उत्‍तराखंड में सगंध खेती से चमकी 21 हजार किसानों की तकदीर

देहरादून। विषम भूगोल वाले उत्तराखंड में पलायन समेत तमाम कारणों से सिमटती खेती और बंजर में तब्दील होती कृषि भूमि को फिर से संवारने को सगंध खेती सशक्त विकल्प के रूप में उभरी है। सुगंध से समृद्धि के आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सगंध पौधा केंद्र (कैप) देहरादून से मिली जानकारी के मुताबिक वर्तमान में राज्य में 7652.86 हेक्टेयर क्षेत्र में सगंध खेती हो रही है। इससे 21387 किसान जुड़े हैं और उनका सालाना टर्नओवर है लगभग 80 करोड़। साफ है कि बंजर और बेकार पड़ी भूमि से सगंध फसलें सोना उगल रही हैं। उत्साहजनक नतीजों को देखते हुए अब सरकार ने अधिकाधिक किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित करने की ठानी है।

उत्तराखंड में खेती तमाम झंझावातों से जूझ रही है। राज्य गठन के वक्त कृषि का क्षेत्रफल 7.70 लाख हेक्टेयर था, जो 97 हजार हेक्टेयर घटकर 6.73 लाख हेक्टेयर पर आ गया है। इसके अलावा परती भूमि शुरुआत में 1.07 लाख हेक्टेयर थी, जो बढ़कर 1.60 लाख हेक्टेयर पहुंच गई है। यानी 2.57 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि ऐसी है, जो बेकार पड़ी है। पड़ताल में बात सामने आई कि गांवों से पलायन, भू-क्षरण, सूखते जलस्रोत, वन्यजीवों से फसल क्षति, मौसम की बेरुखी, खरपतवारों के फैलाव से खेती सिमट रही है।

सूरतेहाल, ऐसी फसलों पर फोकस करने का निश्चय किया गया, जो इन सब कारकों से पार पाते हुए झोलियां भी भरे और पर्यावरण भी महफूज रहे। जरिया ढूंढा गया सगंध फसलों में। इस उद्देश्य की पूर्ति को अस्तित्व में आया सगंध पौधा केंद्र। 2003 में गठन के बाद से इस केंद्र की शुरू की गई मुहिम अब रंग लाने लगी है। सूचना का अधिकार के तहत कैप द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक राज्य के सभी जिलों में किसान लैमनग्रास, पामारोजा, मिंट, कैमोमाइल, तेजपात, तुलसी, डेमस्क रोज की खेती कर रहे। किसानों के रुझान के मद्देनजर अब सगंध खेती को पीकेवीवाई में भी शामिल किया गया है।

लाभकारी है सगंध खेती

कैप के निदेशक डॉ.नृपेंद्र चौहान बताते हैं कि सगंध फसलों को परंपरागत फसलों के साथ उगाकर अतिरिक्त आय ली जा सकती है। बंजर-बेकार भूमि को हरा-भरा करने में यह उपयोगी है। सिंचाई की दिक्कत नहीं है। जानवर भी इन फसलों को नहीं खाते। सगंध फसलों से तेल निकालकर इसे कैरी करना आसान है। इसके लिए आसवन सयंत्र लगाए गए हैं। सगंध तेलों का समर्थन मूल्य घोषित कर इन्हें खरीदने की व्यवस्था है।

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