उत्तराखंड के इस अस्पताल में खेला जा रहा, मौत का खेल

उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार हो या फिर कांग्रेस की हमेशा से ही स्वास्थ्य व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा रहा है। पहाड़ों में अकसर देखा जाता है कि इलाज के अभाव में मरीज ने दम तोड़ दिया जिसकी वजह होता है इलाज ठीक से न होना, ऑपरेशन गलत होना या फिर दवाइयां सही से नहीं मिलना। आज हम आपको जो हकीकत बताने जा रहे हैं वह ये भी बताएगी कि राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था किस कदर मर चुकी है।

इस अस्पताल में खेला जा रहा है मौत का खेल
राज्य के सरकारी अस्पतालों में से एक है हरिद्वार का हरमिलाप हॉस्पिटल। ये जनपद का सबसे बड़ा अस्पताल है, सरकारी होने के कारण लोग यहां कम पैसा खर्च हो इसलिए इलाज के लिए आते हैं। धर्मनगरी होने के कारण यहां वह लोग भी आते हैं, जिनका कोई नहीं होता या यूं कहें कि वह इस गंगा नगरी के ही सहारे होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अस्पताल में मौत का ऐसा खेल खेला जा रहा है जिसको आज तक किसी ने देखने की जरूरत नहीं समझी या फिर ये कह सकते हैं कि संबंधित लोग सबकुछ देखकर विभाग आंखें मूंदकर बैठा है।

लेकिन इस अस्पताल में इलाज किस तरह होता है इस बात का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि साल 2014 से साल 2017 तक जितने भी लोग इस अस्पताल में डॉक्टरों और नर्सों के भरोसे भर्ती हुए हैं, उनमें से एक भी मरीज ठीक होकर या जीवित होकर बाहर नहीं निकला है।

अब आप सोच रहे होंगे कि भला यह कैसे हो सकता है हम आपको बता दें कि ये बात सौ प्रतिशत सही है। दरअसल, इस बात की हकीकत तब उजागर हुई जब हरिद्वार की गंग ज्योति मिशन संस्थान ने सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मांगी कि हरिद्वार जिला अस्पताल में कितने लावारिस लोग जनवरी 2014 से अबतक भर्ती हुए हैं और कितने लोगों को उपचार के दौरान ठीक कर डिस्चार्ज किया गया है।

सूचना के अधिकार में यह भी पूछा गया कि कितने लोगों को इलाज के दौरान डॉक्टर बचा नहीं पाए। इस सूचना के जवाब में जो जानकारी दी गईं वह बेहद चौंकाने वाली हैं। जवाब दिया गया कि साल 2014 जनवरी से 2017 तक जितने लोग भी भर्ती हुए हैं, वह सभी अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठे।

अब आप ये भी सोच रहे होंगे कि भला यह जो आप पढ़ रहे हैं यह सही है या नहीं। तो हम आपको ये बात तथ्यों के आधार पर बता रहे हैं जिसपर आप विश्वास कर सकते हैं। आरटीआई के माध्यम से हमें कुछ आंकड़े मिले हैं, जिन्हें हम आपको बताते हैं।

 

  • इस अस्पताल में 2014 में कुल 67 लावारिस लोग भर्ती हुए, जो यहां से जिंदा वापस नहीं गए।
  • 2015 में 96 लावारिस लोग भर्ती हुए वह भी ठीक होकर वापस घर नहीं जा पाए।
  • 2016 में 87 लावारिस लोग भर्ती हुए, उन्होंने भी दुनिया को अलविदा कह दिया।
  • 2017 में भी हालत कुछ पिछले सालों जैसे ही रहे, 48 लोगों ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।

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