दशकों पहले ‘खत्म’ हो चुकी बासमती को इस किसान ने किया जीवित

हल्द्वानी: आधुनिक समय में पारंपरिक खेती धीरे-धीरे रासायनिक खेती का रूप लेती जा रही है. रासायनिक खेती से लगातार जमीनों की उर्वरक शक्ति और लोगों की सेहत खराब हो रही है. धान, गेहूं और मंडुआ सहित कई फसलें पारंपरिक खेती के नाम पर विलुप्ति की कगार पर हैं. ऐसे में गोरा पड़ाव के हिम्मतपुर गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान अनिल पांडे जैविक खेती के माध्यम से इसको बचाने का काम कर रहे हैं.

हल्द्वानी के गोरापड़ाव के हिम्मतपुर गांव के रहने वाले किसान अनिल पांडे जैविक खेती कर रहे हैं. साथ ही लोगों को इस कार्य के लिए जागरुक भी कर रहे हैं. अनिल पांडे जैविक सब्जियों की खेती के साथ-साथ पारंपरिक विलुप्त हो चुकी धान, गेहूं, मंडुआ की कई प्रजातियों को जैविक खेती के माध्यम से बचाने का काम कर रहे हैं.

अनिल पांडे ने बताया कि वो विलुप्त हो चुकी सुगंधित तिलक बासमती धान और मंडुआ का ऑर्गेनिक खेती के माध्यम से उत्पादन कर रहे हैं. ऑर्गेनिक खेती के माध्यम से उनके उत्पादन में बढ़ावा हुआ है. विलुप्त हो चुकी तिलक बासमती चावल को किसान दशकों पहले लगाना छोड़ चुके थे और धीरे-धीरे ये फसल विलुप्ति की कगार पर थी. जैविक विधि से तैयार किए गये धान का उत्पादन अन्य धान की तुलना में ज्यादा हो रहा है. इस खेती के माध्यम से प्रति बीघा 2 कुंटल बासमती धान तैयार हो रही है. बाजार में तिलक बासमती के सुगंधित चावल 150 रुपये प्रति किलो पर बिक रहा है.

किसान अनिल पांडे पारंपरिक खेती के साथ-साथ जैविक सब्जी का उत्पादन भी कर रहे हैं. किसान अनिल पांडे खुद जैविक खेती तो कर रहे हैं. साथ ही अन्य किसानों को भी जैविक खेती के लिए जागरुक भी कर रहे हैं. जैविक खेती में रसायन का प्रयोग नहीं किया जाता है. जैविक खेती में गोबर की खाद, गोमूत्र, गुड से तैयार किया गया वर्मी कंपोस्ट खाद, केंचुए की खाद का प्रयोग किया जाता है.

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