हर साल 1 लाख आदिवासियों का इलाज करने वाले डॉक्टर्स दम्पति

साल 1992 में डॉक्टर पति-पत्नी, रेगी एम. जॉर्ज और ललिता ने सित्तिलिंगी का दौरा किया। तमिलनाडु में कालरायन और सित्तेरी पहाड़ियों के बीच बसे धरमपुरी ज़िले का यह आदिवासी गाँव बाकी आधुनिक दुनिया से बिल्कुल ही कटा हुआ था।

यह ‘मालवासी’ या ‘पहाड़ी लोगो’ का घर था, जो बारिश पर आधारित खेती से निर्वाह करते थे।  ये दोनों पहली बार अलप्पुझा के सरकारी टी. डी. मेडिकल कॉलेज में मिले, तब वे यहाँ पर छात्र थे। 90 के दशक के शुरुआती सालों में, डॉ. रेगी व डॉ. ललिता अपनी मेडिकल ट्रेनिंग पूरी कर के गाँधीग्राम के हॉस्पिटल में काम करने लगे। दूर-दूर से लोग मीलों चल कर डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियों का इलाज करवाने के लिए यहाँ आते थे।

चिकित्सा क्षेत्र में सुविधाओं की भारी कमी को देखकर इन दोनों ने फैसला लिया कि वे 1 साल के लिए ऐसी संवेनदनशील जगहों का दौरा करेंगे जहां पर स्वास्थ्य सुविधाओं की ज़रूरत है। और उनकी यही तलाश उन्हें सित्तिलिंगी ले आई।

यहाँ किसी भी आपातकालीन स्थिति में इस गाँव के लोगों को सलेम या धर्मपुरी तक जाना पड़ता था क्योंकि यहाँ से सबसे नजदीकी अस्पताल भी 50 किमी से अधिक दूरी पर था! और किसी बड़ी सर्जरी के लिए तो 100 किमी की यात्रा करनी पड़ जाती थी!

जिस बात ने उन्हें सबसे अधिक परेशान किया वह थी इस छोटे से गाँव में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर का रिकॉर्ड, प्रति 1, 000 शिशुओं पर 150 शिशु की मृत्यु दर; यह भारत में सबसे अधिक थी!

सित्तिलिंगी घाटी में अपने जन्म के पहले वर्ष में ही पाँच में से एक बच्चे कि मृत्यु हो जाती थी और कई औरतें प्रसव के दौरान ही अपनी जान गंवा बैठती थीं। जंगलों के बीच बसे इस गाँव में बस भी दिन में 4 बार ही चलती थी और बस स्टैंड तक जाने के लिए घंटों तक पैदल चलना पड़ता था।

डॉ. रेगी और ललिता चाहते तो यहाँ से वापिस जा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन दोनों ने यहाँ रहने की ठानी ताकि सित्तिलिंगी के दो लाख लोगों को अच्छी और ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया करवा सकें। और पिछले 25 सालों से वे यहाँ अपना प्रोजेक्ट ‘ट्राइबल हैल्थ इनीशिएटिव’(टीएचआई) चला रहे हैं।

शुरुआती दिनों में उनका अस्पताल एक झोपड़ी से चलाया जाता था, जहां सिर्फ़ एक ही कमरा था और यही ‘आउट-पेशंट’ और ‘इन-पेशंट’ यूनिट, दोनों का काम करता था। इस कमरे में बस एक 100 वाट का बल्ब और मरीजों के लेटने के लिए एक बेंच थी।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए, डॉ रेगी ने बताया, “हमारे पास ज़मीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे इसलिए हमने सरकारी ज़मीन पर एक छोटा-सा क्लीनिक खड़ा कर दिया, जो आदिवासियों द्वारा बनायी गयी एक झोपड़ी से अधिक कुछ नहीं था। हमने इस झोपड़ी से तीन साल तक काम किया और इसमें ज़मीन पर ही सर्जरी या फिर कोई डिलीवरी की जाती थी।”

