हरिद्वार में नाला टैपिंग के नाम पर हुआ करोड़ों का ‘खेल

हरिद्वार। गंगा को गंदगी से बचाने के लिए हरिद्वार में नाला टैपिंग के नाम पर पिछले तीस साल से करोड़ों का ‘खेल’ खेला गया। अब तक 100 करोड़ से अधिक खर्च कर गंगा में गिरने वाले नालों को तकरीबन 14 बार टैप किए जाने, श्राव परिवर्तित करने और इन्हें पंपिंग स्टेशन बनाकर एसटीपी में भेजने का दावा किया गया है। बावजूद इसके सरकारी रेकॉर्ड के मुताबिक फिलहाल आठ नाले 29.45 एमएलडी (मिलयन लीटर डेली) गंदा पानी रोजाना सीधे गंगा में गिरा रहे हैं।

अब एक बार फिर गंगा की सफाई के नाम पर नालों की टैपिंग और श्राव परिवर्तन को नमामि गंगे परियोजना के तहत करोड़ों का काम शुरू किया जा रहा है, जबकि गंगा एक्शन प्लान समेत गंगा सफाई की विभिन्न सरकारी योजनाओं और अर्धकुंभ और कुंभ में अब तक 14 बार इन्हें टैप किए जाने के सरकारी दावे हैं।

सरकारी कागजों में केवल दो नाले मातृसदन नाला और लाल मंदिर नाला को छोड़ बाकी सभी को अब भी टैप ही बताया जा रहा है। लिहाजा सवाल है कि जब 20 नाले पहले ही टैप या श्राव परिवर्तित हो चुके हैं तो इन्हें दोबारा से टैप करने का जरूरत है। धर्मनगरी में गंगा को गंदा करने वाले कारकों में शहरी सीमा क्षेत्र में बहने वाले 22 बड़े नाले प्रमुख हैं। सरकारी रेकॉर्ड के अनुसार इनमें रोजाना तकरीबन 40.49 एमएलडी गंदा पानी उत्सर्जित होता है। उपनगरी ज्वालापुर सहित पुराने इलाकों में बहने वाले आधा दर्जन नालों में मल-मूत्र भी प्रवाहित होता है। इसमें आधे से अधिक यानी 29.45 एमएलडी गंदा, प्रदूषित पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। सबसे पहले नाला टैपिंग और श्राव परिवर्तन का काम वर्ष 1985 में तकरीबन साढ़े तीन करोड़ की लागत से गंगा एक्शन प्लान के तहत किया गया। इसके बाद दोबारा इसी के तहत दूसरे चरण में 1986-87 में आठ करोड़ से किया गया। इसमें रानीपुर और हरिद्वार इलाकों को शामिल किया गया।

इसके बाद 1990-91 में विशेष केंद्रीय सहायता के तहत करीब चार करोड़ से लागत से नाला टैपिंग की गई। वर्ष 1991 से 1997 तक राज्य, केंद्र व जिला की विभिन्न योजनाओं के तहत तकरीबन चार बार टैपिंग का काम कुल मिलाकर 12 करोड़ की लागत से कराया गया। 1998 में हरिद्वार कुंभ के दौरान इस पर चार करोड़ फिर खर्च किए गए, इसी दरमियान जेएनएनयूआरएम के तहत पहले तीन और बाद में चार करोड़ की सरकारी लागत इसमें लगाई गई। वर्ष 2004 अर्धकुंभ में चार करोड़ और 2010 कुंभ में साढ़े नौ करोड़ रुपये दोबारा इसी काम के लिए खर्च हुए।

इस बीच राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्राधिकरण की योजना के तहत क्रमश: छह और आठ करोड़ इस पर खर्च किए गए। इसी दौरान शहर में सीवर लाइन डालने के दौरान नालों को उससे जोडऩे के लिए दो करोड़ अतिरिक्त खर्च दिखाया गया। इसकी शिकायत होने पर तत्कालीन जिलाधिकारी सचिन कुर्वे ने सवाल-जवाब भी किया था।

वर्ष 2016 में अर्धकुंभ के दौरान इस काम को एक बार फिर किया गया, हालांकि इस बार इसे अनुरक्षण के नाम पर किया, उस पर डेढ़ करोड़ का खर्च हुआ। अब नमामि गंगे परियोजना के तहत स्वीकृत हुई 171 करोड़ की योजना के तहत इन्हें फिर से टैप व श्राव परिवर्तित करने के लिए इस पर फिर से करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। साफ है कि पहले जो काम किया गया वह बेकार गया, क्योंकि गंगा पहले से ज्यादा मैली हो गई है। सवाल उठता है कि अब किए जाने वाला काम भविष्य में दावे के मुताबिक खरा उतरेगा या इसका भी पिछले कामों की तरह का हश्र होगा, इस सवाल के जवाब की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं।

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