भारत की खाद्य सुरक्षा नीति पर अमेरिका का रणनीतिक हमला

आखिर खाद्य सुरक्षा और खेती-किसान की बेहतरी के लिए और परिस्थितियों के अनुरूप बनायी गई भारत की कृषि-खाद्य सुरक्षा नीतियों पर अमेरिका ने हमला शुरू कर दिया है. अब तक वह दबाव बना रहा था कि भारत को खाद्य सुरक्षा-कृषि सब्सिडी आवंटन को कुल कृषि उत्पाद मूल्य के 10 प्रतिशत के समतुल्य रखने के प्रस्ताव को मान लेना चाहिए. भारत मानता रहा है कि यह एक घातक प्रस्ताव है और इससे सहमत नहीं हुआ. भारत फिर भी डब्ल्यूटीओ को अधिसूचना के जरिये यह बताता रहा है कि वह किस मद में कितनी राजकीय सहायता प्रदान कर रहा है.

अमेरिका यह अधिसूचना दाखिल नहीं करता है. लेकिन 4 मई 2018 को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की कृषि समिति के सामने अमेरिका ने डब्ल्यूटीओ में वर्ष 1995 में हुए कृषि समझौते की धारा 18.7 के अंतर्गत (जिसमें कोई भी देश संगठन के अन्य सदस्य देश द्वारा जमा की गई अधिसूचना पर समिति का ध्यान आकर्षित कर सकता है) भारत सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रमों के लिए दी जा रही सरकारी सहायता पर सवाल उठाये. डब्ल्यूटीओ के इतिहास में ऐसा पहला बार हुआ है जब किसी देश के खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम पर आघात करने की कोशिश हुई है.

यह जान लेना जरूरी है कि अमेरिका ने भारत के खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों (खासतौर पर चावल और गेहूं के लिए दी जा रही सरकारी सहायता) पर जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, वह जानकारियों का मिथ्या और भ्रमपूर्ण प्रस्तुतिकरण तो है ही; साथ यह एक कोशिश है भारत को खाद्य सुरक्षा की नीतिया बनाने और उन्हें लागू करने से रोकने की. अमेरिका की अधिसूचना पर विश्व व्यापार संगठन में भारत के वाणिज्य प्रतिनिधि जे.एस. दीपक ने कहा कि “भारत ने अमेरिका के आंकलन को इसके भ्रामक और त्रुटिपूर्ण तरीकों के कारण तत्काल खारिज कर दिया है. मैंने 4 मई को ही अमेरिका के मुख्य कृषि मध्यस्थ दूत ग्रेग दौड को जिनेवा में साफ़ शब्दों में बता दिया कि उनकी प्रति-अधिसूचना आधारहीन है. हमने उन्हें कहा कि दूसरे देशों की अधिसूचना में त्रुटियां खोजने से पहले अमेरिका को अपनी अधिसूचना जमा करना चाहिए”.

भारत ने डब्ल्यूटीओ में जमा की गई अधिसूचना में बताया था कि भारत धान/चावल के कुल उत्पादन मूल्य का 6.83 प्रतिशत (2010-11), 7.39 प्रतिशत (2011-12), 7.75 प्रतिशत (2012-13) और 5.19 प्रतिशत (2013-14) ही न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में सहायता प्रदान कर रहा है और यह राजकीय रियायत के लिए तय सीमा (डि-मिनिमिस स्तर) से कम है. अमेरिका ने अपने जोड़ से बताने की कोशिश की है कि भारत वास्तव में धान/चावल पर क्रमशः कुल उत्पाद मूल्य के 74 प्रतिशत, 80.1 प्रतिशत, 84.2 प्रतिशत और 76.9 प्रतिशत के बराबर की सहायता दे रहा है.

यदि बात गेहूं के सन्दर्भ में भी कही जा रही है. भारत इन वर्षों में गेहूं पर न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में कुल उत्पाद मूल्य के (-)0.73 प्रतिशत, 0.48 प्रतिशत, (-)2.50 प्रतिशत और (-)3.53 प्रतिशत के बराबर की राजकीय सहायता दे रहा था, क्योंकि स्थानीय मुद्रा यानी रुपये के मान से कीमतें तो बढ़ी हैं, किन्तु वर्ष 1988-86 के बाह्य सन्दर्भ मूल्य, जिसका आंकलन अमेरिकी डालर में किया जा रहा है, के मान से भारत में गेहूं की कीमतों में कमी ही आई है. जबकि अमेरिका भारतीय रुपये के आधार पर आंकलन करके कह रहा है कि यह राजकीय सहायता कुल गेहूं उत्पाद मूल्य के 60.1 प्रतिशत, 60.9 प्रतिशत, 68.5 प्रतिशत और 65.3 प्रतिशत के समतुल्य रही है.

