उत्तराखंड में मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकारों की कार्यशैली संदेह के घेरे में

देहरादून (NTI ब्यूरो ) कहते हैं किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री की मीडिया टीम पर जनता में सरकार के मुखिया के कामकाज को सलीक़े से पेश करने की ज़िम्मेदारी तो होती ही है. साथ ही विवाद और संकट के समय पहल कर मुख्यधारा का मीडिया हो या सोशल मीडिया, जहां भी सरकार के मुखिया की छवि को लेकर गलत संदेश जा रहा हो या कतिपय कारणों से गलत संदेश दिया जा रहा हो वहाँ मीडिया की नब्ज समझने वाले काबिल सलाहकार फ़्रंट फ़ुट से बैटिंग कर स्थिति संभालते हैं. सवाल है कि क्या उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के ‘काबिल’ मीडिया सलाहकार पिछले करीब साढ़े तीन सालों में इस मोर्चे पर कामयाब होते नजर आये? कामयाबी-नाकामयाबी छोड़िये क्या सीएम टीएसआर के मीडिया सलाहकार ऐसा करते नजर भी आये?

अपनी अक्खड़ मिज़ाजी, साफगोई लेकिन ईमानदार छवि के चलते मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत बाक़ियों से बढ़त बनाते हैं लेकिन क्या उनकी असरदार इमेज मीडिया में गढ़ने की कोशिशें होती नजर आयीं? ऐसा नहीं कि टीएसआर सरकार ने आते ही तीन सालों में मीडिया का गला घोंट दिया हो! या फिर मीडिया के आर्थिक हितों पर ही कुठाराघात कर दिया गया हो! ऐसा भी नहीं कि मीडिया के मोर्चे पर सीएम टीएसआर ने सलाहकारों की फ़ौज न खड़ी की हो. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने पद सँभालने के बाद सबसे पहले अपनी मीडिया प्रबंधन की टीम में दो अनुभवी पत्रकारों को शामिल किया जिनमें से एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल का चेहरा और दूसरे राज्य स्तर पर प्रिंट मीडिया के बड़े अख़बारों में काम कर चुके चेहरे को काम पर लगाया.

छोटा प्रदेश होने के बावजूद दोनों मीडिया सलाहकारों को मोटी तनख़्वाह, सरकारी स्टाफ, गाड़ी-घोड़ा और दफ़्तर सहित तमाम भारी-भरकम सुविधाओं से भी नवाज़ा गया. ऐसे में दोनों ही मीडिया प्रबंधन के महारथी क्या अपनी कार्यशैली से अपने कौशल की चमक बिखेर पाये? मीडिया के साथ कितने दोस्ताना और आत्मीय हो पाये दोनों मीडिया प्रबंधन के ये रणनीतिकार?

मुख्यमंत्री की मीडिया प्रबंधन टीम का मुख्य कार्य है मुख्यमंत्री और पत्रकारों के बीच में संवाद कायम करना और मुख्यमंत्री द्वारा किये गए कार्यों की सही तस्वीर को मीडिया के सभी प्लेटफॉर्मो में प्रस्तुत करना. साथ ही साथ मुख्यमंत्री द्वारा शुरू की गयी योजनाओं की सही जानकारी मीडिया तक पहुँचाना तथा टेलीविज़न चैनलों के डिबेट्स में शामिल होकर मजबूती से पक्ष रखना और सरकार के सकारात्मक कामों का डेटाबैंक तैयार कर धारदार पैरवी का आधार रखना. मीडिया के साथ मुख्यमंत्री के सौहार्दपूर्ण संबंधों की मजबूत कड़ी भी यही मीडिया सलाहकार और समन्वयक बन सकते हैं. जबकि मीडिया और सरकार के मुखिया में संवादहीनता या अविश्वास की खाई भी प्रबंधन कौशल के अभाव मे पॉवर कॉरिडोर यही गेटकीपर्स चौड़ा करा सकते हैं.

सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री के रोजमर्रा के कार्य, जनोपयोगी योजनाएं और सोशल माध्यमों में दुष्प्रचार और अटकलबाजियों की काट, गलत या भर्मित समाचारों पर त्वरित जबाब देने का ज़िम्मा है तो सीएम टीएसआर के इन्हीं सलाहकारों के कंधों पर लेकिन यहाँ भी हमेशा उदासीनता और निष्क्रियता ही झलकती है. अब तो चर्चा ये है कि देहरादून में पत्रकारों के धड़े इन दोनों ही मीडिया सलाहकारों के कुप्रबंधन और व्यवहार से खार खाये बैठे हैं.

कुछ पत्रकार रमेश भट्ट से नाराज हैं तो कुछ दर्शन सिंह रावत से ख़फ़ा. नतीजा ये कि अकसर कई वरिष्ठ पत्रकार खुन्दक में सीएम और सरकार को लेकर सोशल मीडिया और पत्रकारों की बैठकी के ठीयों पर अपनी भड़ास निकालते दिख जाते हैं. फ़िर इन पर आये दिन लगते झूठे-सच्चे आरोपों की तपिश भी जब तब सरकार और मुखिया तक पहुँचती रहती है. हालाँकि खुन्नस खाये पत्रकारों के साथ संवादहीनता खत्म करने को लेकर न कोशिशें पहले हुई न कोरोना काल में हो रही.

मीडिया समन्वय का भार अपने कंधों पर लेकर चल रहे दर्शन रावत भले हमेशा मुख्यमंत्री के आसपास मंडराते रहते हों लेकिन अगर कोई पत्रकार मुख्यमंत्री से मिलने के लिए इनसे सम्पर्क करता है तो साहब जवाब देना भी गंवारा नहीं करते. अभी दो दिन पहले की घटना है जब सोशल मीडिया पर एक भ्रामक खबर पोस्ट हुई थी कि मुख्यमंत्री के होम क्वारंटीन होने की दशा में कार्यवाहक मुख्यमंत्री के पद पर उच्च शिक्षा राज्य मंत्री डॉ धन सिंह रावत की ताजपोशी हो सकती है. खास एजेंडा के साथ नैरेटिव बिल्ड करने को लेकर रची गयी ये सोशल मीडिया पोस्ट देखते ही देखते बात-बतंगड़ बनती चली गयी. हाल ये हुआ कि खुद डॉ धन सिंह रावत को फ़्रंट फ़ुट पर आना पड़ा और अपने फेसबुक पेज पर ऐसी अफ़वाहबाजी को लेकर एक्शन की चेतावनी तक दे डाली. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा ताज्जुब ये रहा कि मुख्यमंत्री के मीडिया प्रबंधन की ये ‘चाणक्य-द्वयी’ सरकार के मुखिया को लेकर उड़ रही ख़तरनाक भ्रामक खबर पर मौन साधे सोते रहे.

सवाल अभी ये उठने लगे हैं कि क्या ये मीडिया प्रबंधन के ‘चाणक्य’ गढ़ेंगे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र की चुनावी जीत वाली छवि? या फिर त्रिवेंद्र के जीत की चाबी नरेन्द्र के नाम में देखकर सिर्फ सरकारी संसाधनों का भोग-भरण करना ही मक़सद है. जाहिर है अभी तो कोरोना काल है बावजूद उसके मुख्यमंत्री को लेकर अफ़वाहबाजी रुक नहीं रही, आगे चुनावी बयार बहेगी तो आक्रामक खबरों का आक्रमण ‘चाणक्य’ बनकर फिरते सत्ता के बैंकर क़ब्ज़ाये बैठे ये मीडिया मैनेजर कैसे झेलेंगे? साढ़े तीन साल चली सरकार को कोरोना से निपटते ही कामकाज के मोर्चे पर जवाब देने तो तैयार होना पड़ेगा और उसके लिये मीडिया प्रबंधन टीम को अभी से चुस्त-दुरुस्त करने की दरकार होगी. देखना है कि अपनी निष्क्रियता और उदासीनता पर ‘ईगो’ का घनघोर और मोटा लबादा ओढ़े पड़े इन मीडिया मैनेजरों पर मुख्यमंत्री की निगाहें पड़ेगी! या फिर टीएसआर की सरलता को अपने लिये नजर-ए-इनायत मानकर ये सलाहकार मीडिया में पलते शांत तूफान को देखकर तालियाँ पीटते 2022 तक इक्कीस बने रहेंगे!

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