करण सीकरी ने बनाया देश में पहला जैविक खाद का प्लांट

कुरुक्षेत्र: हमारे देश में बहुत ही आम धारणा बन चुकी है कि आज की पीढ़ी खेती नहीं करना चाहती या फिर कोई भी किसान नहीं चाहेगा कि उसके बच्चे किसानी करें। पर आज बहुत से ऐसे युवा हैं, जिन्होंने पढ़ने-लिखने के बाद कृषि को करियर के तौर पर चुना और आज प्रगतिशील किसान के तौर पर अपनी पहचान बना रहे हैं।

ऐसे ही एक उद्यमी और प्रगतिशील किसान हैं, कुरुक्षेत्र के 33 वर्षीय करण सीकरी, जिन्होंने न सिर्फ़ खेती की, बल्कि उसी खेती की नींव पर अच्छा-ख़ासा जैविक खाद का कारोबार खड़ा किया है!

हरियाणा के कुरुक्षेत्र में शाहबाद मारकंडा जिले के ढंगाली गाँव से ताल्लुक रखने वाले करण सीकरी की स्कूली शिक्षा दिल्ली से हुई। द बेटर इंडिया से बात करते हुए करण ने बताया,

“पापा गाँव में रहकर खेती करते थे, पर उन्होंने हमें दिल्ली भेज दिया, ताकि हमारी पढ़ाई अच्छे से हो। उन्होंने जो भी समस्याएँ झेली हों, पर हमें कोई कमी नहीं होने दी। मैंने अपनी 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई दिल्ली से ही की।”

करण अक्सर छुट्टियों में ही अपने गाँव जाते थे। बचपन में खेती के प्रति उन्हें लगाव तो था, पर तब उन्होंने कभी भी इसे अपने करियर के तौर पर नहीं सोचा था। लेकिन जब 12वीं कक्षा में उन्हें अपने आगे के करियर पर विचार करना था, तो ऐसे ही किसी ने उन्हें सलाह दी कि वे कृषि के क्षेत्र में ही कुछ क्यों नहीं करते?

“बस एक आईडिया था यह किसी का, पर पता नहीं क्यों मुझे लगा कि मैं यह कर सकता हूँ। मुझे पता था कि मैं पढ़ने-लिखने में इतना ज़्यादा तेज़ तो नहीं हूँ, कि आईआईटी वगैरह में जा सकूँ, पर खेती से संबंधित कुछ करने के लिए मेरी रूचि खुद-ब-खुद बन गयी। मैंने कृषि से संबंधित कोर्स और कॉलेज आदि का पता किया। हालांकि, उस वक़्त मेरा दाखिला कहीं भी नहीं हो पाया,” करण ने बताया।

पर करण कृषि के क्षेत्र में ही आगे जाने का मन बना चुके थे। उन्होंने किसी और विकल्प को अपने दिलो-दिमाग में आने तक नहीं दिया और अपने पिता के साथ अपने गाँव में खेती करने का फ़ैसला किया। करण के इस फ़ैसले में उनके पिता ने पूरा साथ दिया। हालांकि, उनका बाकी परिवार इस बात को लेकर चिंतित था, पर करण के पिता उनके साथ खड़े रहे।

“मेरे पापा के पास उस वक़्त इतने पैसे तो नहीं थे, कि वे मेरी कोई आर्थिक मदद कर सके पर उन्होंने मुझे पूरे विश्वास के साथ अपनी ज़मीन दे दी। उन्होंने मुझे हर कदम पर संभाला, सिखाया और मुझे मेरे तरीके से चीज़े करने की आज़ादी दी,” करण ने कहा।

शुरू में उनके लिए खेती बिल्कुल भी आसान नहीं थी। भले ही वे किसान परिवार से थे, पर अब तक का उनका जीवन दिल्ली जैसे शहर में गुज़रा था। गाँव के माहौल में रहना भी उनके लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रहा।

“पहले तो सभी लोग कहते थे कि पागल हो गया है ये, दिल्ली में रहकर खेती करने आया है। मेरे स्कूल के दोस्त भी मज़ाक उड़ाते थे कि अपनी ज़िंदगी ख़राब कर रहा है। पर उस समय, मुझ पर बस किसान के रूप में खुद को साबित करने की धुन सवार थी,” करण ने हंसते हुए कहा।

खेती में कुछ न कुछ नया करने का जुनून करण के लिए राहें खोलता रहा। उन्होंने बताया कि खेतों में काम करने के साथ-साथ उन्होंने कृषि से जुड़े अलग-अलग संस्थानों की वर्कशॉप, ट्रेनिंग और कृषि मेलों में जाना शुरू किया।

“आज किसी फ़सल को लगाने से लेकर अगर आप मुझसे यह कहें कि मैं टोमेटो कैच-अप बना दूँ, तो मैं यह भी कर सकता हूँ। मैंने खेती से जुड़ी चीज़ों पर जो भी वर्कशॉप और ट्रेनिंग की, उन सभी के ज्ञान को मैंने आज़माना भी शुरू किया। अलग-अलग फ़सलें बोना और फिर अलग तरीके से खेती करना, मैं कुछ न कुछ एक्सपेरिमेंट करता ही रहता था,” करण ने कहा।

