पहाड़वासियों को मिले जीवन निर्वाह करने के लिए मुआवजा

पहाड़ दिखने में जितने सुंदर होते हैं यहां जिंदगी जीना उतना ही कठिन। इसके बावजूद अगर वहां पर जीवन निर्वाह की चीजें ही उपलब्ध न हों तो भला वहां इंसान कैसे रह सकता है। ऐसा ही कुछ पहाड़ों में देखने को मिल रहा है। लगातार पानी के स्नोत सूख रहे हैं जिससे लोगों को पेयजल के लिए मीलों का सफर तय करना पड़ रहा है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि पहाड़ों में आज भी ज्यादातर कृषि बारिश पर ही निर्भर है। लेकिन कुछ समय से मौसम में हो रहे बदलावों के चलते समय पर बर्षा नहीं हो रही है और जब हो रही तो आपदा का मंजर सामने आ रहा है। इसका नतीजा यह है कि खेतों में पैदावर लगातार घट रही है।

जहां सदाबहार नदियां हैं वहां आलम ये है कि नीचे नदी बह रही है लेकिन उसके करीब बसे गांवों में खेती सूख रही है। पहाड़ से बहने वाली नदियों से यदि पहाड़ को ही पानी न मिले तो इन नदियों का क्या करना। रही-सही कसर गांवों में बढ़ते जंगली जानवर पूरी कर रहे हैं। बंदर, सुवर, हिरन, रीछ आए दिन ग्रामीणों की फसल को चट कर रहे हैं। आलम यह है कि ग्रामीणों को खेतों से निराश होकर लौटना पड़ रहा है। यहीं नहीं अब तो ये जानवर हिंसक भी हो चुके हैं और लोगों पर हमला भी कर रहे हैं।

आलम ये है कि ग्रामीण न तो इन जानवरों को मार सकते हैं और न ही सरकार उन्हें सुरक्षा मुहैया करा रही है। ऐसे में ग्रामीणों को जीवन निर्वाह करना चुनौतीपूर्ण बन चुका है। सरकार को चाहिए कि वह गांवों की सुध ले और इन जानवरों से निपटने के लिए कोई ठोस नीति और इंतजाम करे। ग्रामीणों को हो रहे नुकसान के लिए उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए।

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