TRP के लिए खबरों में तड़का लगाता इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया

(मोहन भुलानी)

आप क्या कहते हैं और क्या सोचते हैं इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है आपके सोचने की ताकत से जब आप अपने भावों को व्यक्त करते हैं। जिसकी निर्भरता उसे प्रस्तुत करने का तरीका बताती है क्योंकि मुखरता को जब शब्द मिलते हैं तो वह ओजपूर्ण बनती है।

इस आवाज़ के कई चेहरे होते हैं, जिसमें प्रेस संबंधित बातें आती हैं। क्या आज के समय में जनता की आवाज़ बने रिपोर्टर व समाचार पत्र सही मायने में उस पगडंडी पर चलते हैं, जिसे चलाने के लिए हमेशा से प्रेस को माना जाता है।

भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया

आज का समाचार कल का बासी अखबार बन जाता है क्योंकि खबर की सच्चाई को दिखाना इतना आसान नहीं होता। उसके लिए लाख तरीके निकालने पड़ते हैं ताकि सही मायने और सही तरीके से जनता के सामने ला सके।

जाहिर है, सरकार ने लोकतंत्र से आज़ादी देकर मीडिया को भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बना दिया है ताकि सच्चाई पूरी तरह से सामने आए।

मीडिया की आज़ादी से देश आगे बढ़ता है

मीडिया को जितनी आज़ादी मिलती है, देश उतना ही विकास की ओर बढ़ता है। मीडिया का मकसद है कि सरकारों को याद दिलाया जाए कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार की रक्षा और सम्मान करना इसके मुख्य कर्तव्य हैं।

अकबर इलाहाबादी ने भी इसकी ताकत एवं महत्व को इन शब्दों में अभिव्यक्ति दी है, “ना खींचो कमान, ना तलवार निकालो, जब तोप हो मुकाबिल तब अखबार निकालो।” इस पंक्ति से अभिप्राय यह है कि कलम को तोड़ने, उन्हें कमज़ोर करने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निस्तेज करने के लिए बुरी एवं स्वार्थी ताकतें तलवार और तोप का इस्तेमाल कर रही हैं।

संपादक के लिए कलम ही हथियार

दुनियाभर में पत्रकारों को सच की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है बांग्लादेश में समलैंगिक अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ता और देश की एकमात्र एलजीबीटी पत्रिका ‘रूपबान’ के संपादक जुल्हान मन्नान की हत्या।

इसी कलम की धार ने 80 के दशक मशहूर पत्रकार एन. राम और चित्रा सुब्रमण्यम की पत्रकारिता ने जब बोफोर्स तोपों की आड़ में हुए घोटाले को जनता के समक्ष पेश किया तो भारतीय राजनीति में हंगामा मच गया।

इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा है कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस एक आज़ाद एवं जीवंत प्रेस के प्रति हमारे अविश्वसनीय समर्थन को दोहराने का दिन है जो लोकतंत्र के लिए बेहद ज़रूरी है। आज के दौर में सोशल मीडिया एक सक्रिय माध्यम के रूप में उभरी है और इससे प्रेस की आज़ादी को बल मिला है।

टीआरपी बढ़ाने के लिए खबरों का तड़का

विशेषज्ञों का मानना है कि यह दिवस पत्रकारों के लिए भी आत्म-मंथन का दिवस है। आज मीडिया अपना दायित्व ठीक तरीके से नहीं निभा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टीआरपी बढ़ाने के लिए खबरों में तड़का लगाने से परहेज़ नहीं करता।

प्रेस के जिन माध्यमों से नैतिकता मुखर हो रही है, वह बहुत सीमित है, दायित्व विमुख है तथा चेतना लाने में काफी असमर्थ है क्योंकि अब पत्रकारों के बीच कोई तालमेल नहीं रहा। पहले पत्रकार अपनी कलम को अपनी ताकत समझते थे और अब पत्रकार केवल टीवी स्क्रीन पर खुद को देखना चाहते हैं। चाहे उन्हें विषयों की समझ हो या ना हो और जल्दबाज़ी में वे पत्रकारिता की बुनियादी बातें भूल जाते हैं।

पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ फेस पत्रकारिता शुरू करते हैं, जिसमें शब्द उधार के होते हैं और उधारी की ज़िंदगी की लात जब पड़ती है तो अस्तित्व को भी झकझोर देती है इसलिए कहते हैं, “कलम की ताकत को शब्दों की ताकत से महीन कर विषयों को समझकर उसमें चेतना पैदा कर।”

About न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

News Trust of India न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

Leave a Reply

Your email address will not be published.

ăn dặm kiểu NhậtResponsive WordPress Themenhà cấp 4 nông thônthời trang trẻ emgiày cao gótshop giày nữdownload wordpress pluginsmẫu biệt thự đẹpepichouseáo sơ mi nữhouse beautiful