बहुत बार करण असफ़ल रहे। वे जितनी मेहनत करते, उतनी सफ़लता उन्हें नहीं मिलती। इसके चलते बहुत बार क़र्ज़ उन्हें क़र्ज़ भी लेना पड़ा। पर करण ने हार नहीं मानी और उनकी मेहनत आख़िरकार रंग लाने लगी।

एक और बात थी, जो अक्सर करण को बहुत परेशान करती थी। दरअसल, गाँव में उनके खेतों की ज़मीन की उर्वरकता और उपजाऊ शक्ति बहुत कम थी। इसके कारण उनकी उपज बहुत कम होती थी। करण बताते हैं,

“मेरे पापा हमेशा कहते थे कि हमारी ज़मीन कमज़ोर है और मैं इस बात को बदलना चाहता था। मैं किसी भी तरह हमारी ज़मीन को ज़्यादा से ज़्यादा उपजाऊ बनाना चाहता था, जहाँ पर खेती करते समय किसान खुद को कमज़ोर महसूस न करे।”

उनके इसी विचार ने ‘सीकरी फार्म्स’ की नींव रखी। अलग-अलग जगह वर्कशॉप में जाने पर उन्हें जैविक खाद और खेती के लिए इसके बहुत से फायदों के बारे में पता चला। साथ ही, इसे बनाने की विधि भी बहुत ही आसान थी।

उन्होंने अपने गाँव में घरों से गोबर, किचन से निकलने वाला कचरा आदि इकट्ठा कर, अपने ही खेत में जैविक खाद बनाकर, इसे इस्तेमाल करना शुरू किया। जैसे-जैसे उन्हें इसके बारे में और जानकारी होती गयी, उन्हें समझ में आ गया कि उनकी कमज़ोर ज़मीन को जैविक खाद और खेती के आधुनिक तरीके इस्तेमाल करके ही उपजाऊ और उर्वरक बनाया जा सकता है।

साल 2004 में ‘सीकरी फार्म्स’ के नाम से उन्होंने जैविक खाद का व्यवसाय शुरू किया, जिसे उन्होंने ‘उत्तम’ वर्मीकंपोस्ट का नाम दिया। खेती करने के साथ-साथ उन्होंने अपने खेतों में जैविक खाद बनाकर, इसे आस-पास के गांवों में किसानों को देना शुरू किया। पहले तो उन्हें किसानों को रसायन की जगह जैविक खाद इस्तेमाल करने के लिए मनाने में काफ़ी मुश्किलें आयीं। पर जब उनके अपने खेत में लोगों ने जैविक खाद का सकारात्मक असर देखा, तो अपने-आप किसान उनके पास आने लगे।

“बिल्कुल भी आसान नहीं था शुरुआत में, क्योंकि मैं अकेले ही खाद बना रहा था, फिर उसकी पैकेजिंग, मार्केटिंग और फिर किसानों तक पहुँचाना। सभी काम अकेले मुझे ही करने पड़ते थे। पर इस सब में मेरे परिवार ने मेरा साथ दिया। धीरे-धीरे, हमारे जैविक खाद की पहुँच कुरुक्षेत्र से हरियाणा के बाकी जिलों तक पहुँची और फिर देश के कुछ अन्य राज्यों तक,” करण ने कहा।

“समस्याएं तो अभी भी हैं। सबसे बड़ी एक समस्या, जो हम झेल रहे हैं, वह है काम करने के लिए अच्छे लोग मिलना। आजकल लोगों में बेसिक स्किल भी नहीं हैं। शायद आज सभी स्टार्ट-अप इस परेशानी से गुज़र रहे हैं, कि वे जैसे-तैसे मेहनत करके लोगों को तैयार करते हैं और फिर वही लोग उन्हें छोड़कर किसी और बड़ी कंपनी के साथ जुड़ जाते हैं या फिर अपना कुछ शुरू कर लेते हैं। हमने भी बहुत मुश्किल से थोड़ा-थोड़ा कर इतना स्टाफ बनाया है। लेकिन अभी उन पर और काम करना बाकी है, ताकि वे इस कंपनी को अपना समझकर इसमें काम करें,” करण ने कहा।

आज सीकरी फार्म्स से सालाना लगभग 80, 000 मेट्रिक टन जैविक खाद बन रहा है और हज़ारों किसानों तक पहुँचाया जा रहा है। इसके अलावा, कृषि के क्षेत्र में नयी-नयी चीज़ें सीखने के लिए करण कभी इज़राइल, ऑस्ट्रेलिया तो कभी चीन का दौरा करते रहते हैं।

अपने लगातार प्रयासों से उन्होंने कृषि को एक अच्छे करियर विकल्प के तौर पर बना दिया है। आज करण सीकरी की सफ़लता बहुत-से युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।

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