उनके कुछ दोस्तों और शुभचिंतकों ने सहयोग कर इस झोपड़ी को दस बिस्तरों का अस्पताल बनाने में मदद की। आज उन्होंने उस झोपड़ी से ले कर 35 बैड का आधुनिक अस्पताल बनाने तक का लंबा सफर तय किया है। इस अस्पताल में किसी भी आधुनिक अस्पताल की तरह आईसीयू, वेंटीलेटर, डेंटल क्लीनिक, प्रसव कमरा(डिलीवरी रूम), नवजात शिशु कक्ष, आपातकालीन कक्ष, आधुनिक प्रयोगशाला, एक आधुनिक ऑपरेशन थिएटर और एक्स रे, अल्ट्रासाउंड, एंडोस्कोपी, इको-कार्डिओग्राफी आदि की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

इसके अलावा सित्तिलिंगी में शिशु मृत्यु दर भी बहुत घट गयी है। अब यह 1000 बच्चों में 20 बच्चे हैं और यह भारत में सब से कम अनुपात है। पिछले 10 सालों में प्रसव के दौरान एक भी माँ की मृत्यु नहीं हुई!

कैसे हुआ यह संभव?

इस क्षेत्र में अधिकतर प्रसव/डिलीवरी घर में होती थी। प्रसव के दौरान आने वाली मुश्किलों और बच्चे के जन्म के बाद देखभाल की सही जानकारी न होने के कारण शिशु और माँ की मृत्यु दर यहाँ बहुत अधिक थी। वे बताते हैं, “हमने स्वास्थ्य सहायकों, जो कि 40- 50 साल की आदिवासी महिलाएँ थीं, को प्रसव संबंधित समस्याओं पर ट्रेनिंग देना शुरू किया। वे अपने-अपने इलाकों में जाकर प्रसव के दौरान घरों का दौरा करतीं और स्वच्छता सुनिश्चित करतीं। साथ ही, उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि बच्चे की गर्भनाल ठीक से काटी जाये।”

आगे वे बताते हैं कि इन सहायकों ने इस बात का भी ख्याल रखा कि किसी भी इमरजेंसी में, प्रसव पीड़ा शुरू होते ही माँ को अस्पताल लाया जाए। ये औरतें एक सप्ताह के भीतर नवजात शिशु के रेगुलर चेक-अप के लिए भी जाया करती थीं। जब उन्होंने शुरुआत की तो छोटे से छोटे काम के लिए भी उन्हें पैसे जुटाने पड़ते थे। परिवार और दोस्तों से भी ये लोग दूर हो गए थे।

साथ ही, उनके दोनों बेटे भी छोटे थे और वहाँ आस-पास कोई स्कूल भी नहीं था। पर उन्होंने हार नहीं मानी। उनके बच्चों ने चौथी कक्षा तक घर पर ही पढ़ाई की। आदिवासी समुदाय से भी उन्हें कई बार विरोध का सामना करना पड़ा। पर धीरे-धीरे जब इन लोगों ने देखा कि डॉ. रेगी और डॉ. ललिता उन्हें स्वास्थ्य सेवाएँ देने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, तो उन्होंने भी इन पर भरोसा करना शुरू कर दिया।

“इन लोगो ने कभी डॉक्टर को देखा नहीं था। तो अगर कोई बच्चा मैनिन्जाइटिस से पीड़ित है तो गाँववाले सोचते थे कि उस पर बुरी आत्मा का प्रभाव है और किसी तांत्रिक की खोज करने लगते। साँप के काटने पर ये पूजा करते थे। हमें भी समझ में आया कि इनकी धारणाओं का विरोध करना गलत होगा। इसलिए अगर वे कहते कि उन्हें पूजा करनी है, तो हम उन्हें करने दिया करते थे।”

डॉ. रेगी बताते हैं कि यहाँ पर उनकी कोशिश अच्छी और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध करवाने की थी। आज भी डिलीवरी की फीस मात्र 1, 000 रूपये है और 89-90 प्रतिशत ओपीडी आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित है। उनका कहना है, “कुछ लोगों को यह भेदभाव लग सकता है पर यही (आदिवासी) वो लोग हैं जिन्हें हमारी मदद की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।”

फिर यह अस्पताल चलता कैसे है?

