कभी नीतीश भी रहे थे चंद दिनों के सीएम

पटना, वैसे तो भारत में मुख्यमंत्री का कार्यकाल पांच साल का होता है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में या फिर बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच यह कार्यकाल कई बार महज कुछ घंटों का भी होकर रह गया है जिसका ताजा उदाहरण देखें तो महाराष्ट्र में चंद दिनों के लिए बनी देवेंद्र फड़णवीस सरकार का है जिन्हें मुख्यमंत्री बनने के मात्र 80 घंटे बाद ही पद से इस्तीफा देना पड़ा है।

बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने साल 2000 में राजनीति के बदले घटनाक्रम के बीच एेसा मौका आया था जब उन्हें मुख्यमंत्री बनने के मात्र आठ दिनों बाद ही अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उन्होंने तीन मार्च को शपथ लेकर 10 मार्च 2000 को पद से इस्तीफा दे दिया था।

नीतीश कुमार से पहले महज कुछ दिनों के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले अन्य नेताओं में बिहार के मुख्यमंत्री रहे सतीश प्रसाद सिंह भी हैं, जिन्हें 1968 में 28 जनवरी से एक फरवरी तक महज पांच दिनों के लिए अंतरिम मुख्यमंत्री बनाया गया था।

बता दें कि वे सबसे कम दिन बिहार के सीएम के पद पर रहे हैं। वे 28 जनवरी 1968 से लेकर 01 फरवरी 1968 तक ही बिहार की गद्दी पर रहे। पूर्व सीएम महामाया प्रसाद सिंह के हटने के बाद खाली जगह को भरने के लिए सतीश प्रसाद सिंह को 28 जनवरी 1968 को सीएम का पद दिया गया। लेकिन, अगले पांच दिनों बाद यानी एक फरवरी को उनको सीएम की गद्दी से हटाकर बीपी मंडल को बिहार का नया मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी गई।

बिहार के 23वें मुख्यमंत्री रहे जीतन राम मांझी महादलित मुसहर समुदाय के पहले मुख्यमंत्री रहे। 20मई 2014 को जनता दल (यूनाइटेड) के नेता के रूप में मांझी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 20 फरवरी 2015 को पद से इस्तीफा दे दिया।

जीतन राम मांझी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के टिकट पर 1980 में राजनीति में प्रवेश किया। उन्होंने फतेहपुर क्षेत्र से विधानसभा चुनाव जीता। 2008 में बिहार केबिनेट में चुने गये। मुख्यमंत्री बनने के 10 महीनों के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें पद छोड़ने को कहा और ऐसा न करने पर उनको पार्टी से निष्कासित कर दिया।

20 फरवरी 2015 को बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी अलग पार्टी राजनीतिक मोर्चे हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा बनाई।

50 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे बीपी मंडल

इससे पहले बिहार में साल 1967 के चुनाव के बाद महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी, जिसमें बीपी मंडल स्वास्थ्य मंत्री बने थे। ये एक गठबंधन की सरकार थी और इसके अपने अंतर्विरोध थे और ये सरकार करीब 11 महीने ही टिक पाई थी।

इस बीच बीपी मंडल के भी अपने दल से गंभीर मतभेद हो गए और उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से अलग होकर शोषित दल बना लिया और फिर अपने पुराने दल कांग्रेस के ही समर्थन से एक फरवरी, 1968 को बिहार के मुख्यमंत्री बने। मगर इस पद पर वे महज पचास दिन तक ही आसीन रहे थे।

महाराष्ट्र प्रकरण पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जब उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई तो उन्होंने कहा कि परिस्थिति ही ऐसी थी। कुछ खास बात नहीं। यह कहते हुए वह आगे बढ़ गए। ज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम से निकलने के क्रम में उन्होंने यह बात कही।

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