दिल्ली के चुनावी संदेश से बीजेपी में मची खलबली

दिल्ली विधानसभा चुनाव की सियासी जंग को फतह करने के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन सारी कोशिशें नाकाम रहीं. दिल्ली चुनाव के नतीजों का राजनीतिक असर बिहार में इस साल के अंत में होने वाले चुनाव पर पड़ने की संभावना है. दिल्ली विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जेडीयू ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था. नीतीश ने खुद भी बिहारी मतदाताओं वाले क्षेत्रों में बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार किया था, लेकिन कमल खिलाने में कामयाब नहीं हो सके.

बीजेपी की मोलभाव की हालत नहीं रहेगी

बिहार से सटे झारखंड में पहले बीजेपी को सत्ता गंवानी पड़ी और अब दिल्ली में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है. इसी साल अक्टूबर में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं. बिहार में बीजेपी की योजना सहयोगी जेडीयू के बराबर सीट हासिल करने की थी. लेकिन दिल्ली के चुनावी नतीजे ने बीजेपी को उलझा दिया है. बीते 14 महीनों में बीजेपी की यह सातवीं हार है. इसके साथ ही पांच राज्यों में उसे अपनी सत्ता खोनी पड़ी है.

बिहार में बीजेपी के पास कद्दावर नेता न होने के साथ ही विधानसभा चुनावों में लगातार हार के बाद पार्टी दबाव में होगी और जेडीयू से बहुत अधिक मोलभाव करने की स्थिति में नहीं होगी. जेडीयू इस चुनाव से पहले ही बीजेपी की तुलना में अधिक सीटें मांग रही है. ऐसे में जेडीयू के नेतृत्व और उसकी शर्तों पर ही बीजेपी को चुनाव लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

बिहार में बीजेपी दिल्ली की तरह आक्रमक रहेगी?

दिल्ली चुनाव नतीजे में भले ही एनडीए के पक्ष में ना रहा हो लेकिन दिल्ली चुनाव में बिहार के बाहर एनडीए की एकता पहली बार दिखाई पड़ी है. अब इसका असर बिहार में दिखेगा. जेडीयू बीजेपी के उग्र हिंदुत्व वाले बयान देने वाले नेताओं की वजह से असहज रहती थी. जब दिल्ली में इसका असर नहीं पड़ा तो बिहार में भी इन मुद्दों से बीजेपी शायद परहेज करे ताकि नीतीश अल्पसंख्यकों का वोट भी हासिल कर सकें.

दिल्ली में केजरीवाल के सामने बीजेपी ने कोई चेहरा नहीं उतारा था लेकिन बिहार में नीतीश कुमार के चेहरे पर एनडीए चुनावी समर में उतर रही है. वहीं, नीतीश के मुकाबले फिलहाल महागठबंधन के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं जो उन्हें को टक्कर दे सके. अमित शाह ने पहले ही साफ कर दिया है कि बिहार का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ेंगे और वही सीएम का चेहरा होंगे.

नीतीश के कामों का क्या मिलेगा फायदा

केजरीवाल ने दिल्ली में कई ऐसी लुभावनी घोषणाएं कर रखी थीं जिसका सियासी फायदा उन्हें चुनाव में मिला. नीतीश कुमार ने भी कई ऐसी लोक लुभावनी योजनाएं लागू कर रखी हैं. बेटियों को साइकिल, 24 घंटे बिजली, शराबबंदी, हर घर नल, अच्छी सड़क और पेंशन योजनाएं उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियां हैं, जिसका सियासी फायदा उन्हें मिल सकता है.

दिल्ली में जनता ने विकास के नाम पर वोट किया और बिहार में एनडीए नीतीश के विकास के नाम पर ही वोट मांगने की तैयारी में है. इससे साफ जाहिर है कि विकास का एजेंडा बिहार चुनाव में एनडीए के पास प्रमुख हथियार के तौर पर है तो महागठबंधन जातीय समीकरण के जरिए उसे ध्वस्त करने की रणनीति पर है.

आरक्षण का मुद्दा बन सकता है सिरदर्द

बिहार का चुनाव विकास के साथ-साथ जातीय समीकरण से भी लड़ा जाता है और फिलहाल बिहार में एनडीए जातिगत समीकरण के साथ अपने विरोधियों पर भारी है. लेकिन प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा फिर गरमा रहा है और बीजेपी इसकी काट नहीं तलाश पाई तो उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि 2015 में आरक्षण का मुद्दा बीजेपी के लिए हार की वजह बना था.

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