भारतीय स्टेट बैंक के घाटे का रहस्य

बैंक ने पिछले वित्तीय वर्ष (2016-17) में 20,339 करोड़ रुपए के फंसे कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया था। यह सरकारी बैंकों में सबसे अधिक राशि है जो बट्टे खाते में डाली गई है। इस प्रकार 2016-17 में बैंकों के बट्टे खाते में कुल मिलाकर 81,683 करोड़ रुपए की राशि डाली गई। ये आंकड़े तब के हैं जब भारतीय स्टेट बैंक में उसके सहयोगी बैंकों का विलय नहीं किया गया था।

सरकार के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक का घाटा लगातार बढ़ रहा है। दो दिन पहले बैंक ने अक्तूबर से दिसंबर 2017 की अवधि यानी चालू वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही के वित्तीय परिणाम जारी किए तो आर्थिक विशेषज्ञों को हैरानी हुई। बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार ने बताया कि इस तिमाही के दौरान बैंक को 2416.37 करोड़ का घाटा हुआ। एक तरफ यह बैंक अपने छोटे उपभोक्ताओं पर नित नए चार्ज लगाकर अपनी कमाई बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ उसका घाटा थमने का नाम नहीं ले रहा। खुद रजनीश कुमार ने माना कि ये वित्तीय परिणाम निराशाजनक हैं। जनसत्ता ने पिछले साल खुलासा किया था कि किस तरह बचत खातों में महज न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने वाले उपभोक्ताओं पर अर्थ दंड लगाकर इस सरकारी बैंक ने महज एक तिमाही (अप्रैल से जून 2017) के दौरान 235 करोड़ रुपए की अतिरिक्त कमाई की थी। कमाई क्या एक तरह से अपने छोटे ग्राहकों को चपत लगाई थी। इस खुलासे के बाद जब देशभर में बहस छिड़ी तो बैंक की तरफ से अर्थदंड की प्रक्रिया में कुछ वर्गों को रियायत देने का एलान हुआ था। पर अब इस बैंक के प्रबंधन ने लुकाछिपी की रणनीति अपना ली।

नीमच (मध्य प्रदेश) के आरटीआइ कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने बैंक से जानकारी मांगी थी कि वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही की तरह दूसरी (जुलाई-सितंबर 2017) और तीसरी (अक्तूबर-दिसंबर 2017) के दौरान अपने बचत खातों में मासिक न्यूनतम औसत बैलेंस नहीं रखने वाले खाताधारकों से उसने अर्थदंड के रूप में कितनी वसूली की। इस बार बैंक ने इस सूचना को ही देने से इनकार कर दिया। बैंक के केंद्रीय सूचना अधिकारी और उपमहाप्रबंधक मुकेश नागपाल ने 29 जनवरी को गौड़ को जवाब दिया कि मांगी गई सूचना वाणिज्यिक विश्वास प्रकृति की है। लिहाजा यह सूचना के अधिकार के कानून से मुक्त है। इस जवाब पर गौड़ की हैरानी स्वाभाविक है क्योंकि जब पिछले साल उन्होंने बैंक से पहली तिमाही के बारे में आंकड़ा मांगा था तो बैंक ने बाकायदा जवाब दिया था। क्या तब यह सूचना वाणिज्यिक विश्वास प्रकृति की नहीं थी। जो भी हो इस बैंक के लगातार बढ़ रहे घाटे के कारण बैंकिंग व्यवस्था की साख पर सवाल उठने लगे हैं। तीसरी तिमाही के वित्तीय परिणाम बताते हैं कि इस अवधि में बैंक का एनपीए भी बढ़कर दो लाख करोड़ रुपए हो गया जो एक साल पहले की इसी अवधि के दौरान करीब एक लाख आठ हजार करोड़ रुपए था। जाहिर है कि एक साल बाद एनपीए घटने के बजाए और बढ़ा है तो खाताधारक सवाल करेंगे ही।

