कांग्रेस में कब तक चलेगी वंशवाद की राजनीति?

प्रियंका गाँधी के कांग्रेस महासचिव बनने से पार्टी ही नहीं बाहर के लोगों को भी ताज्जुब नहीं हुआ, क्योंकि यह बिल्कुल ही अनपेक्षित नहीं था। बीच-बीच में भाई राहुल की मदद करती हुई प्रियंका भले ही राजनीति के हाशिए पर खड़ी थीं, पर वह उचित समय पर पार्टी में ऊंचे पद पर आ जाएँगी, यह साफ़ था और बस सही समय का इंतज़ार था। लेकिन इससे कई सवाल भी उठते हैं। आख़िर सवा सौ साल पुरानी पार्टी एक ही परिवार पर निर्भर है, स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाने वाली पार्टी को क्यों एक परिवार से बाहर नेतृत्व देने लायक कोई नेता नहीं मिलता है, यह सवाल लाज़िमी है।

एक ही परिवार में सिमटी होने और उसी पर पूरी तरह निर्भर रहने का नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस में नए विचार नहीं आए, पार्टी समय के मुताबिक अपने को बदल नहीं पाई। उसने राष्ट्रीय स्तर पर कोई आंदोलन नहीं चलाया, वह आम जनता के बीच जाकर ख़ुद को लोगों से जोड़ नहीं पाई, उसके पास कोई कार्यक्रम नहीं था। परिवार को खुश रखने और उस हिसाब से जुगाड़ फ़िट करने में सारे लोग लग गए, नीचे से ऊपर तक एक श्रृंखला बन गई। नतीजा यह हुआ कि सबसे बड़ी पार्टी अंदर ही अंदर खोखली होती गई।

पिछले चुनाव के समय पार्टी भले ही सत्ता में थी, वह अंदर ही अंदर खोखली हो चुकी थी और जनाधार से कट चुकी थी। ऐसे में उसका नेतृत्व सोनिया गाँधी कर रही थीं, जिनका लोगों से प्रभाव ख़त्म हो रहा था। उनके बाद सीधे राहुल गाँधी थे, जो न अच्छे वक्ता थे न अच्छे रणनीतिकार या भारत को समझने वाले। जनता से सीधे पार्टी को कनेक्ट करने वाला या उसकी नब्ज़ पर हाथ रखने वाला कोई नहीं था, राहुल तो बिल्कुल नहीं। वे नरेंद्र मोदी के सामने टिक नहीं सकते थे, नहीं टिक पाए।

पिछले लोकसभा चुनाव में जब पार्टी भ्रष्टाचार, कुशासन और कई तरह के आरोपों से घिरी हुई थी और बीजेपी आक्रामक हिन्दुत्व के साथ नरेंद्र मोदी को लेकर आ गई, पार्टी ने गाँधी परिवार से बाहर किसी के नाम पर सोचा तक नहीं। पार्टी 50 सीट भी नहीं जीत पाई।
कांग्रेस की बुरी हार के बाद भी किसी ने गाँधी परिवार से बाहर नहीं सोचा। राहुल गाँधी के नेतृत्व में पार्टी एक के बाद दूसरा चुनाव हारती रही, सिमटती रही, भारतीय जनता पार्टी को लगभग हर जगह आसान जीत मिलती रही, कांग्रेस पीछे हटती रही। बुरी तरह टूटी, बिखरी, पस्त पार्टी को बीजेपी की नाकामी से एक बार फिर बल मिल रहा है तो लोग इसे भी राहुल की कामयाबी मानने लगे हैं। कांग्रेस पार्टी में जो नया संचार दिख रहा है और तीन राज्यों में जीत मिली है, वह बीजेपी के प्रति लोगों की नाराज़गी और उसके वायदों का पूरा नहीं होने की वजह से है। हिन्दुत्ववाद की राजनीति का एक सीमा से आगे नही निकल पाने की वजह से लोग कांग्रेस की ओर लौट रहे हैं।

प्रियंका गाँधी को ज़िम्मेदारी देना पार्टी का मास्टर स्ट्रोक हो सकता है। वह युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकती हैं, कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भर सकती हैं। पर यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि वह कांग्रेस का कायाकल्प कर देंगी। उनके आने के बाद भी पार्टी ज़्यादातर राज्यों में स्थानीय दलों के साथ ही चल पाएगी, मोलभाव में किसी तरह अपनी क़ीमत थोड़ा बढ़ा लेगी या जोड़तोड़ कुछ अधिक कर लेगी। लेकिन इससे पार्टी को एक बार फिर लंबे समय में नुक़सान हो सकता है। यह बात एक बार फिर स्थापित हो जाएगी कि गाँधी परिवार ही कांग्रेस पार्टी का तारणहार है। पार्टी इससे बाहर नहीं निकल पाएगी।

About News Trust of India

News Trust of India न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

Leave a Reply

Your email address will not be published.

ăn dặm kiểu NhậtResponsive WordPress Themenhà cấp 4 nông thônthời trang trẻ emgiày cao gótshop giày nữdownload wordpress pluginsmẫu biệt thự đẹpepichouseáo sơ mi nữhouse beautiful