मां नंदा- सुनंदा यहां खुद लेती हैं अपना स्वरूप

कुमाऊं में कुल देवी के रूप में पूजे जाने वाली मां नंदा- सुनंदा के महोत्सव का रंगारंग आगाज हो गया है. मां नंदा सुनंदा की मूर्ति निर्माण के लिए सरोवर नगरी नैनीताल में लाए गए केले के पेड़ यानी (कदली) से मां की मूर्ति का निर्माण किया गया. मां की मूर्ति का निर्माण बीती शाम से शुरू किया गया है जो रात 12 बजे तक चला जिसके बाद देर रात मां की मूर्तियों को मंदिर परिसर में स्थापित कर दिया गया और सुबह 4 बजे की ब्रह्म मुहूर्त में मां की मूर्ति वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ भक्तों के दर्शन के लिए खोल दी गईं.

मूर्ति निर्माण कर रहे कलाकारों का मानना है कि मां अपने स्वरूप का आकार खुद लेती हैं. कभी मां का हंसता हुआ चेहरा बनता है तो कभी दुख भरा जिससे आने वाले समय का भी आकलन किया जाता है कि आने वाला समय कैसा होगा.

कई सालों से मां की मूर्ति को आकार दे रहे कलाकार बताते हैं कि उनके द्वारा मां की मूर्ति निर्माण में जो रंग प्रयोग किया जाता है. वह पूरी तरह से ईको फ्रेंडली होते हैं. वहीं मां की मूर्ति निर्माण में करीब 24 घंटे का समय लगता है जिसमें बांस, कपड़ा, रुई आदि का प्रयोग किया जाता है जिसके बाद मां की मूर्ति को सोने-चांदी के आभूषणों से सजा दिया जाता है.

वहीं, नंदा देवी मां भगवती का अवतार और भगवान शंकर की पत्नी हैं और पर्वतीय अंचलों की मुख्य देवी के रूप में पूजी जाती है . नंदा-सुनंदा को लेकर तमाम लोक गाथाएं प्रचलित हैं. इस पर्व में लोकगाथा पर नंदा-सुनंदा की गाथा का सुन्दर मंचन किया जाता है. जिसे स्थानीय भाषा में किया जाता है. जिसमें कुमाऊंनी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है.

मान्यता है कि मां अष्टमी के दिन स्वर्ग से धरती में अपने मायके आती हैं और कुछ दिन यहां रहने के बाद वापस अपने मायके लौट जाती हैं. अष्टमी के मौके पर इस महोत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें देश ही नहीं बल्कि विदेशी भक्त भी मां का आशीर्वाद लेते हैं.

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