुर गांव के पारंपरिक जोहड़ को चुना गया। स्थानीय निवासी रमनदीप मान ने बताया कि शुरुआत में ट्यूबवेल से तालाब में पानी भरा गया। बाद में कैचमेंट एरिया से बारिश का पानी इसमें सीधे गिराने की व्यवस्था की गई। दिल्ली यूनिवर्सिटी की मदद से तालाब के वॉटर लेवल और क्वॉलिटी की जांच कराई गई। पता चला कि जलस्तर में इस साल 2 फीट की बढ़ोतरी हुई है। पानी के टीडीएस में 20 फीसदी की कमी आई है। तालाब के पुनर्जीवित होने से स्थानीय लोग बेहद खुश हैं। उनका कहना है कि पारंपरिक तालाब में जीवन लौटने से यहां के भू-जलस्तर में भी सुधार आया है।

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