मुंबई की इस युवती ने गरीब बच्चों की मुफ़्त शिक्षा के लिए बनाया स्कूल

22 वर्षीय हेमंती सेन को आप हर दिन कांदिवली स्टेशन स्काईवॉक पर 15 बच्चों को गिनती, वर्णमाला, शब्द, चित्रकारी आदि सिखाते हुए देख सकते हैं और वह भी बिना किसी फ़ीस के! ये सभी उन लोगों के बच्चे हैं, जो स्टेशन के आस-पास की झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं और भीख मांगकर गुज़ारा करते हैं।मई, 2018 में हेमंती इन बच्चों के संपर्क में आई और तब से उनका एक ही लक्ष्य है – इन बच्चों को इस तरह से तैयार करना, कि इन्हें शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत सामान्य स्कूल में दाखिला मिल जाये।

“काम पर जाते समय, अक्सर मैं इन बच्चों को या तो भीख मांगते या फिर यूँ ही अपना समय बर्बाद करते हुए देखा करती थी और मैं सोचने पर मजबूर हो जाती कि ये बच्चे किस तरह के मुश्किल माहौल में पल रहे हैं। क्या उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का महत्त्व पता है? क्या ये स्कूल जा रहे हैं या शिक्षा के अधिकार अधिनियम के बारे में जानते भी हैं?“ अपने इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए हेमंती ने इन बच्चों के परिवारों से मिलने का फ़ैसला किया।

“मैंने कुछ बच्चों को कांदिवली स्टेशन पर एस्कलेटर के पास देखा और उनसे पूछा कि क्या वे मुझे अपने माता-पिता से मिलवा सकते हैं और वे मान गये। मैं इनके माता-पिता से मिली और बच्चों की शिक्षा के बारे में पूछने लगी। पर वे इस पर टाल-मटोल करने लगे और मुझे अहसास हुआ कि वे मुझे सच नहीं बता रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि चाहे ये बच्चे स्कूल जाते हो या नहीं, मैं हर दूसरे दिन 3 बजे आकर बच्चों को कुछ न कुछ बनाना सिखाउंगी। पर मुझे टालने के लिए उन्होंने कहा, ‘हम इन्हें स्कूल से निकाल लेते हैं, तुम ही इन्हें पढ़ा लो, इन्हें खिलाओ और कपड़े भी खरीद कर दो’।”

पर हेमंती ने हार नहीं मानी और उनमें से कुछ बच्चों का दाखिला करवाने के लिए वे आस-पास के स्कूलों में जाने लगीं। पर यहाँ भी उन्हें काफ़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा, “हम इनका दाखिला तो ले लें, पर न तो इन बच्चों को और न ही इनके माता-पिता को स्कूल की कोई चिंता है। इन्हें पढ़ाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि ये बच्चे आते ही नहीं हैं। अगर आप यह सुनिश्चित करें कि ये सभी रोज़ स्कूल आयेंगें, तब हम आपकी मदद कर सकते हैं।”

हेमंती के इरादे तो नेक थे, पर उनके लिए भी यह कह पाना मुश्किल था कि ये बच्चे नियमित तौर पर स्कूल जायेंगे।इसलिए, उन्होंने इन बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने की ज़िम्मेदारी खुद उठाई। अक्टूबर, 2018 तक वे इन बच्चों को हर दूसरे दिन पढ़ाती और फिर नवंबर से वे हर दिन इन्हें एक-एक घंटे पढ़ाने लगीं।

“अक्सर जब ये बच्चे भीख मांगने के लिए मना कर देते हैं, तो उन्हें पीटा जाता है। कभी- कभी तो इनकी आँखों में मसाला डालकर, इन्हें सजा दी जाती है। आप सोच भी नहीं सकते हैं कि इन छोटे-छोटे बच्चों के लिए यह सब झेलना कितना मुश्किल है, और वह भी इसलिए, ताकि वे दिन में एक घंटे पढ़ाई कर पाएं या फिर किसी और गतिविधि में भाग ले पाएं,” हेमंती ने कहा।

