कैसे डूब गया अनिल अंबानी का पूरा साम्राज्य?

अनिल अंबानी के साम्राज्य के पतन की हर तरफ चर्चा हो रही है. 10 साल पहले दुनिया के सबसे अमीर शख्सियत में से एक रहे अनिल अंबानी की एरिक्सन कंपनी की देनदारी ना चुकाने पर जेल जाने तक की नौबत आ गई. कई प्रतिद्वंद्वियों का कहना है कि अनिल अंबानी बेहद महत्वाकांक्षी थे जबकि अनिल अंबानी के समर्थन में खड़े लोगों का मानना है कि उनकी कुछ कंपनियों की हालत इसलिए खराब हुई क्योंकि पूरा सेक्टर ही खराब दौर से गुजर रहा था.

अनिल अंबानी की टेलिकॉम कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCom) कर्ज उतारने के लिए खुद ही दिवालियापन के रास्ते पर चलने को तैयार है. ऊर्जा क्षेत्र की कई परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं और कर्ज का बोझ कम करने के लिए कंपनी कई कीमती पूंजी बेचने को तैयार हैं. RCom पर ही एरिक्सन से 550 करोड़ रुपए की देनदारी हो गई थी जिसकी वजह से अनिल अंबानी पर जेल जाने का खतरा मंडराने लगा था. हालांकि, बड़े भाई मुकेश अंबानी ने अनिल अंबानी की समय रहते मदद कर दी जिससे अनिल ने अपनी देनदारी चुका दी. अनिल अंबानी की रक्षा कंपनी रिलायंस नैवल ऐंड इंजीनियरिंग भी कर्ज तले डूबी हुई है. इसके अलावा उनके इन्फ्रास्ट्रक्चर वेंचर की भी हालत खराब है.

केवल अनिल की वित्तीय कंपनी रिलायंस कैपिटल (RCap) अच्छा प्रदर्शन कर रही है, हालांकि इस कंपनी ने भी कई मौके गंवाए हैं. वहीं, बजाज फाइनेंस, श्रीराम कैपिटल और कैपिटल फर्स्ट पिछले कुछ सालों में तरक्की कर रही हैं.

2008 के एक सर्वे में अनिल अंबानी 42 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ दुनिया के 6वें सबसे अमीर शख्स थे. वर्तमान में उनकी सात सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्य करीब 13742 करोड़ रुपए है. अनिल अंबानी फोर्ब्स की सूची में भारत में  50वें नंबर से नीचे और दुनिया में शीर्ष 100 से नीचे पहुंच चुके हैं. अनिल के ग्रुप का कुल कर्ज मार्च 2018 में 1.72 करोड़ रुपए पहुंच गया था जबकि टेलिकॉम सेक्टर में भी पिछले साल भारी-भरकम नुकसान हुआ.

अनिल अंबानी की कंपनी ने राजनेताओं, मीडिया और लेखकों के खिलाफ कुल 28 मानहानि के मुकदमे ठोके हैं. Scroll.in की रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से करीब 16 मुकदमों में 80,500 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति का दावा किया है. अनिल अंबानी ने पिछले साल इडेलविस के खिलाफ भी केस किया था.

अतीत में अनिल अंबानी पिता के साम्राज्य के बंटवारे को लेकर अपने बड़े भाई मुकेश अंबानी को भी कोर्ट में घसीट चुके हैं. 2008 में मुकेश अंबानी ने ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ को दिए एक इंटरव्यू में अनिल के खिलाफ एक टिप्पणी कर दी थी जिसके लिए छोटे भाई ने मुकेश पर 10,000 करोड़ रुपए का मानहानि का मुकदमा कर दिया था. हालांकि, दो साल बाद उन्होंने केस वापस ले लिया.

पिछले साल रिलायंस इन्फ्रा ने पीपावव डिफेंस फाउंडर के प्रमोटर्स निखिल गांधी और भावेश गांधी और उनकी कंपनियों के खिलाफ ‘वारंटी का उल्लंघन’ करने के लिए 5440 करोड़ रुपए का नोटिस भेजा था. रफाल डील में भ्रष्टाचार के आरोपों पर अनिल अंबानी ने विपक्षी दलों, मीडिया संगठनों और पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज कराए.

अनिल अंबानी की कंपनियों को भले ही मीडिया को जवाब देना पसंद नहीं हो लेकिन हर तरफ सवाल उठ रहा है कि एक तेज-तर्रार कारोबारी और चुटकियों में अच्छे सौदे करने वाले अनिल अंबानी का साम्राज्य पिछले एक दशक में कैसे दरक गया?

इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है धीरूभाई अंबानी की मौत के बाद रिलायंस साम्राज्य के बंटवारे की लड़ाई से. इससे पहले अनिल अंबानी को कर्ज के लिए निवेशकों से बात करते देखा जाता था. प्रेस के साथ वही संवाद करते थे. टेक्सटाइल बिजनेस की रिपोर्टिंग भी उन्हीं को की जाती थी. दूसरी तरफ, मुकेश अंबानी की छवि शांत व्यक्तित्व के तौर पर थी. वह पेट्रोकेमिकल और रिफाइनरी बिजनेस के कामकाज का जिम्मा संभाल रहे थे. मुकेश ने टेलिकॉम बिजनेस शुरू किया. दोनों भाई एक-दूसरे के पूरक नजर आते थे.

जब दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई तो 2005 में धीरूभाई अंबानी के साम्राज्य का आखिरकार बंटवारा हो गया. मुकेश अंबानी को पेट्रोकेमिकल, टेक्सटाइल, रिफाइनरी और तेल-गैस का बिजेनस मिला जबकि अनिल अंबानी के हिस्से टेलिकॉम, ऊर्जा, इन्फ्रास्ट्रक्चर और वित्त का बिजेनस आया. दोनों ने एक-दूसरे के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा नहीं करने की शर्त वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

बंटवारे के तुरंत बाद ही दोनों अंबानी भाई कारोबार का विस्तार करने में लग गए. मुकेश अंबानी ने रिटेल बिजनेस में हाथ आजमाया. जिस वक्त अंबानी ने इस सेक्टर को चुना, उस समय (2000 में) इसे ज्यादा संभावनाओं वाला क्षेत्र नहीं माना जाता था. बिजनेस बढ़ाने के लिए भारी-भरकम कर्ज लेने के बावजूद 2012 तक मुकेश अंबानी का कारोबार पूरी तरह से कर्ज मुक्त हो चुका था. मुकेश रिलायंस रिटेल में भी पैसा लगा रहे थे ताकि मार्केट शेयर की बाजी जीती जा सके.

दूसरी तरफ अनिल अंबानी बड़ी-बड़ी योजनाएं बना रहे थे. उनका सपना टेलिकॉम, ऊर्जा और इन्फ्रास्ट्रक्चर, यहां तक कि मनोरंजन सेक्टर में भी सबसे बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरना था. इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स एडवाइजर्स सर्विसेज (IIAS) फाउंडर ऐंड मैनेजिंग डायरेक्टर अमित डंटन कहते हैं, “वह एक बिजनेस से दूसरे बिजनेस में कूद रहे थे लेकिन इन्हें चलाने में कई खामियां थीं. कई परियोजनाओं में अनुमान से ज्यादा लागत आई और उनसे बिल्कुल भी रिटर्न हासिल नहीं हुआ.”

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