बेशक, अस्पताल चलाना मुश्किल है, पर डॉ. रेगी और ललिता हार मानने को तैयार नहीं। “हम ना के बराबर फीस लेते हैं। बहुत बार लोग दे देते हैं, पर ऐसा भी हुआ है जब उनके पास जितना है वे बस उतना ही दे पाते हैं। तो अस्पताल का सालाना टर्नओवर, स्थानीय लोगों से मिलने वाली मदद, ज़्यादातर एनआरआई और सीएसआर की धनराशि की मदद से हम टीएचआई को बिना किसी सरकारी सहयोग के चला रहे हैं।”

उन्हें अभी भी फंड्स की ज़रूरत रहती है। लेकिन अस्पताल को व्यवसाय के रूप में बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि गरीबों को कम पैसे में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ मिल पाएं इसलिए।

हम नहीं चाहते हैं कि उनकी स्वास्थ्य सेवा में पैसा किसी भी प्रकार की रुकावट बने। ये लोग (आदिवासी) समर्थ हो या न हों, हम इनकी मदद करना चाहते हैं। और इस तरह की सेवाओं को चलाते रहने के लिए हमें लगातार पैसों की ज़रूरत पड़ती रहती है। अस्पताल में जन्मे सभी बच्चों को हम एक पिंक कार्ड देते हैं, जिससे उन्हे तीन साल तक मुफ़्त स्वास्थ्य सुविधा मिलती है। क्योंकि यह सेवा निशुल्क है, तो माता-पिता कभी भी बच्चों को अस्पताल ले कर आ जाते हैं। पर अगर पैसों की कमी के कारण यह सेवा बंद करनी पड़ गयी, तो ये लोग बच्चों को तब तक अस्पताल नहीं लायेंगें जब तक कि बच्चे बुरी तरह बीमार न हों।”

इसी तरह ये वृद्धावस्था बीमा योजना भी चलाते हैं, जिसमें मात्र 100 रुपये में पूरे साल मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा मुहैया करवाई जाती है। इनका काम यहीं खत्म नहीं होता है, इस दंपत्ति ने अब इस समुदाय को सशक्त बनाने के लिए और भी प्रोजेक्ट शुरू किये हैं।

औरतों को रोजगार देना

उनका 95 प्रतिशत से अधिक स्टाफ सदस्य अदिवासी हैं। डॉ. ललिता इस बात का ध्यान रखती हैं कि टीएचआई में काम करने वाली महिलाओ को प्रोविडेंट फण्ड (पीएफ) और उपदान/पुरस्कार जैसे कर्मचारी लाभ मिलें।

“हमारी अधिकांश नर्स, लैब तकनीशियन, पैरामेडिक्स और स्वास्थ्य सहायक आदिवासी लड़के और लड़कियां हैं, जिन्हें हमने या फिर अन्य लोगों ने प्रशिक्षित किया है। यह आदिवासियों के लिए आदिवासियों द्वारा ही चलाया जा रहा अस्पताल है जो कि 50 किमी के घेरे में संचालित हो रहा है और हर साल लगभग एक लाख लोगों को सेवाएँ दे रहा है।”

महिलाओं को काम करने के लिए राजी करना आसान नहीं था। ख़ासकर कि गाँव की बेटियाँ, क्योंकि उनकी तो जल्दी शादी हो जाएगी। पर आज ये औरतें कामों में इतनी कुशल हो गयी हैं कि बिना किसी सहायता के भी अस्पताल चला सकती हैं।

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