रोजगार पलायन का ‘कारण’ भी है और ‘हल’ भी

कुल मिलाकर रोजगार पलायन का ‘कारण’ भी है और ‘हल’ भी। और, राज्य में रोजगार तभी संभव है जब कृषि, उद्योग और पर्यटन का विकास एवं विस्तार हो। हालिया व्यवहारिक पक्ष यह है कि शहरीकरण ने कृषि क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं खत्म कर दी हैं और उद्योग राज्य के सिर्फ तीन मैदानी जिलों तक सिमट कर रह गए हैं। रहा पर्यटन, तो दुर्भाग्य यह है कि राज्य में अभी तीर्थाटन और पर्यटन में ही अंतर स्पष्ट नहीं हो पाया है। पर्यटन और तीर्थाटन दोनों बिल्कुल अलग हैं, दोनों को जोड़ा तो जा सकता है मगर उनका घालमेल नहीं किया जा सकता, यह हम आज तक नहीं जान पाए हैं।

चलिए अब आते हैं असल मुददे पर, आज बड़ा मुददा है रोजगार। रोजगार सिर्फ उनके लिए ही नहीं जो करोनाकाल में वापस घरों को लौट रहे हैं, बल्कि रोजगार उनके लिए भी जो कि कोरानाकाल में राज्य के भीतर ही बेगार हो चुके हैं। लॉकडाउन के चलते राज्य को ही तकरीबन नौ हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हो चुका है, बडी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं।
सरकार के सामने दोहरी चुनौतियां है, लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है तो बेरोजगारों की संख्या दोगुनी हो गयी है। सरकार स्वरोजगार की बात कर रही है मगर सच्चाई यह है कि जो लोग हिम्मत कर स्वरोजगार कर भी रहे हैं, वे भी सरकारी सिस्टम से तंग आकर विमुख हो रहे हैं।

अपवादस्वरूप शौकिया और सक्षम-संपन्न लोगों को छोड़ दें तो कृषि कार्य करने वाले 64 फीसदी लोग रोजगार के आभाव में कृषि से जुड़े हैं। इधर सरकार घर गांव की ओर वापसी करने वालों को एक अवसर के तौर पर ले रही है। उम्मीद की जा रही है कि वे बंजर जमीनों को आबाद करेंगे, खेती करेंगे, अनाज या सब्जी उगाएंगे, उद्यान लगाएंगे, स्वरोजगार करेंगे।

रोजगार ही है पलायन की वजह भी और हल भी

कुल मिलाकर रोजगार पलायन का ‘कारण’ भी है और ‘हल’ भी। और, राज्य में रोजगार तभी संभव है जब कृषि, उद्योग और पर्यटन का विकास एवं विस्तार हो। हालिया व्यवहारिक पक्ष यह है कि शहरीकरण ने कृषि क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं खत्म कर दी हैं और उद्योग राज्य के सिर्फ तीन मैदानी जिलों तक सिमट कर रह गए हैं। रहा पर्यटन, तो दुर्भाग्य यह है कि राज्य में अभी तीर्थाटन और पर्यटन में ही अंतर स्पष्ट नहीं हो पाया है। पर्यटन और तीर्थाटन दोनों बिल्कुल अलग हैं, दोनों को जोड़ा तो जा सकता है मगर उनका घालमेल नहीं किया जा सकता, यह हम आज तक नहीं जान पाए हैं।

चलिए अब आते हैं असल मुददे पर, आज बड़ा मुददा है रोजगार। रोजगार सिर्फ उनके लिए ही नहीं जो करोनाकाल में वापस घरों को लौट रहे हैं, बल्कि रोजगार उनके लिए भी जो कि कोरानाकाल में राज्य के भीतर ही बेगार हो चुके हैं। लॉकडाउन के चलते राज्य को ही तकरीबन नौ हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हो चुका है, बडी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं।
सरकार के सामने दोहरी चुनौतियां है, लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है तो बेरोजगारों की संख्या दोगुनी हो गयी है। सरकार स्वरोजगार की बात कर रही है मगर सच्चाई यह है कि जो लोग हिम्मत कर स्वरोजगार कर भी रहे हैं, वे भी सरकारी सिस्टम से तंग आकर विमुख हो रहे हैं।

अपवादस्वरूप शौकिया और सक्षम-संपन्न लोगों को छोड़ दें तो कृषि कार्य करने वाले 64 फीसदी लोग रोजगार के आभाव में कृषि से जुड़े हैं। इधर सरकार घर गांव की ओर वापसी करने वालों को एक अवसर के तौर पर ले रही है। उम्मीद की जा रही है कि वे बंजर जमीनों को आबाद करेंगे, खेती करेंगे, अनाज या सब्जी उगाएंगे, उद्यान लगाएंगे, स्वरोजगार करेंगे।

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