राष्ट्रीय खजाने की ‘चौकीदारी’ कौन करेगा सरकार ?

विजय माल्या और ललित मोदी जैसे बदनाम घोटालेबाजों के बाद अब देश अरबपति ज्वैलरी डिजाइन नीरव मोदी द्वारा अंजाम दिए गए एक भारी-भरकम घोटाले में फंस गया है। सवाल यह नहीं कि घोटाला किस साल में या किस सरकार दौरान शुरू हुआ। जनता के लिए चिंता का विषय तो यह है कि बैंकिंग प्रणाली में जगह-जगह छिद्र हैं और गवर्नैंस की गुणवत्ता का बुरा हाल है जिसके चलते बड़े-बड़े धोखेबाजों को तो सहायता मिलती है लेकिन कर्ज के बोझ तले गरीब किसानों को नहीं और न ही सरकारी क्षेत्र के बैंकों के गरीब खाताधारकों को। हमने ऐसे भारत की तो कामना ही नहीं की थी।

2004 से मध्य 2014 तक यू.पी.ए. सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बेशक अत्यंत ईमानदार होने के साथ-साथ जाने-माने अर्थशास्त्री थे तो भी उनके शासन के 10 वर्ष घोटालों से भरे हुए थे। इन्हीं घोटालों के कारण ही 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई थी। कांग्रेस के स्थान पर केसरिया विचारधारा वाली पार्टी के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी सत्ता के सिंहासन पर सुशोभित हुए। अपने तूफानी चुनाव प्रचार अभियान दौरान उन्होंने यह वायदा किया था कि वह राष्ट्रीय खजाने के चौकीदार के रूप में काम करेंगे, सुधारों की शुरूआत करेंगे और उत्कृष्ट गवर्नैंस के लिए पारदर्शी एवं जवाबदार व्यवस्था स्थापित करेंगे।

यह एक अलग बात है कि प्रधानमंत्री मोदी की ‘चौकीदारी’ के चार वर्षों दौरान ही विजय माल्या, ललित मोदी और नीरव मोदी जैसे घोटालेबाज अरबों रुपए डकार कर देश से भाग गए। देश के सरकारी बैंकों को 2012 से 2016 के बीच धोखाधडिय़ों के कारण कम से कम 22743 करोड़ रुपए का नुक्सान पहुंचा। इस तथ्य का खुलासा स्वयं इलैक्ट्रानिक एवं सूचना टैक्नॉलोजी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने संसद में किया था। उन्होंने कहा था कि गत वर्ष के 21 दिसम्बर तक बैंकों के साथ 179 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के 25600 मामले सामने आए थे। आर.बी.आई. द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017 के दौरान एक लाख रुपए प्रत्येक से अधिक कीमत के 455 धोखाधड़ी मामले आई.सी.आई.सी. बैंक, 429 मामले स्टेट बैंक आफ इंडिया, 444 स्टैंडर्ड चार्टर्डबैंक एवं 237 एच.डी.एफ.सी. बैंक में सामने आए।

अप्रैल-दिसम्बर 2016 के बीच बैंकिंग धोखाधड़ी के 3500 से भी अधिक मामले सामने आए थे जिनकी कुल राशि 177 .70 अरब रुपए बनती थी। इनको अंजाम देने में प्राइवेट और सार्वजनिक बैंकों के 450 कर्मचारी संलिप्त थे। ताजातरीन पी.एन.बी. घोटाले में नीरव मोदी की कम्पनियों ने कुछ बैंक कर्मचारियों की संलिप्तता से 11450 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की थी। अकेले नीरव मोदी ग्रुप ने ही जालसाजी करते हुए कम से कम 150 लैटर आफ अंडरटेकिंग (एल.ओ.यू.) हासिल किए थे और इन एल.ओ.यू. को यूनियन बैंक आफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक से भुनाया गया था। इस ठगी का आकार 2016-17 में पी.एन.बी. के 1324 करोड़ रुपए के शुद्ध लाभ से कम से कम 8 गुना अधिक है। कमाल की बात तो यह है कि इस नौसरबाजी को अंजाम देने वाला नीरव मोदी 2016 में फोब्र्स की सबसे अमीर भारतीयों की सूची में शुमार था और उसकी नैटवर्थ 1.74 अरब डालर थी।

