मनचाहा सियासी युद्ध!

(भूपेश पंत, प्रधान संपादक, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया)

मन बड़ा व्यथित है। जिसकी जो मन आ रही है वो कर रहा है। ये मीडिया का भक्ति काल है जो उसी डाल को काट रहा है जिस पर वो बैठा है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का ये दुरुपयोग एक दिन सभी मजलूमों से उनकी आवाज़ छीन लेगा। उन्हें गलतफ़हमी है कि वो बच जाएंगे। लेकिन चारण भाट युग फिर से आ चुका है। ऐसे ही तो नहीं कहते कि इतिहास खुद को दोहराता है। आख़िर उससे सबक लोगे तभी तो दोहराव से बचोगे। जो युद्ध की विभीषिका दिखा कर शांति की बात कर रहे हैं वो अब सबके निशाने पर हैं। कोई उन्हें आज के डरे हुए मोदी भक्त बतला रहा है तो कोई देशद्रोही। बाकी जिनका चुनावी एजेंडा चल रहा है वो तो निर्बाध रूप से जारी है ही। ऐसे लोग शहीदों की अंतिम यात्रा को भी इलेक्शन इवेंट बनाने पर तुले हुए हैं। शहादत हुई है लेकिन उसका जिम्मेदार केवल आतंकपरस्त पाकिस्तान है। दूसरे ज़िम्मेदार को तलाशने वाला सत्ता विरोधी नहीं देशद्रोही है जिसे कुछ लोग सरेआम फांसी देने का फतवा भी जारी कर रहे हैं। निर्दोष कश्मीरियों पर हमलों को लेकर भी मन ही मन एक लाइन खींच दी गयी है।

सबकुछ एक सिस्टम की तरह तैयार किया जा रहा है। माहौल को भी। जो शहीदों के साथ कल भी थे वो आज भी हैं। उनका ये सवाल पूछने का मन है कि अगर सत्तारूढ़ सरकारें चाहे वो किसी पार्टी की रही हों, कल भी अगर शहीदों के साथ थे तो ये आज क्यों हुआ? लेकिन डरते हैं कि राष्ट्रवाद की हुंकार कहीं उन्हें देशद्रोही घोषित न कर दे, फिर भी कई दुस्साहसी खुले मन से बोल रहे हैं। कितना बांट दिया है राष्ट्रवाद की नयी परिभाषा वाले नये भारत ने लोगों के मन को कि दोस्त को दोस्त नहीं सुहा रहा, रिश्तेदारी राजनीतिक खेमों में बंट गयी है, लोग फेसबुक पर भी आंखें चुरा रहे हैं। मन पर हाथ रख कर बताना पांच साल पहले ऐसा होता था क्या? मां बहन की गालियां भक्ति रस की कविताओं की तरह बांटी जा रही हैं और मनमाने तरीके से सत्ता विरोध की भाषा को देश के विरोध में तबदील किया जा रहा है। चैनल टीआरपी की देशभक्ति का ग्राफ ऊंचा कर रहे हैं।

एफ एम चैनल खबरों की देशभक्ति नहीं चला सकते तो वे बुझे मन से बजाते रहो को स्लो मोशन में बजा रहे हैं। देश को आजाद कराने और उसे बचाने वालों की शहादत को धर्म और जाति के आधार पर आंका जा रहा है। सियासत गिद्ध की तरह जवानों की लाशों से चुनावी पैंतरे नोच रही है और दूर कहीं जवानों के परिवार रो रहे हैं। शर्म फिर भी इन्हें आती नहीं। सच कहूं तो ये कहने का मन कर रहा है कि सियासत की ज़मीं खा गयी आसमां कैसे कैसे। दरअसल इसकी एक बड़ी वजह ये है कि हमें अब जुमले सुनने की आदत पड़ गयी है। तो इस बार मेरी आपसे अपील है कि आम चुनाव में पार्टियों और उम्मीदवारों से जुमलों का घोषणापत्र न मांग कर समाधान का वायदापत्र मांगें।

आपको ये पता रहेगा कि जो आपके सामने वोटों की भीख मांग रहे हैं उनके पास आपकी वास्तविक समस्याओं का हल है भी या नहीं। जो सियासत इस रास्ते पर ईमानदारी से चलने को तैयार न हो उसे भी वोट देते समय मन ही मन शहीदों के साथ एक विनम्र श्रद्धांजलि जरूर दे दें। इसी से आपकी देशभक्ति साबित होनी है। और हां जो देश के भीतर एंग्री यंग मैन पैदा किये जा रहे हैं उन्हें भी ध्यान से सुनें, वो क्या कह रहे हैं, ताकि सनद रहे। एक देशभक्त पत्रकार होने के नाते मेरा आज बहुत रोने का मन कर रहा है।

 

About न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

News Trust of India न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

Leave a Reply

Your email address will not be published.

ăn dặm kiểu NhậtResponsive WordPress Themenhà cấp 4 nông thônthời trang trẻ emgiày cao gótshop giày nữdownload wordpress pluginsmẫu biệt thự đẹpepichouseáo sơ mi nữhouse beautiful