तीन तलाक पर धर्म संकट में फंसी कांग्रेस, उठाएगी क्या कदम?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी पहले से ज्यादा ताकतवर बनकर सत्ता में आई है. मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला संसद सत्र सोमवार यानी 17 जून से शुरू हो गया जो 26 जुलाई तक चलेगा. 40 दिनों तक चलने वाले संसद के सत्र में सरकार मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से निजात दिलाने के लिए विधेयक पेश करेगी. वहीं, लोकसभा में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस तीन तलाक बिल पर धर्म संकट में फंस गई है. कांग्रेस संसद में अगर तीन तलाक का विरोध करती है तो बीजेपी के मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों का सामना करना होगा और अगर समर्थन करती है तो मुस्लिम वोट बैंक के नाराज होने का डर रहेगा. ऐसे में देखना होगा कि कांग्रेस संसद में क्या रुख अपनाती है.

केंद्र में दूसरी बार मोदी सरकार बनने के बाद कैबिनेट की पहली बैठक में मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक से निजात दिलाने के लिए तीन तलाक के ऑर्डिनेंस को मंजूरी दी है, जिसे अब संसद में पेश किए जाना है. हालांकि साल 2017 में सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार से जुड़े इस बिल को लोकसभा से पारित करा लिया था लेकिन राज्यसभा से पास नहीं हो सका था और यह बिल उच्च सदन ने वापस भेज दिया था. 17वीं लोकसभा के गठन के बाद यह स्वाभाविक रूप से निरस्त हो गया.

यही वजह है कि तीन तलाक से जुड़े ऑर्डिनेंस को पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में पिछले दिनों हुई कैबिनेट की बैठक में मंजूरी दे दी गई. इसमें विपक्ष की कुछ मांगों को भी शामिल किया गया है. इसके बाद अब तीन तलाक से जुड़ा बिल इस प्रकार है.

1- इस मामले में एफआईआर तभी स्वीकार्य की जाएगी जब पत्नी या उसके नजदीकी खून वाले रिश्तेदार इसे दर्ज कराएंगे. विपक्ष और कई संगठनों की चिंता थी कि इस मामले में एफआईआर का कोई दुरुपयोग कर सकता है.

2- पत्नी और पति के बीच अगर बाद में समझौते की कोई पहल होती है तो मजिस्ट्रेट समझौता करा सकते हैं. जबकि इससे पहले के बिल में इसके लिए प्रावधान नहीं थे. विपक्ष का तर्क था कि इसकी व्यवस्था होनी चाहिए.

3- तत्काल तीन तलाक अभी गैरजमानती अपराध बना रहेगा, लेकिन अब इसमें ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि मजिस्ट्रेट इसमें जमानत दे सकता है. हालांकि इससे पहले मजिस्ट्रेट को पत्नी की सुनवाई करनी होगी.  इससे पहले बिल में तीन साल की सजा के प्रावधान के बाद जमानत की गुंजाइश नहीं दी गई थी.

दरअसल पिछले सत्र में जब सरकार ने अंतिम दिन राज्यसभा में इस बिल को पेश किया था तो विपक्ष ने यह कहकर बिल पास नहीं होने दिया था कि सरकार ने हड़बड़ी में बिना सबकी सहमति के इस विधेयक को पेश कर दिया है. अब सरकार ने तीन तलाक बिल में संसोधन कर नए अध्यादेश को मंजूरी दी है, जिसे संसद के इसी बजट सत्र में मोदी सरकार पेश करेगी.

कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पिछले दिनों पत्रकारों से बात करते हुए कहा था, ‘तीन तलाक पर हमने कुछ बुनियादी मुद्दे उठाए हैं. सरकार कई बिंदुओं पर सहमत हुई है. हालांकि सिंघवी ने कहा कि अभी भी एक या दो बिंदु बचे हैं और उन बिंदुओं पर चर्चा की जरूरत है. ऐसे में हम विधेयक का विरोध करेंगे.’

कांग्रेस ही नहीं बीजेपी की प्रमुख सहयोगी जेडीयू भी इस बात पर अडिग है कि तीन तलाक के दोषियों की सजा को आपराधिक श्रेणी में रखना किसी भी सूरत में व्यावहारिक कदम नहीं हो सकता. जेडीयू तीन तलाक के मुद्दे पर राज्यसभा में बीजेपी का इस बिल पर समर्थन नहीं करने का ऐलान किया है. जेडीयू का कहना है कि तीन तलाक एक सामाजिक मुद्दा है और इसे सामाजिक स्तर पर समाज के जरिए सुलझाया जाना चाहिए.

हालांकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जिस तरह से हार मिली है, इसके बाद अब तीन तलाक बिल पर पहले जैसे ही  तेवर अख्तियार करना उसके लिए आसान नहीं होगा. यही वजह है कि कांग्रेस नेता दबी जुबान से कह रहे हैं कि पार्टी पहले की तरह इस बिल का विरोध नहीं करेगी. दरअसल कांग्रेस विरोध करती है तो उसे बीजेपी के मुसलिम तुष्टिकरण का आरोप का भी सामना करना होगा. बीजेपी नेता कई बार कह चुके हैं कि कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक के चलते इस विधेयक का विरोध करती रही है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को अवैध करार देने के कदम का कांग्रेस समेत लगभग कई दलों ने स्वागत किया था. उनका विरोध सरकार द्वारा आध्यादेश के जरिए लाए गए विधेयक में तीन तलाक के दोषी मुसलिम पुरुषों को तीन साल की जेल की सजा के कड़े प्रावधान पर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाए जाने को लेकर है, जिसे अभी भी सरकार ने वैसे ही रखा है.

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