गिरीश ने गांवों को जोड़ने के किया 127 पुलों का निर्माण

कितना महत्वपूर्ण है लोगों को बाहरी दुनिया के साथ जुड़े रहना! नहीं, हम सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में डबल क्लिक, पोक और इनबॉक्स के बारे में बात नहीं कर रहे हैं लेकिन वास्तविक भौतिक दुनिया से सम्पर्क और संयोजन की बात कर रहे हैं। यहां तक कि 2018 में हमारे देश में बहुत से ऐसे भाग हैं जो मुख्य भूमि और शहरों से अलग हैं।

शहरी आबादी के लिए ऐसे परिदृश्य की कल्पना करना मुश्किल हो सकता है जहां लोग स्वतंत्र रूप से नहीं आ जा सकें। लेकिन एक व्यक्ति ने ऐसे दृश्यों को बदलने के लिए स्वंय को समर्पित किया है। सेतु बंधु और ब्रीज मैन ऑफ इंडिया के रूप में जाने जानेवाले गिरीश भारद्वाज ने गांवों को जोड़ने के लिए कम लागत वाली 127 पर्यावरण-अनुकूल पुलों का निर्माण किया है।

पेशे से एक यांत्रिक इंजीनियर, गिरीश अपने पिता की कार्यशाला में काम करते थे। जहां वे खेतों में प्रयुक्त मशीनों की मरम्मत किया करते थे। उनके जीवन ने पुल निर्माण की ओर मोड़ नहीं लिया होता, यदि एक वन अधिकारी ने उसे यह प्रश्न नहीं पूछा होता कि, “क्या आप कावेरी (निसार्गधाम) में एक उपद्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ सकते हैं?”

गिरीश को कुछ पता नहीं था कि वह यह कैसे पूरा करेंगें। लेकिन उन्होंने इसके लिए एक बार प्रयत्न करने का फैसला किया। वह अपने एक दोस्त की मदद से इसके लिए एक प्रारुप बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने लकड़ी की पट्टीयों, तार की रस्सियों और इस्पात की छड़ों से 50 मीटर लंबा पुल बनाया वह भी बिना किसी मूल योजना के। इससे गिरीश प्रेरित हुए और 1989 में दक्षिणी कर्नाटक के अरामंबुर में पसाविनी नदी में पहला पुल का निर्माण करने किया।

इसके बाद से गिरीश पुलों के निर्माण में लग गए और लोगों की समस्याओं को सुलझाने लगे। उन्होंने कर्नाटक के बेलगाम जिले के हुककरि में एक 290 मीटर का पुल बनाया, जो 1998 में निर्मित सबसे लंबा पुल था। गिरीश ने यह काम सिर्फ मानवता के लिए किया और कभी भी अपने काम में किसी भी जाति, पंथ, या धर्म के लिए भेदभाव नहीं किया।

2007 में, एक ऐसी घटना हुई जिसने गिरीश के एकमात्र मानवता की सेवा के लक्ष्य को समाज के सामने स्पष्ट कर दिया। वे तेलंगाना के वारंगल जिले में एक परियोजना पर काम कर रहे थे जहां उन्हें लकनावरम गांव में एक बड़े झील के किनारे लटकते हुए पुल का निर्माण किया था। उस क्षेत्र में जहां पुल का निर्माण करना था वह नक्सलियों के वर्चस्व के अधीन था।

गिरीश को उनके सामने एक बड़ी चुनौती देख पा रहे थे लेकिन उन्होंने अपना ध्यान इस पुल से कई लोगों को होनेवाले फायदे पर केंद्रित किया। तमाम धमकियों और खतरों के बावजूद, गिरीश ने चार साल तक अपना कार्य जारी रखा और इसके परिणाम ने नक्सलियों सहित उस क्षेत्र में हर इंसान को चकित कर दिया। सभी के दिल में इस सेतु बंधु के लिए शुद्ध रुप कृतज्ञता थी और उनकी अनवरत रुप से तारीफ हुई।

गिरीश ने राज्य के होम गार्ड डिपार्टमेंट में 24 साल तक अपनी सेवा दी। वे अपने काम में विभिन्न द्वीप देशों में गये जहां लोग उनके ज्ञान से लाभान्वित हुए।पद्म श्री गिरीश भारद्वाज को कई पुरस्कार और सम्मानों से नवाजा गया है।

“अनुभव चरित्र बनाता है और काम व्यक्तित्व।” गिरीश जो कर रहे हैं उससे उन्हें कुछ भी लाभ नहीं है लेकिन उनकी पहल के माध्यम से लोगों के जीवन में जो सुविधा, राहत और आनंद मिला है उसका कोई मेल नहीं है।

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