पर जब से हेमंती और उनकी टीम ने इन बच्चों को पढ़ाना शुरू किया है, तब से इनमें काफ़ी बदलाव आये हैं। अपने शिक्षकों को देखकर, अब ये बच्चे पहले की तुलना में बहुत साफ़-सफ़ाई से रहते हैं। अब इन बच्चों को जो भी पढ़ाया जाता है, वह उन्हें जल्दी समझ में आ जाता है और अब कई बच्चे अपना नाम भी बिना किसी मुश्किल के लिख लेते हैं।

“अब तक का सफ़र बहुत मुश्किल रहा। पर आज मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि इन 15 बच्चों में से कम से कम पाँच बच्चों को इसी साल स्कूल में दाखिला दिलाया जा सकता है। बाकी मुझे उम्मीद है कि धीरे- धीरे, मैं बाकी बच्चों को भी पढ़ाई के लिए तैयार कर लुंगी।”

बदलाव की शुरुआत 

आठ वर्षीय उशिका के बारे में हेमंती को पहले लगा था कि वह हर समय दुखी और गुस्से में रहती है। शायद इसी कारण बाकी सभी बच्चे उसे चिढ़ाते हैं। पर जैसे-जैसे हेमंती उन्हें पढ़ाने लगी, तो उसे पता चला कि वह बच्ची बहुत मेहनती है।

“वह पढ़ना चाहती है और जो भी उसे सिखाया जाता है, वह तुरंत समझ लेती है। पर उसकी माँ को शराब की लत है। वह उसे पढ़ने नहीं भेजती। जब भी वह हमारे पास पढ़ने के लिए आती है, तो उसे अपने छोटे भाई को सम्भालने के लिए कह दिया जाता है– एक हाथ में कॉपी और दूसरे हाथ में उसका भाई। अब वह दोनों को कैसे सम्भाले? हमें उसे अपनी माँ का विरोध करने के लिए हिम्मत दिलाने में थोड़ा समय लगा। पर आख़िरकार उसने यह कर दिखाया।”

उशिका अब पूरे दिन अपने भाई को संभालती है, पर पढ़ने आते समय उसे अपनी माँ को देकर आती है। हेमंती के काम के जितने प्रशंसक हैं, उतने ही आलोचक भी हैं, जो उन्हें रोकना चाहते हैं। एक बार किसी महिला ने पुलिस में उनकी शिकायत कर दी कि उनकी कक्षाओं के चलते यात्रियों को आने-जाने में मुश्किलें हो रही हैं। पर तब अन्य कुछ यात्रियों ने हेमंती का साथ दिया। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है कि एक सेल्समैन उनके पास आया और कहने लगा, “इन भिखारियों के बच्चों को पढ़ा कर आप अपना स्तर गिरा रही हैं।”

फ़िलहाल, उनके काम और सभी गतिविधियों में लगभग 10 हज़ार रूपये प्रति माह की लागत आ रही है और इन पैसों का इंतज़ाम एनजीओ के बोर्ड मेम्बर ही करते हैं। आगे इनकी योजना है कि ये अपने काम को और अधिक बढ़ाएं, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों तक अपनी पहुँच बना पाएं। हेमंती सेन इस बात की मिसाल हैं कि आपकी उम्र जो भी हो, पर अगर आप कुछ अलग करने का जुनून रखते हैं, तो यकीनन आप समाज में बदलाव ला सकते हैं! हम हेमंती से सिर्फ़ इतना कहना चाहेंगें कि हमें आप और आपकी टीम पर गर्व है। हम दिल से चाहते हैं कि आपको इस काम में सफ़लता मिले।

About न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

News Trust of India न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया

Leave a Reply

Your email address will not be published.

ăn dặm kiểu NhậtResponsive WordPress Themenhà cấp 4 nông thônthời trang trẻ emgiày cao gótshop giày nữdownload wordpress pluginsmẫu biệt thự đẹpepichouseáo sơ mi nữhouse beautiful