उत्तराखंड में धीमी पड़ रही नमामि गंगे की रफ्तार

राष्ट्रीय नदी गंगा स्वच्छ एवं निर्मल रहे, सबकी यही मंशा है। इसके बावजूद, जिन कंधों पर यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि क्या वे इसे बखूबी निभा पा रहे हैं, यह सवाल उत्तराखंड में चल रही नमामि गंगे परियोजना के परिप्रेक्ष्य में भी उठ रहा है। खासकर, कार्यदायी संस्थाओं के मध्य समन्वय को लेकर।

इस परियोजना में कई विभागों व संस्थाओं को शामिल कर उन्हें कार्यदायी संस्था बनाया गया है। वैसे तो सभी की जिम्मेदारियां तय हैं, मगर समन्वय की दिक्कत समय-समय पर सामने आती रही है। इससे न केवल कार्यों की गति सुस्त पड़ रही, बल्कि गुणवत्ता पर भी असर पड़ा है।

मॉनीटरिंग सिस्टम होने के बावजूद यह ज्यादा असरकारी साबित होता नहीं दिख रहा। ऐसे में नमामि गंगे के तहत गठित उत्तराखंड राज्य कार्यक्रम प्रबंधन समूह को इस नजरिये से अधिक सक्रियता से आगे आना होगा।

उत्तराखंड में नमामि गंगे परियोजना के तहत चल रही सीवरेज ट्रीटमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर, रिवर सरफेस क्लीनिंग, रिवर फ्रंट डेवलपमेंट, जैव विविधता संरक्षण, गंगा व उसकी सहायक नदियों के किनारे पौधरोपण, उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी की मॉनीटरिंग, जनजागरण संबंधी कार्य अलग-अलग विभागों व संस्थाओं को सौंपा गया है।

गंगा से लगे क्षेत्रों में नगरीय सीवरेज प्रबंधन, पुराने घाटों का विकास, नए घाटों व श्मशान घाटों का निर्माण, फॉरेस्ट्री इंटरवेंशन्स, रिवर सरफेस क्लीनिंग संबंधी कार्यों के लिए 1134.24 करोड़ की राशि मंजूर की गई है।

निर्माण कार्यों का जिम्मा पेयजल निगम, सिंचाई विभाग, वन विभाग, नगर निगम, वेपकास लि. को सौंपा गया है। जनजागरण के मद्देनजर एक दर्जन से अधिक संस्थाओं व समूहों को जोड़ा गया है। गंगा की निर्मलता व स्वच्छता को लेकर चल रहे इस अहम प्रोजेक्ट में तमाम मोर्चों पर विभागों व संस्थाओं के साथ ही स्थानीय प्रशासन के मध्य समन्वय के अभाव की बातें सामने आती रहती हैं।

उदाहरण के तौर पर देखें तो मुनिकी रेती में स्थापित होने वाले सीवरेज ट्रीटमेंट के निर्माण के मद्देनजर जगह की दिक्कतें सामने आ रही हैं। यदि कार्यदायी संस्था और स्थानीय प्रशासन के मध्य बेहतर ढंग से समन्वय हो तो इस दिक्कत को दूर किया जा सकता है। समन्वय के अभाव में ही जोशीमठ में एसटीपी के लिए भूमि खरीद की प्रक्रिया में खासा विलंब हुआ है।

कुछ ऐसी ही स्थिति गंदे नालों की टैपिंग के मामले में भी है। पूर्व में जिन 51 नालों को टैप करने का दावा है, उनमें से कई क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। जाहिर है कि यदि समन्वय बनाकर कार्य की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया होता तो ऐसी स्थिति नहीं होती। पूर्व में खुद कई जगह स्थानीय प्रशासन के निरीक्षण में बात सामने आ चुकी है कि जिन नालों को टैप होना दर्शाया गया। उनमें से कईयों में सिर्फ खानापूर्ति कर दी गई।

इस अहम परियोजना के तहत चल रहे कार्यों में आगे ऐसी नौबत न आए, इसके लिए जरूरी है कि कार्यदायी संस्थाओं और प्रशासन के मध्य बेहतर समन्वय हो। तभी दिक्कतें दूर हो सकेंगी। यदि कहीं फिर भी अड़चन आती है कि शासन की मदद ली जा सकती है। ऐसे में नमामि गंगे के तहत गठित उत्तराखंड प्रदेश कार्यक्रम प्रबंधन समूह को अधिक जिम्मेदारी के साथ समन्वय के मसले पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

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