पुलवामा का यह रास्ता किधर जाता है?

(बाबा बिजेंद्र कुमार सिंह, प्रधान संपादक, स्वराज खबर)

केसर की क्यारी में मौत की फसलें केसर यानी (सैफरॉन और जाफरान) की खेती। इस केसरिया रंग पर रक्त के छींटें। थोड़ी सी ठंड में देश जब दुशाले में दुबका हुआ था उस वक्त देश के जाबांज अपनी जान की बाजी लगा रहे थे। पाक-पोषित आतंकियों ने अपनी कायरता और क्रूरतापूर्ण हरकत को अंजाम दिया। चालीस से ज्यादा हमारे जवान शहीद हो गए। किसी का बाप मर गया तो किसी का बेटा, किसी के राखी के धागे टूटे तो किसी के मंगलसूत्र बिखर गया।

कितने सपने और कितने अरमान टूटे हैं, इसे बयां करने के कुछ घिसे-पिटे शब्द हमारे पास अवश्य होंगें, पर आंसूओं में डूबे इन परिवारों को अब वक्त ही संभाल पाएगा। सरकार इनके ज़ख़्मों का मरहम तो नही ही बन पाएगी, समय ही अब इनके ज़ख्मों को भर पायेगा। बदले की भावना में हमारे जवान शहीद हुए और बदले की भावना में अब उनके भी कुछ जवान मरेंगे। पर इस युद्धरत इंसानी सभ्यता का पड़ाव क्या होगा? कहाँ जाकर रुकेगी यह खूनी होली? क्या है रास्ता?

पुलवामा कश्मीर ही नही बल्कि भारत की चिंता का केंद्र बन गया है। पुलवामा को अब कौन कहेगा चावल का कटोरा? यह राइस-बॉउल भी अब न रह पाए! पुलवामा के वे मुस्लिम किसान अपना हाड़ मांस गला कर खुशबू से भरा चावल उपजाकर पूरे देश को खिलाते हैं। वोह राजमा चावल? कश्यप मीर का यह पुलवामा, मेरा यह नंदन-कानन और केसर की क्यारियां?

आतंकियों ने सबकुछ तबाह कर दिया। आतंकी कभी शूरवीर नही होते। ये पीठ पर गोली खाते हैं या फिर कीड़े मकोड़े की तरह आत्महत्या करते हैं। यह आत्मघात है।

जब किसी आंदोलन के पास शब्द और सिद्धांत शून्य हो जाता है तो वे आत्मघात की ओर बढ़ जाते हैं। आतंकी संगठन की कमर को हमारे जवानों ने पहले ही तोड़ दिया था। ये आतंकी संगठन अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। आतंकियों से क्या हम वीरतापूर्ण हमले की अपेक्षा करेंगें? इनके जो भी हमले होंगें वे कायरतापूर्ण ही होंगे।

उन्माद में हम किसी धर्म को आतंक का पर्याय न बना दें। सभी मुसलमान आतंकी नही होते, पर हर आतंकी मुसलमान अवश्य होते हैं। जैसे हर दलित नक्सली नही होते, पर हर नक्सली दलित वंचित अवश्य होते हैं।

ऐसा नही कि आतंक से केवल भारत ही जूझ रहा है बल्कि पाकिस्तान भी उतना ही तबाह है। पाकिस्तान के अमन चैन को पसंद करने वाले भी बड़ी संख्या में मारे जा रहे हैं। तमाम इस्लामिक मुल्क की यही दुर्दशा है। भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां मुसलमान ज्यादा सुरक्षित हैं।

पुलवामा का यह हमला उन पर हमला है जिनका यह मादरे-वतन है, भारत माता है। उन्माद न फैलाएं। मार ऐसी हो कि फिर कोई ऐसी हरकत के लिए सोच भी न पाए।

इसमें कोई दो राय नही कि सीमा पर सैनिक कम सरकारें ज्यादा लड़ रही हैं। सरकार का हस्तक्षेप न हो तो सैनिक दो दिन में लाहौर में तंबू गाड़ दे। दोनो देश की सरकारें वही कार्य करती रही हैं जो उन्हें नही करना चाहिए। जवानों की हुई मौतें हमें मर्मान्तक पीड़ा दे रही हैं। अपने जाबांजों पर हमें गर्व है। हमें तो उनपर भी गर्व है जो हल चलाते-चलाते दम तोड़ते है।

हल और रायफल के साथ हमारे किसान और जवान दोनो कुर्बानी देते हैं। हर स्तर की ये शहादतें हमारे लिए ही हैं, हमें सबका स्वागत करना चाहिए। हमारे लिए उनकी मौत भी उतनी ही मूल्यवान है जो सीवर में जहरीली गैस से दम तोड़ते हैं।

एक ही देश में अलग अलग मानदंड हमें व्यथित करते हैं। किसान और सफाई कर्मचारियों की मौत पर सिनेमा जगत मोमबत्ती नहीं जलाता। हमारा राष्ट्रवाद अतिप्रियतावाद का शिकार है जो कालांतर में निषेधात्मक राष्ट्रवाद के रूप में ही हमारे सामने आता है।

चुनाव का समय है। किसी भी स्तर का प्रपंच रचा जा सकता है। उन्माद और घृणा को भी जन्म दिया जा सकता है। हमें सावधान रहना होगा। बिना राफेल के ही हम युद्धाभ्यास में लग गए हैं। सरकार की संसद अब पूरी हो चुकी है। आओ मौत-मौत खेलें, यह भी संभव है।

देश जवाब मांग रहा है। सीमा पर जवान जवाब देंगें और समाज में जनता जवाब देगी। देशभक्ति की परीक्षा तो तय समय पर होगी, कोई बच नहीं सकते हैं।

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