भारतीय स्टेट बैंक का पिछले साल केंद्र सरकार ने आकार बढ़ाया था। इसके पांच सहयोगी बैंकों स्टेट बैंक आफ पटियाला, स्टेट बैंक आफ बीकानेर आदि का इसमें विलय कर दावा किया गया था कि इससे बैंक का ढांचा मजबूत होगा, एनपीए घटेगा और कमाई बढ़ेगी क्योंकि अनावश्यक खर्च कम हो जाएंगे। लेकिन बढ़ते घाटे और एनपीए ने इस दावे की भी हवा निकाल दी है। कायदे से एनपीए डेढ़ फीसद से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन तीसरी तिमाही का आंकड़ा बताता है कि यह 5.61 फीसद हो चुका है। एनपीए बैंक के उन कर्जों को कहते हैं जिनकी वसूली संकट में फंस जाती है। इसे एक तरह से डूबी हुई रकम की तरह ही समझा जाता है। देश की कुल बैंकिंग का एक चौथाई स्टेट बैंक का है। एनपीए की बढ़ी रकम के बारे में यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि बड़े डिफाल्टर बकायादारों में किसान, मजदूर या लघु उद्यमी नहीं हैं। ज्यादा रकम बड़े कार्पोरेट घरानों ने डुबाई है। लेकिन सरकार उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई करती नहीं दिखती।

बैंक ने पिछले वित्तीय वर्ष (2016-17) में 20,339 करोड़ रुपए के फंसे कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया था। यह सरकारी बैंकों में सबसे अधिक राशि है जो बट्टे खाते में डाली गई है। इस प्रकार 2016-17 में बैंकों के बट्टे खाते में कुल मिलाकर 81,683 करोड़ रुपए की राशि डाली गई। ये आंकड़े तब के हैं जब भारतीय स्टेट बैंक में उसके सहयोगी बैंकों का विलय नहीं किया गया था। सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि 2012-13 के वित्तीय वर्ष में सरकारी बैंकों का कुल बट्टा खाता 27,231 करोड़ रुपए था। इस प्रकार पांच साल की अवधि में यह राशि तीन गुना बढ़ गई है। वित्त वर्ष 2013-14 में सरकारी बैंकों ने 34,409 करोड़ रुपए के फंसे कर्ज को बट्टे खाते डाला था। स्टेट बैंक के अलावा पंजाब नेशनल बैंक ने भी 2016-17 में 9,205 करोड़ रुपए बट्टे खाते डाले हैं। इसके बाद बैंक आफ इंडिया ने 7,346 करोड़ रुपए, केनरा बैंक ने 5,545 करोड़ रुपए और बैंक आफ बड़ौदा ने 4,348 करोड़ रुपए बट्टे खाते डाले हैं। चालू वित्तीय वर्ष में भी अप्रैल-सितंबर की छमाही की अवधि में ही विभिन्न सरकारी बैंकों ने 53,625 करोड़ रुपए के कर्ज को बट्टे खाते डाल दिया। यानी इस रकम की वसूली नहीं हो पाएगी।

235 करोड़ कमाए थे

जनसत्ता ने पिछले साल खुलासा किया था कि किस तरह बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने वाले उपभोक्ताओं पर जुर्माना लगाकर बैंक ने महज एक तिमाही के दौरान 235 करोड़ रुपए की अतिरिक्त कमाई की थी। इस बार बैंक ने इस बार की आरटीआइ का जवाब नहीं दिया।

एनपीए भी बढ़ गया

तीसरी तिमाही के वित्तीय परिणाम बताते हैं कि इस अवधि में स्टेट बैंक का एनपीए भी बढ़कर दो लाख करोड़ रुपए हो गया जो एक साल पहले की इसी अवधि में एक लाख आठ हजार करोड़ रुपए था। जाहिर है कि एक साल बाद एनपीए घटने के बजाए और बढ़ा है

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