प्रवासी पहाड़ी लोग संकट की घड़ी में अपने पहाड़ों की तरफ लौटने को हो रहे है आतुर

कहते हैं सपने अपनों से बड़े होते हैं। ..और हम हैं कि सपनों के लिए अपनों और अपनी जमीन को छोड़ने में पलभर भी नहीं सोचते। अब जब संकट सिर पर खड़ा है तो कौन पनाह दे रहा है? कोरोना संक्रमण के बीच जब काम-धंधा ठप्प है तो लोग क्यों उन पहाड़ों की तरफ लौटने को आतुर हैं, जिन्हें दुर्गम बताकर पीछे छोड़ आए थे। अब परिस्थितियां विषम हई तो बड़ी संख्या में लोग पहाड़ लौट गए हैं। आगे बढ़ने में गुरेज नहीं है, पर अपनी जड़ों को भूल जाना भी गलत है। रोज नहीं, कुछ महीने नहीं, साल में एक बार तो अपने मूल स्थान की सुध लेनी चाहिए। क्या पता लोगों की हलचल पाकर सरकार भी इन गांवों की सुध ले ले। क्या पता कुछ का प्रेम भी जाग जाए पहाड़ के प्रति। रिवर्स माइग्रेशन का मतलब पीछे हटना नहीं, अपनी जड़ों को और मजबूत बनाना भी होता है।

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