दूसरी नागरिकता वास्तव में एक बचाव है

आर्थिक अपराधियों नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और विजय माल्या को देश से भाग कर दूसरे देशों में मजे से रहने में उन की दूसरी नागरिकता बड़े काम की रही. दुनिया में कई देश हैं जो चाहे छोटे हों, अपनी नागरिकता कुछ पैसा जमा कराने के बाद आसानी से दे देते हैं. यह अमेरिकियों, यूरोपियों को हमेशा भाता रहा है और अब जब चीनियों, रूसियों और भारतीयों के हाथों में पैसा आया है, वे भी दूसरी नागरिकताएं लपक रहे हैं.

दूसरे देश की नागरिकता असल में केवल बेईमानी कर के भाग जाने वाले नहीं ले रहे, बल्कि बहुत से सफल लोग भारत की गंदगी, खराब शिक्षा, अव्यवस्थित ट्रैफिक, गंदे पानी, दूषित हवा, डर्टी पोलिटिक्स और शायद सब से बड़ी बात धार्मिक कट्टरता के चलते भी ले रहे हैं.

धार्मिक कट्टरता महसूस नहीं होती क्योंकि हम इस में जीने के आदी हो गए हैं पर यह एक ऐसी जकड़न है जो मन और शरीर दोनों को बांध कर रखती है. कानून को कंट्रोल करने की तिकड़म तो भागने वाला जानता है, साथ ही वह यह भी जानता है कि कानून भी कभीकभार पकड़ ही लेता है.

ऐसे में रामायण और महाभारत के पात्रों की तरह वह भी देश से दूर जा कर अपनों के कहर से बचना चाहता है. राम और पांडवों को अपनों के कारण ही वनवास जाना पड़ा था.

यह यूरोप और अमेरिका की विशेषता है कि वे खालीहाथ या थोड़े पैसे ले कर आए लोगों को आज भी शरण देते हैं.

दूसरी नागरिकता वास्तव में एक बचाव है और उसे चाहे जितना गैरकानूनी कहा जाए, वह उस देश की मानवता की निशानी है. यह भगोड़ों को शरण देना कम, बल्कि मूल देश की निकम्मी व्यवस्था की पोल खोलना ज्यादा है. भारतीय अगर कमाई के लिए बाहर जा सकते हैं तो कानूनों की पेचीदगियों से बचने के लिए वे क्यों न जाएं.

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