हालांकि एक ‘व्हिसल ब्लोअर’ ने काफी पहले ही इस बारे में खतरे की घंटी बजा दी थी लेकिन पी.एन.बी. की मुम्बई के ब्रैडी हाऊस स्थित शाखा को केवल गत जनवरी के मध्य में ही इसकी भनक लगी थी। लगभग साढ़े 11 हजार करोड़ रुपए की ठगी खाने के अलावा नीरव मोदी की कम्पनियों को पी.एन.बी. ने 1700 करोड़ रुपए का ऋण भी दे रखा है। यह सच है कि गैर निष्पादित ऋण यू.पी.ए. सरकार की दी हुई धरोहर है। लेकिन यह भी तथ्य है कि मई 2014 में अपना कार्यकाल शुरू करते ही मोदी सरकार ने सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों के कामकाज में स्वच्छता लाने को अपनी बुनियादी चुनौतियों में से एक बताया था लेकिन अभी तक बैंकिंग प्रणाली को सुधारने की दिशा में कोई अधिक काम नहीं हो पाया है और न ही गवर्नैंस के मामले में उन सुधारों की शुरूआत की गई है जिनका वायदा किया गया था। स्पष्ट तौर पर व्यक्तिगत बैंकों के साथ-साथ बैंकिंग क्षेत्र के नियामक आर.बी.आई. के स्तर पर भी निगरानी तंत्र में अनेक त्रुटियां मौजूद हैं।

नीरव मोदी का घोटाला सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कामकाजी प्रणाली के संबंध में कई सवाल उठाता है। पहली बात तो यह कि हीरा व्यापार में एल.ओ.यू. केवल 90 दिन के लिए जारी किए जाते हैं लेकिन इस नौसरबाज की कम्पनियों को बैंकिंग स्टाफ की मिलीभगत से 365 दिन के लिए एल.ओ.यू. कैसे जारी हुए? शायद ऐसी हेराफेरियों के माध्यम से ही भारत के सबसे धनाढ्य एक प्रतिशत लोग 53 प्रतिशत सम्पत्ति के मालिक बने हैं। दूसरी बात यह है कि पी.एन.बी. का आंतरिक लेखातंत्र और आर.बी.आई. के जांचकत्र्ता इन अनियमितताओं का संज्ञान लेने में विफल कैसे रहे?

तीसरी बात कि पी.एन.बी. के परिचालन विभाग में मुखिया की कुर्सी पर डिप्टी मैनेजर गोकुल नाथ सेठी को कई वर्षों तक क्यों बिठाए रखा गया, जबकि प्रत्येक कुछ महीने बाद इस कुर्सी पर बैठने वाले अधिकारी को बदल देने की परम्परा है? ऐसी हेराफेरियां तब तक नहीं हो सकतीं जब तक पी.एन.बी. के अंदर और बाहर सत्ता की चाबी किन्हीं अदृश्य हाथों में न हो। चौथी बात यह है कि अपने पूर्ववर्ती नौसरबाज विजय माल्या की तरह नीरव और उनके परिजन जनवरी के प्रथम सप्ताह में ही देश छोड़कर भाग जाने में कैसे सफल हुए? क्या यह काम कुछ सरकारी अधिकारियों की सहायता के बिना हो सकता था? यह भी कोई कम सनसनीखेज बात नहीं कि नीरव मोदी दावोस में प्रधानमंत्री के साथ गए कारोबारियों के समूह में फोटो खिंचवाने में कैसे सफल हुआ, जबकि वह अधिकृत भारतीय शिष्टमंडल का हिस्सा ही नहीं था?

5वें नम्बर पर लोगों को यह सवाल पूछने का अधिकार है कि नीरव और उसके भागीदार मेहुल चोकसी के विरुद्ध एक व्हिसल ब्लोअर द्वारा बार-बार शिकायतें दर्ज करवाने के बावजूद विभिन्न मंत्रालयों और पी.एम.ओ. ने लापरवाही क्यों दिखाई? क्या ऐसा इसलिए हुआ कि प्रधानमंत्री विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए विदेशी दौरों में अधिक मसरूफ थे? खेद की बात है कि प्रधानमंत्री की असंतुलित वरीयताएं कुछ ज्वलंत घरेलू मुद्दों की अनदेखी का कारण बन गई हैं। अगले आम चुनाव में जब केवल एक वर्ष का समय बचा है, तब कहीं जाकर मोदी सरकार किसानों की समस्याओं के प्रति जागृत हुई है और अर्थव्यवस्था तथा स्वास्थ्य क्षेत्र की खबर लेने लगी है लेकिन भारत के करोड़ों बेरोजगारों को रोजगार का जो वायदा किया गया था उसे इस छोटी सी अवधि में पूरा करना बहुत मुश्किल है।

बेशक नीरव मोदी के मामले में कानून ने बहुत तेजी से अपना काम किया है। फिर भी हम निश्चय से नहीं कह सकते कि अंतिम अंजाम क्या होगा क्योंकि भ्रष्ट तंत्र की स्थिति तो ‘केलन के पात-पात में पात’ जैसी है। कोई नहीं कह सकता कि कहां पर कौन आदमी किस ढंग से घोटाले को अंजाम दे रहा है। स्थिति बेशक बहुत निराशाजनक दिखाई देती है तो भी सब कुछ समाप्त नहीं हो गया है। अभी भी सूचनाओं के मुक्त प्रवाह के माध्यम से सार्वजनिक दबाव बनाया जा सकता है। रहस्य का वर्तमान आवरण हर हालत में तार-तार करना होगा क्योंकि यह लोकतंत्र से पूरी तरह बेमेल है।

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