दसवीं मुहर्रम का जुलूस: आंखों से छलका आंसुओं का पुरसा

लखनऊ,दसवीं मुहर्रम मंगलवार को आशूर का जुलूस निकाला गया। लखनऊ स्थित विक्टोरिया स्ट्रीट स्थित इमामबाड़ा नाजिम साहब में सुबह नौ बजे मजलिस के बाद शुरू हुआ। इमाम की शहादत के गम में डूबे अजादार दस मुहर्रम को भूखे-प्यासे रहकर शहजादी को आंसुओं का पुरसा पेश किया। बता दें,  शाम चार बजे जगह-जगह फाका शिकनी का आयोजन किया जाएगा। उसके बाद अजादार अपना फाका खोलेंगे।

राजधानी में जुलूस अपने निर्धारित मार्ग शिया पीजी कालेज से नक्खास तिराहा, टुडिय़ागंज, हैदरगंज, बुलाकी अड्डा होता हुआ कर्बला तालकटोरा पहुंचकर समाप्त हो जाएगा। वहीं, जुलूस को लेकर राजधानी में पुलिस हाई अलर्ट पर है।

एसएसपी कलानिधी नैथानी खुद सुरक्षा व्यवस्था का जायजा ले रहे हैं। पीएसी से लेकर थानों की पुलिस सुरक्षा मोर्चा संभाले है। जुलूस पर जमीन से आसमान तक पुलिस का पहरा है। वहीं, राजधानी से सटे गोंडा व सीतापुर जिलों में भी मुहर्रम का जुलूस मुस्लिम समाज के लोगों ने निकाला।

इस्‍लामी मान्‍यताओं के अनुसार, इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था। यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था। वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं। लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था। यह जंग इराक के प्रमुख शहर कर्बला में लड़ी गई थी। यजीद अपने सैन्य बल के दम पर हजरत इमाम हुसैन और उनके काफिले पर जुल्म कर रहा था।

उस काफिले में उनके परिवार सहित कुल 72 लोग शामिल थे। जिसमें महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे भी थे। यजीद ने छोटे-छोटे बच्चे सहित सबके लिए पानी पर पहरा बैठा दिया था। भूख-प्यास के बीच जारी युद्ध में हजरत इमाम हुसैन ने प्राणों की बलि देना बेहतर समझा, लेकिन यजीद के आगे समर्पण करने से मना कर दिया।

महीने की 10 वीं तारीख को पूरा काफिला शहीद हो जाता है। चलन में जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मुहर्रम का ही महीना था।

इस्‍लामी मान्‍यताओं के अनुसार, मुहर्रम मातम मनाने और धर्म की रक्षा करने वाले हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का दिन है। मुहर्रम के महीने में मुसलमान शोक मनाते हैं और अपनी हर खुशी का त्‍याग कर देते हैं।

हुसैन का मकसद खुद को मिटाकर भी इस्‍लाम और इंसानियत को जिंदा रखना था। यह धर्म युद्ध इतिहास के पन्‍नों पर हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया। मुहर्रम कोई त्‍योहार नहीं बल्‍कि यह वह दिन है जो अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

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