प्रेम की सार्थकता सिर्फ उपहारों में ही सिमटी

(मोहन भुलानी)

यह पूरा सप्ताह प्रेम दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। ज्यादातर लोग बढ़-चढ़कर एक-दूजे के लिए उपहारों का आदान-प्रदान करके प्रेम का इजहार कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि आधुनिक प्रेम की सार्थकता शायद उपहारों में ही सिमट गई है। रिश्तों में सिर्फ स्वार्थ और दिखावा नजर आता है। इस धरा पर भगवान से लेकर इंसानों तक ने प्रेम की मिसाल कायम की है, लेकिन आधुनिकता के रंग में लोगों ने प्रेम का अर्थ ही बदल दिया। प्रेम एक पवित्र, निश्छल और हृदय को हर्ष से भर देने वाली अनुभूति है, जिसको बताने या जताने के लिए कोई खास दिन या उपहार की जरूरत नहीं, बल्कि उसमें ईमानदारी चाहिए। हर किसी को यह समझना चाहिए।

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