करतारपुर कॉरिडोर पर अचानक क्यों तैयार हुई मोदी सरकार !

भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी रिश्तों की गाड़ी लंबे समय से पटरी से उतरी हुई है. इस बीच सीमा पार से शुरू हुए करतारपुर कॉरिडोर के काम से रिश्तों में जमी बर्फ़ के पिघलने के संकेत मिले हैं.

पाकिस्तान में जब से नई सरकार बनी है और इमरान ख़ान प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं तब से वे कई बार भारत के साथ संबंध सुधारने और बातचीत की पहल कर चुके हैं. हालांकि उनकी हर पहल पर भारत की ओर से एक ही जवाब आता है कि पाकिस्तान को अपनी ज़मीन से ‘आतंकवाद’ बंद करना होगा.

भारत के साथ संबंधों को दोबारा पटरी पर लाने की बात महज़ इमरान ख़ान ने ही नहीं की बल्कि पाकिस्तानी सेना ने भी इसकी पहल की है.

सितंबर में पाकिस्तान ने चरमपंथ सहित कई मुद्दों पर बातचीत करने का प्रस्ताव बढ़ाया था लेकिन भारत ने कहा कि आतंकवाद और संवाद एक साथ नहीं चल सकता. भारत अतीत के उन अनुभवों का भी हवाला देता है जब वो बातचीत पर आगे बढ़ा तो किसी न किसी तरह के हमले का सामना करना पड़ा.

भारत ने पाकिस्तान के उस प्रस्ताव को भी ख़ारिज कर दिया, जिसमें उसने सार्क सम्मेलन में इस्लामाबाद आने का न्योता दिया था.

क्यों तैयार हु भारत?

करतारपुर कॉरिडोर का काम शुरू करने के सिलसिले में भी भारत सरकार कई महीनों तक इनकार की मुद्रा में ही थी. लेकिन अचानक भारत सरकार इसके लिए तैयार हो गई, जिसके चलते पंजाब (भारत) के गुरदासपुर में मौजूद डेरा बाबा नानक से भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा तक करतारपुर साहिब कॉरिडोर के निर्माण के फ़ैसले पर मुहर लग गई.

करतारपुर कॉरिडोर की नींव रखने से कुछ दिन पहले पाकिस्तान में स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास में एक चरमपंथी हमला हुआ था. पाकिस्तान के कुछ मंत्रियों ने इस हमले के लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहराया था.

वहीं भारत लगातार पाकिस्तान पर आरोप लगाता रहा है कि वह अपनी ज़मीन पर चरमपंथी समूहों को पनाह देता है और भारत में माहौल बिगाड़ने की कोशिशें करता रहता है.

यहां तक कि करतारपुर कॉरिडोर के कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए पाकिस्तान ने भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को निमंत्रण भेजा था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था.

ऐसे में सवाल उठता है कि लगातार इनकार के बाद भारत सरकार इसके लिए तैयार हो कैसे गई?

वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर कहती हैं कि करतारपुर कॉरिडोर पर भारत सरकार का रुख़ काफ़ी बदला हुआ है.

वो कहती हैं, ”पिछले कई सालों से भारत में मौजूद सिख नेता पाकिस्तानी सरकार से इस कॉरिडोर पर काम शुरू करने की अर्जियां दे रहे थे, ऐसे में पाकिस्तान इसे शुरू करने के लिए तैयार था लेकिन भारत सरकार की तरफ़ से मंजूरी नहीं मिल रही थी.”

सुहासिनी हैदर मानती हैं कि भारत सरकार इस समय पर कॉरिडोर के लिए इसलिए भी तैयार हो गई क्योंकि उसे कहीं ना कहीं डर था कि इस काम को ज़्यादा लंबा खींचने पर उसे सिख समुदाय की नाराज़गी का सामना करना पड़ सकता है.

सिख वोटबैंक की चिंता

भारत में अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. क्या इन चुनावों को देखते हुए सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने सिखों के वोट बैंक को साधने की कोशिश की है?

सुहासिनी हैदर कहती हैं, ”इस कॉरिडोर से बहुत से लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं. यही वजह है कि जब इस कॉरिडोर का काम शुरू होने की बात आई तो बीजेपी, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल सभी ने अपना-अपना श्रेय लेना शुरू कर दिया. इन तीनों ही दलों को लगता है कि पंजाब के वोट बैंक के लिए यह एक अहम मामला है.”

यह भी माना जा सकता है अगर भारत सरकार इसके लिए तैयार नहीं होती देश में रह रहे लाखों सिखों के बीच यह संदेश जाता कि पाकिस्तान की तरफ़ से मंजूरी मिलने के बाद भी भारत सरकार गुरुनानक की 550वीं जयंती के मौक़े पर इस कॉरिडोर के रास्ते में रोड़े अटका रही है.

पंजाब में इस समय कांग्रेस की सरकार है और बीजेपी अपने इस फ़ैसले के साथ ख़ुद को पंजाब में मज़बूत करने की बाट जोह रही है.

सुरक्षा में सेंध तो नहीं लगेगी?

करतारपुर में इस कॉरिडोर की नींव रखने के दौरान पाकिस्तान में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें भारत की तरफ़ दो मंत्री हरसिमरत कौर और हरदीप सिंह पुरी के अलावा पंजाब के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू भी मौजूद रहे.

करतारपुर कॉरिडोर पर बनी यह सहमति एक उम्मीद जगाती है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत दोबारा शुरू हो सकती है. हालांकि सुहासिनी हैदर की मानें तो भारत सरकार का इस कॉरिडोर के निर्माण के लिए तैयार होने की एक वजह यह भी थी कि इस कॉरिडोर का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में है और भारत को अपनी तरफ़ से बहुत कम निर्माण कार्य करना होगा.

वे कहती हैं, ”इस कॉरिडोर पर आम सहमति बनने से एक दिन पहले तक गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में यह तय हुआ था भारत की तरफ़ से एक बेहतर दूरबीन लगाई जाएगी जिसके ज़रिए भारतीय श्रद्धालु सरहद पार मौजूद करतार साहिब के दर्शन कर सकेंगे. लेकिन जैसे ही पाकिस्तान ने इसके निर्माण का प्रस्ताव दिया तो भारत भी इसके लिए तैयार हो गया.

एक सवाल यह भी उठता है कि बिना वीजा वाले इस कॉरिडोर के शुरू होने से भारत को अपनी सुरक्षा में सेंध लगने का डर नहीं है.

इस पर सुहासिनी हैदर कहती हैं कि सुरक्षा का ज़्यादा बड़ा मसला पाकिस्तान के लिए होगा क्योंकि इस कॉरिडोर के ज़रिए भारत की तरफ़ से लोग पाकिस्तान जाएंगे.

साथ ही क्या इस कॉरिडोर के ज़रिए यह माना जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान एक बार बातचीत की मेज़ पर लौट आएंगे. इस पर सुहासिनी हैदर कहती है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जब बातचीत की सबसे ज़्यादा उम्मीदें होती हैं तब कुछ भी नहीं निकलता और जब बिल्कुल भी उम्मीद नहीं होती तब कुछ बहुत बड़ा निकल आता है.

वो कहती हैं कि भारत-पाकिस्तान के रिश्तों के बारे में अंदाज़ा लगा पाना इसीलिए भी बेहद मुश्किल काम होता है. बस इतना समझ सकते हैं कि करतार कॉरिडोर एक बंद दरवाज़ा था जो अब खुल गया है.

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