शोध परिणामों की प्रस्तुति मौलिक रूप में हो

देहरादून  : शोधार्थियों को शोध के विषय का चयन करते समय कोशिश करनी चाहिए कि उनका विषय मौलिक हो। इसके लिए उस विषयवस्तु का विस्तार से अध्ययन जरूरी है। क्योंकि बगैर अध्ययन के मौलिक विषय वस्तु का चयन कर पाना संभव नहीं हो पाता। ये बातें दून विश्वविद्यालय की रिसर्च मैथोडोलॉजी राष्ट्रीय कार्यशाला के अंतिम दिन मुख्य अतिथि कुमाऊं विवि के पूर्व कुलपति व आइआइटी रुड़की के आचार्य प्रो. डीके नौरियाल ने कहीं।

दून विवि के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की ओर से आयोजित 10 दिवसीय कार्यशाला का बुधवार को समापन हो गया। इस दौरान प्रो. नौरियाल ने कहा कि यह कार्यशाला शोधार्थियों को उनके शोधपत्रों व शोधग्रंथों के लेखन में सहायक सिद्ध होगी। उन्होंने शोध परिणामों के प्रस्तुतिकरण में सरल भाषा और उचित शब्दों के समन्वय पर बल दिया।

विशिष्ट अतिथि गुरुकुल कांगड़ी विवि के प्रो. वीके सिंह ने कहा कि किसी भी शोध मॉडल के परीक्षण से पहले उस मॉडल पर परिकल्पना तैयार की जाए, तभी वास्तविक शोध संचालित हो पाएगा। सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी के प्रो. एचएस दास ने कहा कि शोधार्थियों को कॉपी-पेस्ट से इतर मूल कार्य संपादित करने पर ध्यान देना चाहिए। इस अवसर पर विवि के प्राध्यापक डॉ. सुधांशु जोशी की पुस्तक ‘सस्टेनेबेल सप्लाई चैन कैपेबिलिटीज ऑफ माइक्रो, स्माल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज’ का विमोचन किया गया। इस मौके पर डॉ. प्राची पाठक, नरेंद्र लाल, डॉ. सुधांशु जोशी, डॉ. रीना सिंह, डॉ. वैशाली आदि मौजूद रहे।

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