दूसरे मायनों में अमेरिका यह कह रहा है कि भारत में गेहूं और चावल का लगभग तीन चौथाई उत्पादन सरकार की रियायत प्राप्त कर रहा है और इससे ही उसका प्रबंधन होता है. यह अपने आप में किसी विकसित देश का समझदारी भरा विश्लेषण नहीं हो सकता है कि भारत के मुख्य खाद्यान्न को तीन चौथाई सरकारी रियायत मिलती हो. डब्ल्यूटीओ में वर्ष 1995 में कृषि पर सदस्य देशों के बीच यह समझौता किया गया था एक स्वच्छ और बाज़ार केंद्रित व्यापार व्यवस्था बनाने के लिए प्रतिबद्ध समझौतों के जरिये गेट (जनरल एग्रीमेंट आन टेरिफ एंड ट्रेड) नियमों को मज़बूत करते हुए नीतियों और कार्यप्रणाली में सुधार की प्रक्रिया शुरू की जायेगी. इसका सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह कहता है कि कृषि के लिए दी जाने वाली राजकीय सहायता (सब्सिडी) को न्यूनतम किया जायगा और उदारीकरण की प्रक्रिया को उच्चतम स्तर तक ले जाया जाएगा ताकि बाज़ार का अधिकतम विस्तार हो सके.

इतना ही नहीं बाज़ार तक पंहुच सुनिश्चित करने के लिए सरकारें शुल्कों और करों में कमी लाएंगी. विश्व व्यापार संगठन का यह समझौता कहता है कि निजी और खुले बाज़ार पर न्यूनतम शुल्क लगें पर सरकारें किसानों और समाज को भुखमरी से बचाने के लिए सरकारी खजाने से रियायतें न दें. इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि कृषि समझौते का मकसद गुलामी, एकाधिकार और उपनिवेशवाद को बढ़ावा देना रहा है. कृषि समझौते का 32 विकसित (और कुछ विकासशील) देशों ने खूब फायदा उठाया. इन देशों के लिए उस वक्त दी जा रही कुल समग्र सहायता/रियायत (एग्रीगेट मेज़रमेंट आफ सपोर्ट-एएमएस) में 20 प्रतिशत और इस सूची में शामिल विकासशील देशों को 13 प्रतिशत की कमी लाना होगी. ज्यादातर विकसित देश, खासतौर पर युरूपीय देश और अमेरिका उस वक्त जितनी कृषि-खाद्य सब्सिडी दे रहे थे, वह आज की सब्सिडी के मुकाबले भी बहुत भारी थी. ये रियायतें आज भी जारी रखे हुए हैं. जबकि भारत

समेत अन्य देशों के लिए मुख्य रूप से कृषि उत्पाद के 10 प्रतिशत के बराबर की रियायत का प्रावधान किया गया. खाद्य सुरक्षा के लिए राजकीय रियायत की गणना का तरीका – इसमें बहुत ही चतुराई से यह बिंदु जोड़ा गया कि वर्ष 1986-88 को खाद्य सुरक्षा सब्सिडी की गणना के लिए आधार (एक्सटर्नल रिफरेंस प्राइस-ईआरपी) माना जाएगा, यानी इन वर्षों में खाद्यान्नों की कीमत/सरकारों द्वारा तय मूल्य के बराबर की राशि को सरकार द्वारा तय वर्तमान खाद्यान्न कीमतों में से घटाकर रियायत की गणना की जायेगी. भारत के सन्दर्भ में वर्ष 1986-88 में धान का मूल्य 2347 रुपये/मीट्रिक टन और गेहूं का मूल्य 3540 रुपये/मीट्रिक टन माना गया. वर्ष 2010-11 के लिए भारत द्वारा खाद्य रियायत की गणना करते समय इस आधार वर्ष के मूल्य को वर्तमान वर्ष के मूल्य (धान-11300 रुपये/मीट्रिक टन और गेहूं 11700 रुपये/मीट्रिक टन) से घटाकर मूल्य तय किया जाता है. इसका मतलब है कि वर्ष 2011-12 में भारत में सरकार खाद्य सुरक्षा हेतु जितना अनाज खरीदेगी, उसकी गणना धान के लिए 8953 रुपये और गेहूं के लिए 8160 रुपये प्रति मीट्रिक टन के मान से करेगी.

(वर्तमान वर्ष में गेहूं या चावल का सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य – 1988-86 का बाह्य सन्दर्भ मूल्य x उस उत्पादन की मात्रा, जो सरकार ने तय कीमत पर खरीदा = कुल बाज़ार समर्तन मूल्य या राजकीय सहायता)

तीन दशक पुराने बाज़ार मूल्य को आधार मूल्य या बाह्य सन्दर्भ मूल्य मानना, अपने आप में बेहद बचकाना सूत्र है. इसका उपयोग अमेरिका और यूरोपीय देश भारत और अन्य विकासशील देशों को दबाने के लिए करते हैं. भारत यह कहता रहा है कि हमें बाह्य सन्दर्भ मूल्य के लिए हाल के किसी वर्ष को आधार वर्ष मानना चाहिए, पर अमेरिका ने वर्ष 1995 में लिखे गए कृषि समझौते के दस्तावेज में आधार वर्ष को बदलने का बिंदु ही नहीं डाला था.

