बंदोबस्ती न होने के कारण भूमि हीन हो रहे है तराई भाबर के किसान

लालकुआं। जिले के भाबरी क्षेत्र बरेली रोड में करीब 62 वर्षो से बंदोबस्ती न होने से कई प्रकार की समस्याएं सामने आ रही है। भूमि के मकडज़ाल में भू-माफिया अपने जड़ जमाने लगा है। वहीं कई मामलों में भूमि के असली मालिक को भी अपनी भूमि गंवानी पड़ रही है। दरअसल, राज्य में 1956 में बंदोबस्ती हुई थी। उस समय हुई भूमि की बंदोबस्ती में हुई गलती व बाद में परिवारों में बंटवारों के कारण भूमि के खेत व खसरा नंबरों में गड़बड़ी हो गई। जिस कारण कई भू-स्वामी ऐसे है जो बंदोबस्ती से भूमि में काबिज है या फिर उस समय हुई बंदोबस्ती से काबिज लोगों से जमीन खरीदकर दशकों से भूमि के कब्जेदार है, लेकिन 62 वर्षों के बाद भी बंदोबस्ती न होने के कारण कई भूमि ऐसी है जो राजस्व अभिलेखों में किसी और की है, तो उसमें काबिज कोई और व्यक्ति है।

भूमि महंगी हो गई है तो लालच भी बढ़ गया है। दंबंग किस्म के भू-माफिया ऐसे जमीन को खोजने लगे है। जिसके बाद भूमाफिया जिसके नाम पर खेत व खसरा नंबर है उसको कुछ पैसे देकर दूसरे की जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम कराकर अधिकारियों से साठगांठ कर भूमि का दाखिल खारिज भी करा देते है। जिसके बाद वह दबंगई व कानून की मदद लेकर भूमि पर कब्जा कर लेते है और जो दशकों से भूमि में कब्जेदार है। उसे अपनी भूमि से ही हाथ धोना पड़ता है।

करना होगा 229बी का दावा : दरअसल भाबरी क्षेत्र में बंदोबस्ती न होने के कारण कई लोगों के खेत व खसरा नंबर किसी अन्य ग्रामीण के नाम दर्ज है। ऐसे में असली मालिक व कब्जेदार जो उस भूमि में 12 वर्ष से अधिक समय से रह रहा है उसको उपजिलाधिकारी कार्यालय में 229बी का दावा करना पड़ता है। जिसके बाद मौके की स्थिति, दोनो पक्षों के दावों को सुनने के बाद निर्णय लिया जाता है।

भूमाफिया की कट रही है चांदी : लालकुआं तहसील के अंतर्गत आने वाले राजस्व गांवों में कई ऐसे मामले में जिसमें भू-माफिया द्वारा असली मालिक को बताए बिना उसकी जमीन को अपने नाम कराकर दाखिल खारिज करा लिया गया। जिसके बाद कोर्ट व दबंगई के माध्यम से जमीन पर कब्जा जमा लिया। कई मामलों में असली मालिक को ही अपनी पुस्तैनी जमीन को बचाने के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ती है।

लालच भी बना बड़ा कारण : पूर्व में जब भूमि का दाम काफी कम होता था तो परिवारों में भाबर व पर्वतीय क्षेत्रों में रहने का समझौता हो जाता था। जिसमें आपसी सहमति से एक भाई पहाड़ में तो दूसरा भाई भाबर में रहने लगते थे। लेकिन जमीन के अभिलेखों में कोई बदलाव नहीं किया जाता था। पीढिय़ां गुजरी तो विकास भी हुआ जमीन के दाम आसमान छूने लगे। वर्तमान में न्यायालय में हल्द्वानी परगना क्षेत्र में 229बी के डेढ़ सौ से अधिक विवाद चल रहे है।

बरेली रोड़ में पिछले 25 वर्षो से संचालित एक क्रशर की भूमि में पिछले दिनों किसी अन्य व्यक्ति ने अपना दावा कर दिया। 25 वर्षो से कब्जा होने के बावजूद भू अभिलेखों में नाम नहीं दर्ज होने के कारण क्रशर स्वामी न्यायालय में हार गया। इसके अलावा मोटाहल्दू में 30 वर्ष से पांच बार बिक चुकी भूमि में पड़ोसी द्वारा अपना दावा किया जा रहा है। अब वर्तमान भू-स्वामी भूमि के अभिलेख लेकर दर दर की ठोकर खाने को मजबूर है। इधर बेरीपड़ाव में मंदिर के पीछे एक प्रॉपर्टी डीलर द्वारा खरीदी गई भूमि में हल्द्वानी व काशीपुर के कुछ दबंगों ने अपना बताते हुए कब्जा कर लिया।

बाद में लाखों रुपये देकर मामला रफादफा किया गया। एसडीएम हल्द्वानी एपी वाजपेयी ने  बताया कि 1956 के बाद दूसरा भूमि बंदोबस्त न होने के कारण भूमि के मौके व अभिलेखों की स्थिति में भिन्नता आ रही है। जिससे विवाद व न्यायालयों में कानूनी वाद भी बढ़ रहे है। 2016 में हल्द्वानी के गौजाजाली व मुखानी के गावों में बंदोबस्त हुआ था। वर्तमान लालकुआं व दमुवाढूंगा जवाहर ज्योति बंदोबस्ती के अधीन है। इसी प्रकार जिले के अन्य गांवों में बंदोबस्त होना चाहिए। ताकि भूमि की सही स्थिति समाने आ सके।

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