अमेठी से चुनाव लड़ने में क्यों डर रहे है राहुल गाँधी !

नई दिल्ली: आम चुनाव 2019 की तारीखों के ऐलान होने में करीब डेढ़ महीने का वक्त है। लेकिन सियासी समीकरणों को साधने की कवायद शुरू हो चुकी है। कोलकाता में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली मेगा रैली में विपक्षी दलों ने अपनी शक्ति का अहसास कराया। ये बात अलग है कि कांग्रेस अध्यक्ष खुद उस सभी में नहीं शामिल हुए। लेकिन अपने नुमाइंदों को मोदी सरकार के खिलाफ आवाज बनने के लिए भेजा था। इन सबके बीच ये खबर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी परंपरागत सीट अमेठी के अलावा दो और जगहों से चुनाव लड़ेंगे।

बताया जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी के अलावा महाराष्ट्र के नांदेड़ और मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से अपनी किस्मत आजमां सकते हैं। महाराष्ट्र की नांदेड़ और मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट को कांग्रेस को गढ़ के रूप में देखा जाता है। छिंदवाड़ा का प्रतिनिधित्व कमलनाथ करते रहे हैं और वो मौजूदा समय में मध्य प्रदेश के सीएम हैं। इसके साथ ही नांडेड़ महाराष्ट्र के पूर्व सीएम अशोक चव्हाण का संसदीय क्षेत्र है और कांग्रेस वहां से चुनावों में विजयी रही है।

अब सवाल ये है कि अगर राहुल गांधी तीन जगहों से चुनाव लड़ते हैं तो उसका अर्थ क्या है। क्या, कांग्रेस को डर लग रहा है कि इस दफा अमेठी से राह आसान नहीं होगी। जानकारों का कहना है कि दरअसल इस डर के पीछे वजह भी है। आम चुनाव 2014 में राहुल गांधी के खिलाफ बीजेपी ने स्मृति ईरानी को मैदान में उतारा था। स्मृति ईरानी के लिए अमेठी निर्वाचन क्षेत्र नया था। लेकिन महज 15 दिनों के जबरदस्त चुनावी अभियान में उन्होंने फिजा बदल दी। स्मृति ईरानी के चुनावी प्रचार का असर नतीजों में भी दिखाई दिया। अमेठी से जहां कांग्रेस प्रत्याशी और विरोधी उम्मीदवारों के बीच अंतर पांच लाख वोटों से ज्यादा होता था वो अंतर सिमट कर महज एक लाख रह गया।

जानकार बताते हैं कि स्मृति ईरानी भले ही अमेठी से चुनाव हार गईं हों। उन्होंने अमेठी को अपना घर बना लिया। पिछले साढ़े चार वर्षों में शायद ही ऐसा कोई महीना रहा हो जब वो अमेठी में न रहीं हों। ये बात सच है कि एसपी और बीएसपी ने कांग्रेस को वॉक ओवर दे दिया है। लेकिन गैर यादव मतों को बीजेपी मजबूती के साथ अपनी झोली में डालने की कवायद में वर्षों से जुटी है। इसके अलावा 2014 में बीएसपी उम्मीदवार को महज 57 हजार वोट मिले थे। बताया जाता है कि बीएसपी के परंपरागत मतों में बिखराव हुआ था। दलित समाज से जुड़े युवाओं में ये धारणा बनी कि अब एक नई सोच वाली पार्टी को मौका देने की जरूरत है जो अलग कलेवर में सबके सामने है।

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