मान्यता- यहां पांडवों ने बिताया था अज्ञातवास

पठानकोट के प्रसिद्ध मुक्तेश्वर शिवधाम को प्राचीन पांडव गुफा के नाम से जाना जाता है। शिवालिक की पहाड़ियों में लगभग 5500 साल से भी पुराने इस धाम के बारे में कहा जाता है किइसे पांडवों ने विकसित किया था। इस धाम को छोटा हरिद्वार भी कहा जाता है। इन दिनों शाहपुर कंडी बैराज के निर्माण कार्य के चलते इस ऐतिहासिक स्थल का अस्तित्व खतरे में नजर आ रहा है। यहां तक कि बरसों से मंदिर बचाओ समिति इस खतरे के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है।

मुक्तेश्वर धाम पठानकोट में जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर, मीरथल से 4 किलोमीटर और ब्यास और चोच नदियों के मिलन बिंदु पर इंदौरा से 7 किलोमीटर दूर रावी नदी के किनारे स्थित है। रणजीत सागर बांध और हाल ही में निर्माणधीन शाहपुर कंडी बांध के बीच गांव ढूंग में यह शिवधाम है। किम्वदंति के अनुसार द्वापर युग में युद्धिष्ठिर अज्ञातवास काटने अपने चारों भाइयों और द्रौपदी के साथ लगभग 6 महीने यहां रहे थे। यहां गुफाओं में उन्होंने शिवलिंग स्थापित किया था।

प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है यह क्षेत्र
सड़क के किनारे पुरातत्व विभाग की तरफ से बोर्ड लगा है। यहीं से रावी नदी के बहने का शोर सुनाई देना शुरू हो जाता है। काफी गहराई में पहाड़ियों के बीच नदी निर्मल धारा भी बहती दिखाई देती है। 164 सीढ़ियां उतरने के बाद मंदिर परिसर में पहुंच जाएंगे, जहां  महाभारत काल की गवाह चार गुफाएं हैं। नीचे दो गुफाओं में से एक बड़ी गुफा में मंदिर, द्रौपदी की रसोई, परिवार मिलन कक्ष आज भी है। बाकी तीन गुफाएं थोड़ा ऊंचाई पर हैं। इनमें से एक में अंगरक्षक सहायक तेली को रात में जगाते रहने के लिए कोहलू लगाया गया था। एक गुफा द्रौपदी के लिए आरक्षित थी और चौथी में दूध और भोजन भंडारण किया जाता था। पठानकोट के आसपास के सबसे पवित्र स्थानों में से एक इस धाम की मुख्य गुफा में गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान और देवी पार्वती की मूर्तियां मौजूद हैं। यहां अमावस्या, नवरात्र, बैसाखी और शिवरात्रि पर मेला भी लगता है।

1995 में कर असुरक्षित बता दिया था इस जगह को
मुक्तेश्वर धाम बचाओ समिति के समिति के चेयरमैन नवीन अग्रवाल, महासचिव भीम सिंह व अन्य की मानें तो 20 फरवरी 1995 को जब इस जगह को असुरक्षित घोषित किया गया तो ग्राम पंचायतों के प्रयास से 29 मार्च 1995 को भूमि-अधिग्रहण विभाग की मीटिंग में यह फैसला लिया गया- मुक्तेश्वर मंदिर के 22 कनाल एरिया का अधिग्रहित नहीं किया जाएगा। बावजूद इसके जब सरकारें या प्रशासन गंभीर नहीं हुआ तो मुक्तेश्वर धाम बचाओ समिति के बैनर तले यह एक जन आंदोलन बन गया।

…तो क्या डूब जाएंगी प्राचीन गुफाएं
अब शाहपुर कंडी में बांध बनने के चलते इसकी झील में इस स्वर्णिम इतिहास के लोप हो जाने का खतरा मंडरा रहा है। मंदिर बचाओ समिति के मुताबिक यह प्रोजेक्ट पूरा होने में कुछ ही महीने का वक्त बाकी है, जिसके बाद यहां निर्धारित जलस्तर 405 मीटर भरा तो एक और दो नंबर की गुफाएं पूरी तरह से जल में समा जाएंगी। भीम सिंह की मानें तो गुफा नंबर 1 के दरवाजे का निचला तल 401 मीटर पर है। डूब जाने से बचाने के लिए समिति की दोटूक चेतावनी है कि जब तक धाम को बचाने की गारंटी नहीं होगी, तब तक झील में पानी नहीं भरने दिया जाएगा।

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