भुखमरी के कगार पर पहुंचे 108 सेवा से निकाले गए कर्मचारी

देहरादूनः बीते लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर 108 सेवा के पूर्व कर्मी लगातार धरना दे रहे हैं. धरने को करीब 44 दिन हो चुके हैं, लेकिन अभीतक उनकी मांगों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है. अब मामले पर सरकार की ओर से कोई सकारात्मक कदम ना उठाए जाने पर कर्मचारियों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है. आज करीब दो दर्जन से ज्यादा कर्मियों ने सिर मुंडवा कर अपना विरोध जताया. साथ ही कहा कि मांगे पूरी ना होने से उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है.

बता दें कि बीते 15 मई 2018 को उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के कार्यकाल के दौरान 108 जीवीके इएमआरआई(GVK EMRI) उत्तराखंड में लॉन्च की गई थी. शुरू में ईएमआरआई यानी इमरजेंसी मैनेजमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के नाम से यह सेवा जानी जाती थी. बाद में जीवीके इएमआरआई ने इस सेवा को टेकओवर किया था. करीब 11 साल सफलतापूर्वक संचालन के बाद बीते 1 मई से नई कंपनी 108 आपातकालीन सेवा को दिया गया है. जो इसका संचालन कर रही है. शासन के नए टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से कैंप कंपनी को यह सेवाएं दी गई हैं. वहीं, सेवा टेकओवर हो जाने से ग्यारह साल 108 आपातकालीन सेवा में नौकरी कर रहे 717 कर्मचारियों के सामने रोजगार के साथ ही आर्थिक संकट खड़ा हो गया है.

उधर, 108 सेवा के पूर्व कर्मचारी समान वेतनमान और नई कंपनी में समायोजित करने की मांग को लेकर बीते 44 दिनों से परेड ग्राउंड स्थित धरना स्थल पर प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके साथ ही 108 कर्मी 34 दिनों से क्रमिक अनशन पर हैं. इन कर्मचारियों में करीब 70 से 80 कर्मचारी ऐसे हैं, जिनकी आयु चालीस से साल से ऊपर हो चुकी है. उधर, सोमवार को कर्मचारियों ने सरकार की ओर से कोई सकारात्मक कार्रवाई ना होने पर अपना सिर मुंडवा कर विरोध जताया.

ऋषिकेश लोकेशन में तैनात रहे एंबुलेंस कर्मचारी अरुण कुमार ने बताया कि उनके परिवार में 5 सदस्य हैं. जिनमें दो बेटे, उनकी पत्नी और उनकी मां शामिल हैं. ऐसे में स्कूल की फीस भरना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. सरकार उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं ले रही है. जिससे उनके सामने परिवार का भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है. साथ ही कहा कि 11 साल कंपनी में अपनी सेवाएं देने के दौरान उन्होंने कंपनी के लिए संघर्ष किया है, लेकिन अब रोजगार ना होने से उन्हें बच्चों को पालने के लिए बाहर का रुख करना पड़ेगा.

वहीं, लोहाघाट के गोविंद बल्लभ तिवारी का कहना है कि उनकी बेटी ने 91 प्रतिशत अंक लाकर पूरे विद्यालय में दूसरा स्थान हासिल किया है. ऐसे में बेटी को आगे पढ़ाना चुनौती बन गया है. उन्होंने कहा कि वे 44 साल के हो गए हैं. ऐसे में उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी. 108 आपातकालीन सेवा में उन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य क्षण समर्पित किए हैं, लेकिन अब आर्थिकी चरमरा गई है. साथ ही कहा कि परिवार में कमाने वाले वो सिर्फ अकेले हैं, ऐसे में परिवार का भरण पोषण करने के लिए पलायन का ही एक विकल्प बचा हुआ है.

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