लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था में ग्रामीण आर्थिकी मजबूत करना आवश्यक- गोविंदाचार्य

– के.एन. गोविन्दाचार्य
कोरोना महामारी से लड़खड़ाती देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए प्रख्यात चिंतक श्री के.एन. गोविन्दाचार्य ने गांवों पर विशेष ध्यान देने की बात कही है। इस दिशा में पहल करते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में स्थित तेरहुतीपुर-कैथौली ग्रामसभा (ब्लाक मार्टिनगंज, थाना-बरदह) को अपना गांव मानकर वहां काम करने का फैसला किया है। लाकडाउन खत्म होने के बाद वे यहां रहकर ग्राम विकास के विविध पहलुओं पर काम करेंगे। प्रस्तुत है इस बारे में लिखा उनका एक लेख…

गांव में रहने के मेरे निर्णय के पीछे तात्कालिक रूप से कोरोना और कुछ अन्य कारणों की एक भूमिका है, लेकिन वास्तव में इसका एक ऐतिहासिक संदर्भ भी है। इसे आप भी समझें, इसलिए यहां मैं गांधी जी के एक पत्र का उल्लेख करना चाहता हूं जिसे 5 अक्टूबर, 1945 को उन्होंने अपने राजनीतिक वारिस पंडित नेहरू को लिखा था। इस पत्र में गांधी जी ने पं. नेहरू को समझाने की कोशिश की थी की वे ग्राम स्वराज के मुद्दे को आगामी स्वतंत्र भारत के विधान का अभिन्न अंग बनाएं। गांधी जी द्वारा हिंदी में लिखे इस पत्र का नेहरू जी ने अंग्रेजी में एक छोटा सा जवाब दिया जिसका मंतव्य था कि गांव आमतौर पर बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा होता है और ऐसे वातावरण में प्रगति नहीं की जा सकती। इस पत्र व्यवहार के बाद गांधी जी व नेहरू जी की पुणे में मुलाकात हुई। यहां एक बार फिर गांधी जी ने नेहरू जी के सामने ग्राम स्वराज की अपनी कल्पना स्पष्ट की, लेकिन वे नेहरू जी को नहीं मना पाए। इसके बाद दोनों में ग्राम स्वराज के मुद्दे पर दुबारा कोई गंभीर वार्ता नहीं हो पाई।

 
वास्तव में पंडित नेहरू 1927 में सोवियत रूस की यात्रा के बाद वहां की केन्द्रीकृत योजनाओं से बड़े अभीभूत थे। स्वतंत्रता के बाद वे उसी माडल को भारत में लागू करना चाहते थे। योजना आयोग का गठन उनकी इसी सोच का हिस्सा था। रूसी माडल की नकल करते हुए उन्होंने सामुदायिक विकास कार्यक्रमों की शुरूआत की। उन्हें अपने इस प्रयासों से बड़ी अपेक्षा थी। लेकिन 1957 में जब इन योजनाओं की समीक्षा हुई तो उन्हें बड़ा धक्का लगा क्योंकि जमीनी स्तर पर परिणाम बहुत निराशाजनक थे।
 
उसी दौरान जेपी ने नेहरू को एक लंबा पत्र लिखा। उस समय वे सक्रिय राजनीति से हटकर भूदान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। इस पत्र को एक पुस्तिका के रूप में भी छापा गया जिसका शीर्षक था – राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना – एक सुझाव। इस पर देश में बड़ी चर्चा हुई। इसे अखबारों ने प्रमुखता से छापा। जेपी के इसी पत्र को आधार बनाकर नेहरू ने बलवंत राय मेहता कमेटी गठित की। कमेटी ने अन्य बातों के साथ पंचायती राज व्यवस्था को भी लागू करने की सिफारिश की। सरकार ने कमेटी की सिफारिशों को मान लिया लेकिन दुर्भाग्य वश इसे लागू करने के लिए कोई खास पहल नही की।
 
अंततः लंबी प्रतीक्षा के बाद 1993 में 73वें संविधान संशोधन के द्वारा ग्राम स्वराज की दिशा में पहला सार्थक कदम उठाया गया। आज देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू है। लेकिन इसकी कमियां जगजाहिर हैं। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें अभी भी पंचायतों को अधिकार देने से बच रही हैं। पंचायतों के आर्थिक और प्रशासनिक अधिकार नगण्य हैं। आज पंचायतें वास्तव में केन्द्र और राज्य सरकारों की योजनाओं को लागू करने की एक एजेंसी बन कर रह गई हैं। गांव समाज के सरोकार से उनका कोई लेना देना नहीं है। कुछ सरपंच अपनी व्यक्तिगत निष्ठा के कारण अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन इसमें राज्य व्यवस्था की भूमिका बहुत सीमित है। लंबे समय से पंचायतों को केन्द्रीय बजट का 7 प्रतिशत मुक्त आबंटन कराने के लिए मैं अपनी आवाज उठाता आया हूं। लेकिन सरकारों ने इसे अब तक अनसुना ही किया है।
 
