संपादकीय

भुखमरी एवं कुपोषण के चक्रव्यूह में है भारत!

दुनिया में बाल कुपोषण की सर्वोच्च दरों वाले देशों में से एक है भारत। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के पोषण संबंधी मामलों में काफी कुख्याति हासिल की है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के नवीनतम आंकड़े दिखाते हैं कि यद्यपि भारत ने पिछले दशक में बाल कुपोषण के खिलाफ अपनी लड़ाई में उल्लेखनीय प्रगति की है फिर ...

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पराली की समस्या का समाधान निकालने की जरुरत

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पराली की समस्या का समाधान निकालने के लिए प्रदेश से लेकर पंचायत स्तर तक ठोस पहल की जरूरत है। इसके लिए सरकार की नीति और नीयत साफ होनी चाहिए। पंजाब के खेतों में पराली जलना बदस्तूर जारी है। अब पराली की यह समस्या सिर्फ पंजाब की न रहकर राष्ट्रीय स्तर की बन गई है। पराली पंजाब में जलती है और ...

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राजधानी में आम आदमी के मन में भय क्यों ?

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देश की राजधानी में बदमाशों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि आम आदमी के मन में भय पैदा होने लगा है। बदमाश दिनदहाड़े वारदात को अंजाम देते हैं और पुलिस उन्हें पकड़ भी नहीं पाती। सड़कों पर हत्या, हत्या के प्रयास और लूटपाट की घटनाएं तो आए दिन हो ही रही हैं, झपटमारी की वारदात भी दिल्ली के हर ...

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UP में औरतों की अस्मत फिर बदमाशों के निशाने पर

उत्तर प्रदेश में औरत की अस्मत फिर बदमाशों के निशाने पर है। बिगड़े हालातों का आलम तो यह है कि कभी सरकारी अस्पताल में ही महिला मरीज के साथ रेप हो जाता है तो कभी कोर्ट परिसर ही दुराचार पीड़िता पर हमले का गवाह बनता है… उत्तर प्रदेश में औरत की अस्मत फिर बदमाशों के निशाने पर है। बिगड़े हालातों ...

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आखिर किसके लिए है यह ग्लोबलाइजेशन?

(डॉ. विजय अग्रवाल) फिलहाल जीडीपी, जीएसटी, तेजोमहल, पगलाया विकास, गुजरात चुनाव, गौरव यात्रा, बाबाओं के रोमांस आदि-आदि का शोर इतना अधिक है कि इस कोलाहल में भला भूखेपेट वाले मुंह से निकली आह और कराह की धीमी और करुण आवाज कहां सुनाई पड़ेगी. ऐसी ही एक ताजातरीन आवाज यह थी कि वैश्विक भूख सूचकांक में भारत ने शतक बना लिया ...

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गढ़वाली बोली में प्रचार, सोशल मीडिया को कैसे बनाया हथियार

भारत में सौ से ज्यादा भाषाएं हैं, 15 सौ से ज्यादा बोलियां हैं और हर 20 कोस के बाद बोली बदल जाती है। वहीं कुछ ऐसी बोलियां हैं जो धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। उत्तराखंड  के श्रीनगर इलाके में रहने वाली राखी धनाई  को अपनी गढ़वाली भाषा  से प्रेम था, लेकिन उन्होने अपने आसपास देखा कि लोग इसे बोलना पसंद ...

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देश में दारू की नदियां और दवाओं का अकाल क्यों ?

अपनी जिंदगी से जूझ रहे देश के ऐसे लाखों करोड़ों लोगों के लिए ये सूचनाएं क्या कहती हैं, दवा नकली मिलती है, खुद डॉक्टर्स घटिया दवा लिखते हैं कमीशन की खातिर। स्कूल हॉस्पिटल और खाने पीने का सामान बेचने वाले ही अगर किसी नियम गुणवत्ता के मापदंड पर खरे नहीं हैं तो फिर देश में सरकार क्या है। जब तक ...

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परंपरा के नाम पर वेश्यावृत्ति को मजबूर दिल्ली की ‘बहुएं’

दिल्ली! भागती-दौड़ती दिल्ली! विकास की रोशनी में चमचमाती दिल्ली! लाखों लोगों के सपनों को अपनी आंखों में जिंदा रखे दिल्ली! औरतों, मर्दो सबके बराबकी के हक की आवाज बुलंद करती दिल्ली! पैसे और शोहरत के रास्ते खोलती दिल्ली! इस चमक-धमक और दौड़ में दिल्ली का एक इलाका ऐसा भी है जो सदियों पीछे चल रहा है, रेंग रहा है… दिल्ली ...

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किसी को वोट की चिंता, किसी को नोट की चिंता !

(मोहन भुलानी, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया) किसी को वोट की चिंता, किसी को नोट की। दोनो एक दूसरे में गुंथे हुए। यद्यपि दोनों का आपस में चोली-दामन का संबंध है लेकिन अपना-अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए बाजार की अपनी चिंताएं हैं और सरकार की अपनी चिंताएं। बाजार बेचने में मस्त हैं तो सरकार की चिंताएं कुछ और। आइए, आज ...

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कर्मकांडो के नाम पर महिलाओं को डराने का धंधा

(वन्दना राय, बिहार ) “सारे धार्मिक उत्तरदायित्वों को निभाने का ज़िम्मा स्त्रियों को जो मिला है और सारे अधिकारों को भोगने का हक़ पुरुषों को।” ईश्वर को लेकर इतना डर! अपनी इतनी ऊर्जा, इतना समय और जो कुछ भी कमाते हैं उसका एक बड़ा हिस्सा भगवान के नाम पर होने वाले तमाम कर्मकांडो में खर्च करते हुए मैंने यहां भागलपुर ...

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