छात्रवृत्ति घोटाला में गुनहगारों की रिपोर्ट दबाने में लगा प्रशासन

देहरादून, जेएनएन। दशमोत्तर छात्रवृत्ति घोटाले की एसआइटी जांच से पहले कॉलेजों का सत्यापन हुआ था। उस दौरान एडीएम, एसडीएम से लेकर तहसीलदार और समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने राज्य के सभी जिलों के हर कॉलेज का सत्यापन किया था। इसकी रिपोर्ट शासन को सौंपी गई थी। इस रिपोर्ट को विभाग ने सही बताते हुए किसी तरह के घोटाले से इनकार कर दिया था। मगर, दो साल बाद एसआइटी जांच हुई तो हरिद्वार जिले में जिन कॉलेजों को सत्यापन में क्लीनचिट दी गई थी, वहां करोड़ों रुपये की गड़बड़ी पकड़ में आ गई। अब सत्यापन करने वाले अफसरों की भूमिका पर सवाल उठे तो शासन में यह रिपोर्ट दबा दी गई। आरोप है कि शासन के कुछ अफसर जांच की आंच से बचने को रिपोर्ट  दबाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं।

राज्य में 2011 से 2017 के बीच बांटी गई दशमोत्तर छात्रवृत्ति में गड़बड़ी की बात सामने आई। मामला शासन के संज्ञान में आया तो तत्कालीन सचिव डा.भूपिंदर कौर औलख ने अपर सचिव रहे वी षणुमुगम से जांच कराई। अपर सचिव ने अपनी जांच रिपोर्ट शासन को सौंपी तो उनका अचानक तबादला कर दिया। बाद में अपर सचिव मनोज चंद्रन ने जांच रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए विजिलेंस, सीबीआइ या एसआइटी जांच की संस्तुति की थी। इसी रिपोर्ट में सत्यापन कराने वाले अफसरों की भूमिका की जांच भी शामिल थी। जिसमें कॉलेजों में पात्र छात्र-छात्राओं का सत्यापन कराया गया।

इसमें सभी अधिकारियों ने कॉलेजों के साथ मिलकर सत्यापन रिपोर्ट में छात्रवृत्ति आवंटन सही होने की संस्तुति दी थी। इससे पहले की मामले को दबा दिया जाता, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के निर्देश पर एसआइटी जांच के आदेश जारी हो गए। एसआइटी ने जांच शुरू की तो अकेले हरिद्वार में संचालित आधा दर्जन कॉलेजों में 50 करोड़ से ज्यादा का घोटाला सामने आ गया। जबकि अभी जांच जारी है। इस घोटाले को अंजाम देने में जहां आवेदन का सत्यापन करने वाले अफसर जिम्मेदार हैं, वहीं आवंटन के बाद कॉलेज और वहां पढऩे वाले पात्र छात्र-छात्राओं का सत्यापन करने वाले अफसर भी कम जिम्मेदार नहीं है।

एसआइटी प्रभारी मंजूनाथ टीसी का कहना है कि शासन स्तर पर हुई जांच रिपोर्ट हमें नहीं मिली है। इस रिपोर्ट में क्या था, इसकी जानकारी नहीं है। पुलिस प्रकरण की जांच का रही है। विवेचना में जो भी आएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

छात्रवृत्ति घोटाले में गिरफ्तारी की अनुमति पर टाल-मटोल 

छात्रवृत्ति घोटाले में अब शासन ने संयुक्त निदेशक गीताराम नौटियाल, हरिद्वार के सहायक समाज कल्याण अधिकारी समेत कार्मिकों की फाइल अटका रखी है। एक माह से मुकदमे और गिरफ्तारी की अनुमति न मिलने से एसआइटी की जांच लटकी हुई है। हालांकि, समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि न्याय से फाइल नहीं लौटी है। फाइल लौटने के बाद ही कुछ स्पष्ट हो सकेगा।

दशमोत्तर छात्रवृत्ति घोटाले में फंसे समाज कल्याण अधिकारियों पर शासन मेहबान है। यही कारण है कि पहले उप निदेशक अनुराग शंखधर और अब संयुक्त निदेशक गीताराम नौटियाल की फाइल पर अनुमति में देरी की जा रही है। यही नहीं, हरिद्वार के चार सहायक समाज कल्याण अधिकारी और कार्मिकों की फाइल भी शासन की अनुमति न मिलने से लटकी हुई है। एसआइटी सूत्रों का कहना है कि एक माह पहले यह फाइल शासन को मुकदमा दर्ज करने से लेकर गिरफ्तारी की अनुमति दिए जाने को भेजी गई थी। मगर, समाज कल्याण विभाग ने इन फाइलों को कई दिनों तक अपने दफ्तर में दबाए रखा। मामला सुर्खियों में आया तो आनन-फानन में फाइलें न्याय विभाग को भेजी गईं। जहां से फाइल वापस नहीं आई है।

समाज कल्याण विभाग के अपर निदेशक राम विलास यादव ने बताया कि एसआइटी का पत्र मिलने के बाद फाइलें जरूरी संस्तुति के साथ न्याय विभाग को भेजी गई हैं। न्याय विभाग से फाइल मिलते ही अनुमति की कार्रवाई की जाएगी।

एसआइटी प्रभारी मंजूनाथ टीसी का कहना है कि एसआइटी ने संयुक्त निदेशक गीताराम नौटियाल समेत अन्य की फाइल एक माह पहले शासन को भेजी थी। अनुमति मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जानी है। अनुमति में देरी से जांच प्रभावित हो रही है।

गीताराम नौटियाल से आयोग सचिव का कार्यभार छीना 

छात्रवृत्ति घोटाले के आरोपों में घिरे समाज कल्याण संयुक्त निदेशक गीताराम नौटियाल से उत्तराखंड अनुसूचित जाति आयोग के सचिव का कार्यभार छीन लिया गया है। आयोग के अध्यक्ष भूपालराम आर्य की ओर से गीताराम नौटियाल के आयोग में लगातार अनुपस्थित रहने पर की गई शिकायत के बाद शासन ने यह कदम उठाया है। आयोग में सचिव पद का प्रभार जनजाति कल्याण के संयुक्त निदेशक योगेंद्र रावत को सौंपा जाएगा।

दरअसल, गीताराम नौटियाल एक माह के अवकाश पर चले गए थे, इससे आयोग का कामकाज प्रभावित हो रहा था। इस पर आयोग अध्यक्ष बीआर आर्य ने आपत्ति जताते हुए शासन से मुलाकात की थी। कहा था कि गीताराम नौटियाल को कई कार्यभार सौंपे गए हैं, जिस वजह से वह आयोग में बिल्कुल भी समय नहीं दे पा रहे हैं। आयोग अध्यक्ष ने नौटियाल को आयोग की जिम्मेदारी से मुक्त कर किसी अन्य को यह प्रभार सौंपने का आग्र्रह किया था। इसी का संज्ञान लेते हुए गीताराम नौटियाल को जिम्मेदारी से मुक्त किया गया।

उत्तराखंड अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष भूपालराम का कहना है कि गीताराम नौटियाल एक माह के अवकाश पर चले गए हैं। इससे पहले तक भी वह आयोग में समय नहीं दे पा रहे थे। इन सब कारणों से आयोग ने शासन से आयोग के सचिव पद का प्रभार अन्य किसी को सौंपने का आग्रह किया था, जिस पर निर्णय ले लिया गया है।

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