गांव में रहते हुए मैं देश की पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाने की अपनी मुहिम को जारी रखूंगा। मेरा मानना है कि जब तक सच्चे अर्थों में ग्राम स्वराज की स्थापना नहीं होती तब तक भारत समर्थ नहीं हो सकता। आज देश जिन समस्याओं से जूझ रहा है, उनमें से ज्यादातर का समाधान ग्राम स्वराज में ही है। उसे साकार करना के लिए मैं आजीवन प्रयत्न करता रहूंगा।
 
पंचायती राज के वैधानिक पक्ष पर काम करने के साथ-साथ मेरी प्राथमिकता उन सूत्रों को ढूंढने में भी रहेगी जिनके द्वारा गांव के विकास का एजेंडा पूरे समाज का एजेंडा बन सकता है। गांवों के विकास में प्रत्येक भारतीय की भूमिका हो, इसके लिए मैं सभी को चार समूहों में बांट कर उनके लिए करणीय बिंदुओं की तलाश करना चाहता हूं। ये चार समूह हैं-
 
(क) शहरों के वे लोग जो अभी भी अपने पुश्तैनी गांव के संपर्क में हैं।
(ख) शहरों के वे लोग जो अपने पुश्तैनी या किसी अन्य गांव के नियमित संपर्क में नहीं है।
(ग) गांवों के वे युवा जो अपनी आजीविका कमाने के लिए शहरों मे आना चाहते हैं।
(घ) गांवों में रह रहे अन्य लोग।

ये लक्ष्य मुश्किल हैं लेकिन असंभव नहीं। कोरोना के कारण देश-दुनिया में जो मुश्किल हालात बन रहे हैं, उनका समाधान गांवों की मजबूती से ही निकलेगा। इसी में सबका हित है। इस दिशा में मैं अपनी भूमिका का ईमानदारी से निर्वहन कर सकूं, इस हेतु मैंने अपने लिए कुछ बुनियादी बातें तय की हैं जो इस प्रकार हैं।

1. तेरहुतीपुर मेरा अब अपना गांव है। मैं अब कहीं भी रहूं मेरा स्थायी पता वहीं का होगा। आगे जब जितनी जरूरत होगी मैं देश भर में पहले की भांति ही प्रवास करता रहूंगा, लेकिन लौट कर अपने गांव आउंगा। और जब गांव वापस आउंगा तो मेरी स्थिति अतिथि की नहीं बल्कि गांव के एक बेटे की होगी।
2. चूंकि मैं अब अपने को तेरहुतीपुर का निवासी मानता हूं, इसलिए मैं अपने और अपने अतिथियों के लिए घर और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था स्वयं करूंगा। इसके लिए मैं गांव के लोगों पर भार नहीं डालूंगा। शुरूआत में किराए पर रहूंगा। धीरे-धीरे कुछ स्थाई प्रबंध किया जाएगा।
3. मेरी दृष्टि में तेरहुतीपुर गांव देश के लाखों गांवों का एक प्रतिनिधि रूप है। यहां मेरी प्राथमिकता में वे कार्य होंगे जिनकी प्रासंगिकता देश के सभी गांवों के लिए हो। इस गांव विशेष को कुछ अतिरिक्त सुविधाएं मुहैया करा देना या यहां के निवासियों को कुछ तात्कालिक लाभ पहुंचा देना मेरा मूल उद्देश्य नहीं है।
4. जो साथी गांवों में काम कर रहे हैं या करना चाहते हैं, वे अपने चयनित गांव में काम आगे बढ़ाएं। इस बारे में अपना अनुभव वे मुझे बताते रहें तो अच्छा रहेगा। मैं भी उन्हें अपनी गतिविधियों और अपने अनुभवों से अवगत कराता रहूंगा। उचित समय आने पर हम संवाद से आगे बढ़कर सहयोग और सहकार के तल पर काम
करने का प्रयास करेंगे।
5. गांव की इस यात्रा में एक-दूसरे से संपर्क में रहने के लिए एक फेसबुक ग्रुप बनाया गया है, जिसका नाम है – मेरा गांव मेरा देश – My Village My Country.

 
मैं चाहता हूं कि इस फेसबुक ग्रुप से आप जुड़ें ताकि इस मुद्दे पर हमारे बीच निरंतर संवाद बना रहे।

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