गिद्धों के आशियाने की तलाश में है उत्तराखंड का वन विभाग

प्राकृतिक सफाई कर्मी व पर्यावरण मित्र माने जाने वाले गिद्धों की कम होती संख्या भविष्य के  लिए चिंता की वजह बन चुकी है। वन विभाग जंगल में गिद्धों के साथ ही उनके घोंसले तलाशने में जुटा है। बेस लाइन डाटा मिलने के बाद इनके संरक्षण को लेकर कवायद होगी। इन्हें बचाने में उत्तराखंड सबसे अहम भूमिका निभा सकता है। क्योंकि देश में कुल नौ प्रजाति के गिद्ध पाए जाते हैं और इनमें से आठ प्रजातियां पहले से उत्तराखंड में देखी गई हैं।

गिद्धों की संख्या आश्चर्यजनक ढंग से कम हुई है। 80 के दशक में जहां इनकी संख्या देश में एक करोड़ के करीब थी, वहीं साल 2003-04 में हुई गणना में आंकड़ा 20 हजार पर पहुंच गई। पश्चिमी वन वृत्त के पांच वन प्रभागों के रेंजर व फॉरेस्ट गार्ड को अक्टूबर में बकायदा जू के डिप्टी डायरेक्टर गोपाल सिंह कार्की ने प्रशिक्षण दिया था। जिसमें प्रदेश में मिलने वाली प्रजातियों के नाम व पहचान करने का तरीका बताया गया। अब जंगल में गिद्धों के घोंसले, पेड़ों पर इनका प्रवास व आसपास किसी तरह का भोजन उपलब्ध है या नहीं, इन सभी तथ्यों को रिसर्च में शामिल किया गया है।

उत्तराखंड में मिलनी वाली प्रजातियां

1-चमर गिद्ध: समतल व पहाडिय़ों पर 2500 मीटर की ऊंचाई पर दिखी यह प्रजाति आबादी के आसपास भी मिलती है। वर्तमान में यह विश्व स्तर पर संकटग्रस्त है।

प्रजनन समय: अक्टूबर से अप्रैल

2-सफेद गिद्ध: उत्तराखंड में पर्याप्त मात्रा में मिलने वाली यह प्रजाति भी बस्तियों के आसपास रहती है।

प्रजनन समय: मार्च से मई

3-राज गिद्ध: नुकीले पंखों वाला यह गिद्ध हिमालय में 2500 मीटर तक दिखा। वृक्षदार पहाडिय़ों पर भी इसका वासस्थल है।

प्रजनन समय: नवंबर से मार्च

4-काला गिद्ध: यह अन्य प्रजातियों से आकार में बड़े होते हैं। तीन हजार मीटर में खुले स्थानों पर मिलते हैं।

प्रजनन समय: अक्टूबर से नवंबर

5-हिमालय गिद्ध: शरीर व पूंछ बड़ी होती है। छह सौ मीटर की ऊंचाई पर मिलते हैं।

प्रजनन समय: नवंबर से मार्च

6-यूरेशियाई गिद्ध: देसी गिद्ध से बड़े होते हैं। खुले मैदान वाले एरिया में 910 मीटर ऊंचाई पर मिलने वाली प्रजाति गर्मियों में तीन हजार मीटर तक पहुंच जाती है।

प्रजनन समय: नवंबर से मार्च

7-जटायु गिद्ध: इसमें मांस के बड़े टुकड़ों को ऊंचाई से गिराकर उसकी हड्डी तोडऩे की आदत होती है। 1500 मीटर की ऊंचाई में मिलने वाली प्रजाति नुकीले पंखे व फनकार पूंछ वाली होती है।

प्रजनन समय: दिसंबर से फरवरी

8-पतली चोंच गिद्ध: अन्य देसी गिद्धों की अपेक्षा चोंच, सिर व ग्रीवा अधिक पतली होती है। विश्व स्तर पर संकटग्रस्त प्रजाति खुले वनों में 1500 मीटर ऊंचाई पर दिखती है।

प्रजनन समय: नवंबर से मार्च

विलुप्ति की बड़ी वजह डाइक्लोनिक : वन विभाग की मानें तो गिद्धों की गिरती संख्या की बड़ी वजह डाइक्लोनिक नामक दवा है। पालतू जानवरों का दर्द व सूजन कम करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। गिद्ध अगर ऐसे जानवरों को मरने के बाद खाते हैं तो उसकी किडनी पर बुरा असर पड़ता है।

जू में बनेगा गिद्ध प्रजनन केंद्र : गौलापार स्थित जू में बड़े स्तर का गिद्ध प्रजनन केंद्र बनाने का प्रस्ताव है। जहां इनके संरक्षण पर काम किया जाएगा। जिस वजह से वेस्टर्न सर्किल की हल्द्वानी डिवीजन, तराई पूर्वी, तराई केंद्रीय, तराई पश्चिमी व रामनगर डिवीजन में सर्वे किया जा रहा है।जू के डिप्टी डायरेक्टर गोपाल सिंह कार्की ने बताया कि अभी केवल बेस लाइन डाटा जुटाने की प्रक्रिया चल रही है। रिसर्च के बाद किस तरह के तथ्य सामने आते हैं, वह सबसे अहम है। उसके बाद ही आगे की योजना बनेगी।

About न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

News Trust of India न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

Leave a Reply

Your email address will not be published.

ăn dặm kiểu NhậtResponsive WordPress Themenhà cấp 4 nông thônthời trang trẻ emgiày cao gótshop giày nữdownload wordpress pluginsmẫu biệt thự đẹpepichouseáo sơ mi nữhouse beautiful