डब्ल्यूटीओ के तहत वर्ष 1995 में हुए कृषि समझौते को लागू करने की पहल वर्ष 2001 में दोहा में शुरू हुए विकास चक्र की समझौता बैठकों से शुरू हुई. इसमें खाद्य और कृषि सब्सिडी को दो रूपों में वर्गीकृत किया गया : एक – ग्रीन बाक्स सब्सिडी (गरीबों और वंचित तबकों के लिए चलाये जाने वाले खाद्य कार्यक्रम और अनाज भण्डारण, कृषि शोध, खेती से सम्बंधित बीमारियों पर अध्ययन, प्रशिक्षण, परिवहन की व्यवस्था, ढांचागत विकास, बिजली की व्यवस्था आदि) के तहत यह तय किया गया कि सरकारें इस पर जितना चाहे, उतना व्यय कर सकती हैं, किन्तु शर्त यह है कि इससे “बाज़ार को नुकसान” नहीं पंहुचना चाहिए. दो – अम्बर बाक्स सब्सिडी यानी ऐसी सब्सिडी, जो बाज़ार को नुकसान पंहुचाती हो.

इस समझौते में यह उल्लेख किया गया है कि डब्ल्यूटीओ के विकासशील सदस्य देश कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए दी जाने वाली सहायता (कृषि और खाद्य सुरक्षा सब्सिडी) को राष्ट्र के कुल कृषि उत्पादन के मूल्य के अधिकतम 10 प्रतिशत हिस्से तक सीमित रखेंगे; यानी यदि देश में कृषि उत्पादन का कुल मूल्य 100 रुपये है, तो कृषि-खाद्य सुरक्षा रियायत इसके 10 प्रतिशत यानी 10 रुपये से ज्यादा न होगी. विकसित देशों के लिए यह सीमा 5 प्रतिशत रखी गई. हांलाकि इस विषय पर डब्ल्यूटीओ में सहमति नहीं बनी है. वर्ष 2013 में बाली (इंडोनेशिया), 2015 में नैरोबी (केन्या) और फिर वर्ष 2017 में ब्युनसआयर्स (अर्जेंटीना) में हुई मंत्रीवार्ताओं में इस विषय पर कोई स्थाई हल नहीं निकल पाया.

बाली (2013) में यह तय हुआ था कि जब तक खाद्य सुरक्षा सब्सिडी पर स्थाई हल न निकल जाए, तब तक सभी देशों को अपने मौजूदा दायरे में राजकीय सहायता प्रदान करने की स्वतंत्रता होगी, इसे पीस क्लाज़ माना गया और ज्यादा राजकीय सहायता दिए जाने की स्थिति में कोई भी देश किसी भी देश के खिलाफ़ विवाद या कार्यवाही की शिकायत के मंच का इस्तेमाल नहीं करेगा. भारत का साफ़ मानना रहा है कि “स्थाई समाधान पीस क्लाज़ से बेहतर होना चाहिए और मौजूदा नियमों में बदलाव करके इसे स्थायित्व देने के लिए कानूनी स्वरुप दिया जाना चाहिए. यदि हम ब्यूनस आयर्स में समाधान नहीं खोज पाये, तो यह एक बड़ी असफलता और डब्ल्यूटीओ के लिए अपूर्णीय क्षति होगी. डब्ल्यूटीओ का मौजूदा कृषि समझौता कुछ चुनिन्दा विकसित देशों को बाज़ार को नुकसान पंहुचाने वाली असीमित घरेलू सहायता देने की अनुमति देता है. बाज़ार में अनिश्चितता और असमानता का जन्मदाता प्रावधान यही है”. विकसित देशों को यह खेल भी बंद करना चाहिए कि वह अपनी सभी खाद्य-कृषि सब्सिडी को ग्रीन बाक्स यानी अच्छी सब्सिडी में डाल कर दिखाने लगें.

यदि वास्तव में खाद्य सुरक्षा की न्यायपरक नीति और व्यवस्था बनाना है तो सबसे पहले विकसित देशों को उस अम्बर बाक्स सब्सिडी को खतम करना चाहिए, जो बाज़ार को नुकसान पंहुचाती हैं. इसमें उत्पादन बढ़ाने, लागत को कम करने, किसानों को उपज की कीमत देने, खाद, बीज, सिंचाई, बिजली, कृषि ऋण के लिए दी जाने वाली राज सहायता शामिल होती है. दुनिया में बाजार को नुकसान पंहुचाने वाली वैश्विक सब्सिडी में 90 प्रतिशत हिस्सेदारी (160 बिलियन डालर) विकसित देशों की है, पर दबाव विकासशील देशों पर बनाया जा रहा है.

(लेखक विकास संवाद के निदेशक, लेखक, शोधकर्ता और अशोका फेलो हैं.)

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