ऐप और यू-ट्यूब चैनल के स्टार्टअप से पर्यावरण बचाने की मुहिम

अमरीकी संस्था एक्शन फॉर नेचर 8 से 16 साल के किशोरों को पर्यावरण बचाने और जलवायु परिवर्तन से लडऩे में सहयोग करने के लिए हर साल ‘द यंग इको-हीरो अवार्ड्स’ की घोषणा करती है। संस्था की ओर से 8 से 12 और 13 से 16 वर्ष की उम्र के किशोर-किशोरियों को प्रोत्साहित करने के मकसद से दो श्रेणियों में इस प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। हर साल पर्यावरण के क्षेत्र में इन किशोरों की उपलब्धियों के आधार पर उन्हें यह अवार्ड दिया जाता है। इस साल भारतीय मूल के दो अमरीकी किशोरों 10 साल के केदार नारायण और 16 साल के आर्य बैराट को यह अवॉर्ड दिया गया है। पेंसिल्वेनिया के रहने वाले केदार अपनी श्रेणी में तीसरे स्थान पर आए।

ऐप और यू-ट्यूब चैनल से बचा रहे पर्यावरण
केदार ने पर्यावरण को बचाने के लिए बज्ज बड्डी नाम का ऐप बनाया है। दरअसल, जब केदार को पता चला कि पराग कणों को प्रसार करने वाले कीटों की संख्या गिरावट पर है तो उन्होंने मदद करने की सोची। उन्होंने परागण करने वाले बगीचों के बारे में जानकारी जुटाई और एक ऐप ‘पोलिनेटर फॉर ए पेट’ ऐप बनाया। यह ऐप लोगों को देसी परगणों के अनुकूल पेड़-पौधों के बारे में शिक्षित करता है। उनके ऐप में 90 अलग-अलग पौधों को सूचीबद्ध किया गया है जिन्हें मौसम, रंग, परागणकों, खिलने के मौसम, पौधों के प्रकार, प्रकाश, आकार और जल निकासी की स्थिति के आधार पर आसानी से उगाया जा सकता है। ऐप में कई प्रकार के परागणकर्ताओं के भोजन या खाद, पानी, आश्रय और सुरक्षा संबंधी जरूरतों के साथ परागणकर्ता पैच बनाने के लिए कुछ डिज़ाइनों की भी जानकारी दी गई है।

इतना ही नहीं, केदार ने स्थानीय पौधों की बिक्री भी की। उन्होंने इस दौरान पाया कि स्थानीय लोगों को ‘देसी पौधों’ के बारे में जानकारी तक नहीं है कि वे क्या हैं और वे क्यों महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने ‘बज्ज बड्डीज नाम से एक यू-ट्यूब चैनल भी शुरू किया है जहां वे देशी पौधों के बारे में शैक्षिक पोस्ट करते हैं और बताते हैं कि इन्हें कैसे उगाया जाए और कैसे इनकी देखभाल की जाए। केदार का कहना है कि विलुप्त होती प्रजातियों, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण के लिए स्थानीय वनस्पतियों को बचाना जरूरी है। साथ ही इस मुहिम से आज की युवा पीढ़ी को जोडऩा उससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। केदार अब अपने साथियों को उन पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में शिक्षित करने के लिए पर्यावरण संरक्षण पर एक वीडियो गेम बनाने पर काम कर रहे हैं।

वहीं 13 से 16 साल की आयु वर्ग श्रेणी में कनेक्टिकट के 16 वर्षीय युवा उद्यमी आर्य बैराट को उनके स्टार्टअप ‘बाईसोल्यूशंस’ के जरिए पर्यावरणीय शिक्षण, स्थिरता और सिंचाई समाधान’के लिए तीसरा स्थान मिला। आर्य ने पर्यावरण शिक्षण और सिंचाई की जानकारी देने के लिए अपने स्वयं के थिंक टैंक की स्थापना की है जिसका नाम उन्होंने बाईसोल्यूशंस रखा है।

अपने भारत दौरें के दौरान उन्होंने ऐसे लोगों के साथ काम किया जिन्होंने उन्हें ग्रामीण क्षेत्र में छोटे पैमाननों पर कम संसाधनों में भी कृषि एवं सिंचाई करने का गुण सिखाया। साथ ही उन्होंने यह भी देखा कि छोटे किसानों के बीच फसल खराबे से होने वाली आत्महत्या की दर भी बहुत ज्यादा है। आर्य की विकसित की गई बाईसॉल्यूशंस तकनीक एडब्ल्यूडी कहते हैं। इसमें वैकल्पिक रूप से नमी और शुष्कता बनाए रखना आसान है। उनकी यह जल सिंचाई प्रणाली पानी का संरक्षण करती है। इस प्रयास के माध्यम से वह ‘सेव ऑवर किसान’समूह से मिले और उनके साथ भागीदारी की ताकि इस तकनीक से किसानों और युवा छात्रों को परिचित करा सकें। वे इस साल अपनी इस तकनीक का और विस्तार करने पर काम कर रहे हैं। आर्य की यह प्रणाली सस्ती और आसानी से उपलब्ध सामग्री का उपयोग करके बनाई जा सकती है। इसमें बूंद-बूंदकर पानी पौधों तक पहुंचता है और इससे पानी की भी बचत होती है।

दो भाइयों ने बदला कचरा प्रबंधन
केदार और आर्य के अलावा इस प्रतियोगिता में भारत के 12 और 15 वर्षीय भाइयों विहान और नव अग्रवाल ने भी अपनी प्रस्तुति दी। उनके बनाए ‘वन स्टेप ग्रीनर’को प्रतियोगिता में दूसरा स्थान दिया गया। वन स्टेप ग्रीनर लोगों को प्रशिक्षित करता है कि कैसे अपने कचरे के स्रोत पर अलग किया जाए और सूखे कचरे को मासिक शेड्यूल के तहत उठाया जाए। फरवरी 2017 में उन्होंने इसे अपने घर से शुरू किया था जो अब अिदल्ली की 7 बड़ी कॉलोनियों के 400 से अधिक घरों तक पहुंच गई है। 1600 से ज्यादा लोग अब सक्रिय रूप से अपने सूखे व गीले कचरे को अलग कर रहे हैं।

प्रतियोगिता में संयुक्त अरब अमीरात के 16 साल के आदिनाथ राजन इंदिरा श्रवणन को भी उनके ‘वी वी अभियान’के लिए सराहा गया। अपने ‘वी केयर’अभियान के माध्यम से उन्होंने अन्य युवाओं में जागरूकता पैदा करने, पर्यावरण संरक्षण और नेतृत्व करने के लिए प्रेरित किया है। इसके अलावा वे पौधरोपण, प्लास्टिक के खिलाफ अभियान भी चला रहे हैं। बीत 4 सालों में 1000 से अधिक लोगों तक उनका अभियान पहुंच गया है।

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